आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिवस है।ये सभी जानते है।लेकिन क्या कभी अपनी इस भौतिकवादी इच्छा को ही पकड़ते और उसके पीछे भागते भागते थकने और मरने और किसी के भी आपको स्मरण नहीं किये जाने के विषय में सोचा है।की ये नेता जी भी तुम्हारी ही तरहां एक लर्जरी लाइफ के विषय में सोच सकते थे और इन्होने उस काल में प्रशासनिक पद की प्राप्ति की और उसे त्याग भी दिया।जबकि आपमे एक छोटा सा त्याग का भाव भी नहीं जगता है।तब क्या विचार करोगे की-असल सत्य और आत्म स्वतन्त्रता किसे कहते है? देश की स्वतन्त्रता और उसका मूल्य और अपने मनुष्य होने की स्वतन्त्रता और उसका मूल्य क्या है? क्यों है जीवन? उसकी एक झलक भी नहीं देखि है। बस इन पांच इच्छाओ-किसी काम न आने वाली शिक्षा,बिना प्रेम का झूठ की नींव पर बने रिश्ते का विवाह,कभी भी आत्म सम्मान की लात मार कर बाहर निकाल दिए जाने वाली नोकरी,कभी भी साथ छोड़ देने वाला शारारिक स्वस्थ,और कभी भी आने असाध्य,भयंकर पीड़ा दायक वाली म्रत्यु,जिसमें कभी मोक्ष नहीं मिलता, के चक्रव्यूह से कभी बाहर तक नही निकल पाते हो।
बस भागे जा रहे है,इस अतृप्त तृष्णा के पीछे।और भ्रम के उधार में मिली एक कथित प्रसन्नता में प्रसन्न है,की मेने ये पा लिया और वो पा लिया और छिनते ही दुःख से भर बेठे।
तब क्या करें??? ये कहने वाले आत्म भर्मित जनों..इस दिवस पर ये सोचो की-सुभाष के जीवन का पहला प्रष्ट अपने पिता से पूछते हुए, इस प्रश्न से शुरू होता है की-क्या कोई ऐसा भी पैदा हुआ है? जिसने इस देश और स्वतन्त्रता और आत्मा की प्राप्ति का सोचा और उसपर कुछ किया हो? तब वो बोले हाँ.,अभी स्वामी विवेकानन्द हुए और एक मिशन खड़ा कर गए,इस विषय को लेकर।और इसी विचार को लेकर सुभाष चन्द्र बोस में क्रांति का बीजारोपण हुआ,जो आज एक विराट वृक्ष के रूप में हमे स्वतन्त्रता को की अतुलित छाँव दे रहा है।
यो सदा से ही पहली क्रांति आध्यात्मिक होती आई है और उसी आध्यात्मिक नींव पर भौतिक क्रांति की इमारत खड़ी होती है।
सोचो-क्या शँकराचार्य या दयानन्द या विवेकानन्द की अपने जीवन की दाव पर लगाने वाले भीषण प्रयास को??
क्या वे और उन जेसे अनेक कम लोग भी आपकी तरहां अपने ऐशो आराम और बीबी बच्चों के साथ भोग भरी जिंदगी के नहीं सोच सकते थे? क्या जरूरत पड़ी उन्हें ये सब करने की? आज जिन बड़े बड़े स्कुल में आप पढ़ रहे हो,उन्होंने क्यों बनवाये? उनके क्या बच्चे थे,जो उन्होंने इतना परिश्रम किया और तुम्हें मजे मारने को दे गए ये सब?
यो आपनी आत्मा के उस पक्ष जो भी जगाओ,जो तुम्हें इस प्रकार झूटी और प्रपंच बातों की बेड़ियों से मुक्त करने को पुकार रहा है।आज के और ऐसे ही महापुरुषो के जन्मदिवस या निर्वाण दिवस पर अपने चिन्तन और ऐसी सोच को जगाओ और सोचो की-तुम ऐसा क्या करके जाओगेँ,जो लोग तुम्हें तुम्हारे कर्मों के लिए सदा ऐसे ही याद रखे,जेसे आज हम इन्हें याद कर रहे हैं।और प्रयास करो,यदि ये भी नहीं कर सकते या कर सकती हो,तो कम से कम उस सोच पर काम करने वाले का भरपूर सहयोग तो अवश्य दो।
आप भी किसी मिशन यानि जीवन के ऐसे ही उद्धेश्य से जुड़े हो,यो केवल अपने ही स्वार्थ की सोच से बाहर निकलो और अपने मिशन की सोच से जुडो और उसके लिए कुछ कर जाओ,कुछ ऐसा काम, जो तुम्हारे जीते जी ही लोग कहे की-अरे ये है वो जीवन्त आनन्दमयी जीवन और उस सोच का प्रबल सहयोगी व्यक्तित्त्व…,सोचों और आज से ही आरम्भ करो..
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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