!!राम नवमी-प्रतीक्षारत राम!!
इस कविता के माध्यम से राम नवमी को स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी जनसंदेश दे रहे है की-
राम खड़े प्रतीक्षारत
बन सदा धर्म की बाढ़।
प्रतीक्षारत ही सदा रहे
राजनीती की चढ़ चढ़ आढ़।।
राज्य मिला तो पिता गए
भाई बदले मिला वनवास।
वनवास बदले सीता गयी
मित्र बदले युद्ध विनाश।
राम दुहाई धोबी ने ले
राम प्रेम लगाई आग।
राम राज्य बदले के
प्राण राम दे त्याग।।
राज्य मिला सीता नही
ना पुत्रवत् लव् कुश सुख।
अमरत अमरता हनुमान दे
बदले लिए संसारी दुःख।।
त्रेता गया द्धापर गया
कलियुग आये और जाये।
राम प्रतीक्षारत खड़े
राम प्रतिष्ठा कब है पाये।।
निज मुक्ति बोले राम राम
और दूजे धर्म चढ़ाये चादर।
अपने राम धुप लू तपे
हिन्दू ही करे राम अनादर।।
अरे-हटा दो अपने मंदिर से राम
और मुख बोल हटाओ राम।
जब काम राम का करो नही
तो किस अर्थ रख्खो हिंदू नाम।।
कृष्ण कृष्ण कहना भी छोडो
और कहना छोड़ो हिन्दू।
हिंदुस्तान नागरिक भी कहना छोड़ो
बिन धर्म बन रहो एक शून्य बिंदू।।
दासत्त्व के हो तुम पुजारी
स्वतंत्रता उपासक मात्र है राम।
खड़े अडिग उस राम को राम है
जो आ स्वतंत्र करायेगा प्रतीक्षारत राम।।
धर्म बड़ा या न्याय बड़ा है
राम स्वयं प्रतीक्षारत है न्याय।
राम स्वयं जो न्याय अर्थ है
वही अर्थ तुल रहा तुला न्याय अन्याय।।
रघुकुल रीत सदा चली आयी
प्राण जाये पर वचन ना जाई।
कितने बंधू हिंदू यहाँ है देखूँ
जिसने राम मंदिर बनाने प्रतिज्ञा खाई।।
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रचयिता-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय श्री राम जय श्री श्याम
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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Bht sundr kavita h
Jay shri ram
Jay satya om siddhayae namah
Jai styam om sidhaye nmg