बहस बेमानी कि अकबर से इस्तीफा लाए लिया गया,या अकबर ने इस्तीफ़ा दे दिया! तत्थ्यांकित कि अकबर भूतपूर्व मंत्री हो गये ।संभवत:,राजनीति से भी उनकी विदाई हो जायेगी ।ओह!कोइ विडंबना ऐसी भी?प्रसंगवश बता दूँ ,कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अत्यंत ही करीबी रहे अकबर जब कांग्रेस से पृथक हुए थे,तब मेरे पूछने पर उन्होंने पीड़ित मुद्रा में जवाब दिया था कि,”जब प्रधान मंत्री का भाषण ही लिखना हो,तो मैं अपना ‘कॉलम ‘क्यों ना लिखूँ?” अकबर के उस जवाब में उनके पत्रकार-मन का दर्द छलक रहा था।
अब,प्रतीक्षा दिलचस्प कि क्या कभी पत्रकारिता के एक अत्यंत ही सशक्त हस्ताक्षर रहे ,भारतीय पत्रकारिता को एक नई दिशा देने वाले,अनेक युवाओं का मार्गदर्शन कर उन्हें पत्रकारीय जीवन में सम्मानपूर्वक स्थापित करने वाले प्रयोगधर्मी पत्रकार एम जे अकबर की खुद की पत्रकारीय-जीवन यात्रा पर भी विराम लग जायेगा?इन पर चर्चा कभी बाद में ।
फिलहाल,संक्षिप्त मंथन अकबर पर लगे आरोप-प्रत्यारोप के एक अंश -विशेष पर।
जब अकबर पर महिला पत्रकारों के आरोप सार्वजनिक होने लगे तो पूछा गया कि इतने विलंब से,10-20वर्षों पश्चात आरोप क्यों?जवाब आया कि तब की रूढ़िवादी सामाजिक अवस्था और संकुचित मानवीय सोच के कारण वे विरोध की हिम्मत नहीं जुटा पायीं।इस तर्क को एक सिरे से खारिज नहीं,तो पूर्णतः स्वीकार भी नहीं किया जा सकता।उदाहरण मौजूद है कि 10-20 वर्ष ही नहीं ,34-35 वर्ष पूर्व यौन-शोषण की कोशिश के विरोध में कोई मुखर हुई और उसे तत्काल न्याय भी मिला।बात 1984 की है जब मैं राँची में दैनिक ‘प्रभात खबर ‘के प्रकाशन को अंतिम रुप दे रहा था।तब अविभाजित बिहार में कोई सक्रिय नामचीन महिला रिपोर्टर नहीं थी।वर्तमान में,पत्रकारिता व सामाजिक क्षेत्र में अनेक उपलब्धियों के साथ ख्याति प्राप्त,मणिमाला ने तब पटना से राँची आ कर अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत हमारे ‘प्रभात खबर ‘के साथ की थी।मणिमाला के आवास की व्यवस्था हमने एक होटल में की थी।उसी होटल में एक अत्यंत ही वरिष्ठ पत्रकार,हमारे संयुक्त संपादक,भी रह रहे थे।बता दूँ,उक्त सम्माननीय पत्रकार से मैंने आरंभिक दिनों में बहुत कुछ सिखा था।बल्कि,उन्होंने मुझे पत्रकारिता में प्रशिक्षित किया था।गुरु सदृश थे वे मेरे लिए ।मैं उन्हें भैया कहा करता था।
एक दिन मणिमाला ने उन पर ‘बद्तमीजी’ के गंभीर आरोप लगाए।मैं सकते में आ गया ।उपर्युक्त वर्णित संबंधों के आलोक में मेरी मानसिक अवस्था की कल्पना सहज है ।उक्त वरिष्ठ सहयोगी के साथ मेरे व्यक्तिगत संबंध और एक नई महिला पत्रकार के साथ ‘दुर्व्यवहार ‘के बीच मुझे संपादक और संचालक के रुप में न्याय करना था ।सहज तो नहीं था,किन्तु एक महिला के प्रति न्याय के पक्ष में मेरा दृढ,निष्पक्ष मन विजयी रहा ।अपने अन्य वरिष्ठ सहयोगियों से परामर्श के पश्चात मैंने “…भैया ” को सेवा-मुक्त कर दिया ।उस रात मैं बहुत रोया था । लेकिन, अपने साथ ‘बद्तमीजी ‘ के विरोध में हिम्मत कर मुखर हुई मणिमाला को न्याय मिला ।मणिमाला ने बाद में अल्पावधि में ही “प्रभात खबर ” और ‘नवभारत टाइम्स ‘के माध्यम से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली ।बाद में भी पत्रकारीय सफलतायें मणिमाला के कदम चूमती रहीं ।इस घटना की विस्तार से चर्चा मणिमाला ने अंग्रेजी पत्रिका “Savvy ” को दिए एक ‘इंटरव्यू ‘में की थी ।वह ‘इंटरव्यू’ The Fiery Manimala शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुआ था।
तात्पर्य कि रूढ़िवादी व्यवस्था और संकुचित सामाजिक सोच के बीच,वर्षों पहले मणिमाला के रुप में एक महिला पत्रकार,शोषण के खिलाफ मुखर हो विरोध प्रकट कर न्याय पाने में सफल हो चुकी थीं ।
अत:,शोषण के खिलाफ वर्षों तक विरोध प्रकट नहीं किए जाने के लिए रूढ़िवादी और संकुचित सोच का तर्क सहज-मान्य नहीं हो सकता ।
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वरिष्ठ पत्रकार श्री एस.एन विनोद
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