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नवरात्रि विशेष: महिलाओं को अष्टमी और नवमी के अंतिम पूजन पर क्यों करना चाहिए 16 श्रृंगार, क्या है इसके पीछे का धार्मिक कारण? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

नवरात्रि में विशेषकर अष्टमी और नवमी के अंतिम पूजन पर, क्यों करना चाहिए महिलाओं को 16 श्रृंगार? क्या है इसके पीछे की धार्मिक मान्यता? क्या सोलह श्रृंगार से होती हैं माँ दुर्गे प्रसन्न?

 

 

वैसे तो हमारे देश में हिन्दू त्योहारों को लेकर बहुत सी मान्यताएं होती हैं लेकिन कुछ ऐसी विशेष चीजें होती हैं जो हमें कई बार निजी जीवन में फर्क डालती हैं।
कुछ ऐसी ही मान्यताओं को अवश्य ही जानिए इसके पीछे का क्या है धार्मिक कारण?.. तो नवरात्रि में महिलाओं को 16 श्रृंगार क्यों करना चाहिए इसके पीछे का धार्मिक कारण बता रहे है-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी

 

नवरात्रि जागरण का मूल अर्थ है-प्रत्येक मनुष्य चाहे वो स्त्री हो या पुरुष इसकी आत्म शक्ति का जागरण करना यानि कुंडलिनी जागरण करना,अपनी आत्म के सोलह संस्कारों पर जमे मल या अज्ञान जो-अष्ट विकार-काम क्रोध लोभ मद् आदि को मनुष्य के चार धर्म कर्म यानि कर्तव्य जो अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष के रूप में चार नवरात्रि है,यो व चार नवरात्रि में चार बार मिल
लाकर सोलह संस्कारो को शुद्ध करना या अंधकार को मिटाना ही नवरात्रि में सोलह कला को शुद्धि प्राप्ति अर्थ ही सोलह श्रंगार कहलाता है।
यही मनुष्य में सोलह देवत्त्व या देवीत्त्व का जागरण भी है,मनुष्य के सम्पूर्ण शरीर में मूल सोलह शक्ति बिंदु होते है।उनका ज्ञान से शुद्धि कर जागरण यानि चैतन्य करना ही सोलह श्रंगार करना कहलाता है।यही अष्टमी मनाना यानि अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति करना है,जो मनोरथ कहलाता है।यो क्षत्रियों को अष्टमी मनाने का शास्त्र विधान है।और जो केवल सभी मनोकामनाओ से परे है,वे केवल ब्रह्म विद्या की प्राप्ति की इच्छा रखते तपस्यारत है,उन्हें नवमी यानि नो अंक अंतिम अंक है,फिर केवल उसके गुणन अंक ही बनकर संख्या बढ़ाते है।यो ये ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति करने की निस्वार्थ कर्मी को ब्राह्मण कहा गया यो,नवमी ब्राह्मण को मनाने का शास्त्र में आदेश है।यहां जातिपाति नहीं बल्कि ये प्रत्येक मनुष्य का आत्मकर्म अधिकार है।
मनुष्य के शरीर में सोलह शक्ति बिंदु और इसकी शक्ति देवी है-
मूल में दो ही मुख्य धातु है-स्वर्ण और रजत।यो स्वर्ण धातु को सूर्य यानि पिंगलनाड़ी या सूर्य नाड़ी या सूर्य स्वर यानि आत्मा की धातु माना है और चांदी को चंद्रमा यानि इंगला नाड़ी चन्द्र स्वर यानि मन की धातु माना गया है।बाकि धातु इन्ही के संयोग से बनी है,जिनका उपयोग भी किया जाता है।
यो शरीर के सोलह बिंदुओं को आत्मा और मन के सोलह शक्ति बिंदु मानकर उसे इन धातुओं के धारण करने से नियंत्रित करने का तत्व विज्ञानं से वैज्ञानिक उपाय बताया है।यो सोलह आभूषण श्रंगार पहने जाते है,पहले पुरुष भी विभिन्न आभूषण पहनते थे,पर समयानुसार ये परम्परा मिटती गयी और केवल स्त्री ही मुख्य शक्ति बिंदुओं पर आभूषण धारण करती है।और वो भी किसी विशेष त्यौहार आदि पर,यो धार्मिक अनुष्ठान करते में सोलह शक्ति बिंदुओं को नियंत्रित और जागरण करने को ये पहनने का विधान है-
1-पैर और हाथ के अंगूठे सहित चार उँगलियाँ-2-टखने व् पिंडली व् कलाई-3- बाजु या जांघ-5-कन्धे या कटि यानि गुदा-6-कान-7-मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र सहस्त्रार तक 9 बिंदु आदि मिलाकर 16 शक्ति बिंदु हुए।यो ये ही सोलह कला मिलकर पूर्णिमां कहलाती है।यानि आत्मा का सम्पूर्ण प्रकाशित जागरण।जो स्वयं मनुष्य ही है।
इन सोलह शक्ति बिंदु की देवी है-
1-अरुणी-2-यज्ञई-4-तरुणी-5-उरूवा-6-मनीषा-8-सिद्धा-9-इतिमा-10-दानेशी-11-धरणी-12-आज्ञेयी-13-यशेषी-14-ऐकली-15-नवेषी-15-मद्यई-16-हंसी!!
यो शरीर पर आभूषण व् वस्त्रादि श्रंगार करने से इन सब शक्ति बिंदुओं और इनके ये देवियों का जागरण कर लौकिक और अलौकिक शक्तियों की प्राप्त व् कृपा प्राप्त होती है।यो सोलह श्रंगारों का अष्टमी और नवमी को करके धार्मिक कर्मकांडों या नवरात्रि में पूजन का स्त्री को विधान बताया है।वेसे भी स्त्री को त्रिगुण देवी तम-रज-सत् यानि-सरस्वती-लक्ष्मी-काली का स्वरूप माना है।
यो जो इन सोलह देवी सहित सत्यई पूर्णिमाँ का सम्पूर्ण मंत्र जपता है,उसकी आत्मा की सोलह कलाएं जागृत होती है।उसे सर्व सामर्थ्य सहित अंत में आत्मसाक्षाकार की प्राप्ति होती है।
!!ॐ अरुणी यज्ञई तरुणी उरूवा मनीषा सिद्धा इतिमा दानेशी धरणी आज्ञेयी यशेषी ऐकली नवेषी मद्यई हंसी सत्यई पूर्णिमायै नमः स्वाहा!! का जप और यज्ञ करते ध्यान करना चाहिए।यो उसको दुर्गा यानि दुर्ग माने शरीर और आ माने आत्मा यानि आत्मसाक्षात्कार दुर्गा की प्राप्ति होती है।उसे आत्मा की तीन अवस्था इच्छा क्रिया ज्ञान जिसे सरस्वती लक्ष्मी काली कहा है,उस त्रिगुण और त्रिगुणातीत अवस्था आत्मा की प्राप्ति होती है।यो सभी दुर्गा से लेकर दस महाविद्या की देवियों में माँ सम्बोधन केवल लगाया गया है,अन्यथा उन्हें केवल देवी ही कहा गया है।और केवल पूर्णिमाँ में ही स्वयमेव पूर्ण और माँ यानि सम्पूर्ण माँ अर्थ स्वयं प्रकट है।यो इस सोलह देवी मंत्र का जप करने से स्वयं सर्वदेवीयों की शक्ति प्राप्त हो जाती है।जो सत्य ॐ सिद्धायै नमः का ही सोलह बीजाक्षर देवी रूप है।यो यहाँ संछिप्त में बताया है।
और क्या है स्त्रियों के लिए 16 श्रृगांर?:-
16 श्रृंगार बहुत ही जरूरी माना जाता है। इसे केवल सौंदर्य के कारण से ही नहीं बल्कि ये महिलाओं के भाग्य को भी बढ़ाता है। इसलिए नवरात्रि के पर्व में 16 श्रृगांर को क्यों जरूरी माना गया है।

16 श्रृंगार में महिलाओं के परिधान के लिए 16 अलग अलग चीजें इसमें आती हैं।

1-लाल वस्त्र-ये सूर्य का रंग यानि रजगुण यानि क्रियाशीलता का प्रतीक है,और इसमें पीतवर्ण पीला रंग स्वर्ण का प्रतीक है।सम्पूर्ण शरीर की ढके रहने और धारण करने से स्त्री में कार्य करने की शक्ति बढ़ती है।
2-बिंदी-त्रिकुटी त्रिपुंड यानि आज्ञाचक्र व् गुरु चक्र आदि के स्थान पर बिंदी लगाने वो चक्र में चेतना आती है और ये भी विभिन्न रंगो में होने से यहां सभी त्रिगुणों का प्रभाव मिलता है।
4-महंदी-हरे रंगे से लाल रंग में बदलती महंदी का उर्वराशक्ति प्रभाव स्त्री के हाथ पैरों से होकर सम्पूर्ण शरीर में पहुँच उसका अनेक प्रकार से शुभ कल्याण करता है।
5-सिंदूर-ये भी लाल गुलाबी होने से रजोगुणी सूर्यशक्ति व्रद्धि वाला व् पुरुष तत्व को आकर्षित करने वाला होने से शुभता व् सुहागनता देता है।
6-पुष्प गजरा-लाल तेजस्विता या सफेद शांति की व्रद्धि व् विभिन्न रंगों के पुष्प से बना गजरा जीवन्त पंचतत्वों को आकर्षित करके पहनने वाले में प्राकृतिक सौंदर्य सहित स्वस्थ को भी बढ़ाता है।
7-मांग टीका-सोने व् चांदी का टीका माथे के मध्य भाग अनेक शारारिक चक्रों को क्रियाशील करता व् स्वयं सहित दूसरे को भी प्रसन्नचित बनाता है।
8-नथ-सोने या चाँदी की नथ नांक में सीधे भाग में सूर्य तत्व व् सूर्य नाडी के दोषो को नियंत्रित करती है।उलटे में चन्द्र से सम्बंधित अनियंत्रित को धातु पहनने से नियंत्रित करती है।
8-झुमका-ये कान के निचले भाग में सहस्त्रार चक्र के बिंदु को उसके दोषो से नियंत्रित व् वहाँ की शुभता जाग्रत करती है।ये अनावश्यक ध्वनि से उत्पन्न रोगों को नष्ट करती है।
10-मंगलसूत्र-ये कंठ चक्र और उसके अनियंत्रण से कंठ रोग वाणी दोष आदि के सुधार में साहयक है।साथ ही इसमें पड़े काले मनके आदि अनेक बुरी नजर से बचाते है।और ये विवाह के समय पति से किये सभी संकल्प वचनों को सदा धारण कर उनपर चलते रहने का भी प्रतीक है। की-सभी प्रकार के बुरा बोलने के दोषों से दूर रहने का भी प्रतीक है।यो ये मंगल सूत्र कहलाता है।
11-बाजूबंद-सदा कर्मशील बने रहने का प्रतीक है।की ये दोनों भुजा व्यक्ति के सभी शुभ कर्मों को निरन्तर करते हुए अपने व् परिवार व् समाज के कल्याण को प्रतिबद्ध है।यो ही देवी की चार से सोलह भुजा दिखाई है।यानि अपने कर्मों का जागरण करना ही बाजूबंद पहनना अर्थ है।
12-चूड़ियाँ-चार चूड़ियाँ अर्थ धर्म काम मोक्ष कर्म को करने का संकल्प धारण है। और आठ चूड़ियाँ अष्ट अष्ट विकार का शोधन कर अष्ट सुकार धारण करने का संकल्प है।और सोलह चूड़ियाँ सोलह कलाओं को धारण करने का संकल्प है।
13-अंगूठी-अनामिका ऊँगली में अंगूठी तो विवाह के दिव्य प्रेम और उसके कर्तव्य को करने का संकल्पित प्रतीक है।और अन्य अंगूठियों का पंचतत्वो का शरीर में नियंत्रण करना अर्थ है।
14-कमरबंद-गर्भ रोग और पेट के नियंत्रण सहित उस के तीन चक्र मूलाधार,स्वधिष्ठान,नाभि चक्रों के अनियंत्रण से शरीर पर आये रोगों को स्वर्ण यानि सूर्य धातु के पहनने से नियंत्रण करना अर्थ है।
15-बिछुवा-पैर की मध्यमा व् अनामिक ऊँगली में चांदी का बिछुवा पहनने से पैर की नसे जो वहां से विशेषक पेट और मूलाधार चक्र तक जाती है,उन्हें नियंत्रित करता है।
16-पायल-टखने की नसों के रोगों को नियंत्रित करती है।और दैनिक कार्य करने को चलते में बजने से घर व् रास्ते में अचानक आये जीव को भी अपनी ध्वनि से हटाने में साहयक है।उससे रात्रि आदि में बचाव देती है।
कुल मिलाकार ऐसे अनेक लौकिक और अलौकिक कारण होते है,जिनमे ये सोलह श्रंगार स्त्री की उन्नति में सौंदर्य सहित सम्पूर्ण साहयता देते है।जो यहाँ संछिप्त में बताये है।मूल विषय शरीर में व्याप्त सोलह शक्ति बिंदु जागरण है।और धार्मिक पर्व पर की गयी शक्ति साधना को अपने में आवाहन करने और आत्मसात करने में ये सहायक होते है।यहाँ ये अर्थ नहीं है की-केवल इन्हीं के पहनने से शक्ति जाग्रत होती है।बल्कि ये अर्थ है की-ये आभूषण द्धारा शरीर में सोलह कलाओं के शक्ति बिंदु जागरण को जो “अंगन्यास की रहस्यमयी विधि” का बाहरी अंग मात्र है।
और इस विषय में विस्तार से किसी लेख में कहूँगा..

 

माँ पूर्णिमा देवी की मूर्ति स्थापना से घर की दुख दरिद्री दूर होती है। घर में शांति आती है। बिगड़े कार्य सफ़लता में बदल जाते हैं। धन, यश, वैभव, शिक्षा आदि की समृद्धि आती है। जीवन सफ़लता की ओर अग्रसर हो जाता है।

इन नवरात्रि में माँ पूर्णिमा देवी की मूर्ति स्थापना कर सकते हैं। श्री सत्य सिद्ध आश्रम बुलंदशहर से माँ पूर्णिमा देवी की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति प्राप्त की जा सकती हैं। ये मूर्ति इतनी चमत्कारिक होती हैं कि घर की सारी दुख दरिद्रता दूर होने लग जाती है।

 

-सत्य ॐ सिद्धाश्रम से महावतार महादेवी सत्यई प्रेम पूर्णिमा की प्राणप्रतिष्ठित मूर्ति को माँगा कर अपने घर,गांव,शहर, तीर्थस्थान पर स्थापित कराये धर्म पूण्य लाभ कमाएं।

-सम्पर्क सूत्र- पुजारी श्री मोहित महंत जी-08923316611
और महंत श्री शिवकुमार जी-09058996822
सत्य ॐ सिद्धाश्रम शनिमन्दिर कोर्ट रोड बुलन्दशहर(उ.प्र.)

-प्राणप्रतिष्ठित देवी प्रतिमा जो शुद्ध पीतल और स्वर्ण पालिशयुक्त है. 9 इंच ऊँची और साढ़े तीन किलों वजन की है, तथा उनका श्री भग पीठ लगभग 9 इंच लंबा अनुपाती चौड़ाई व् ढेढ़ से दो किलों वजन का है।जिसकी दक्षिणा समयानुसार 25 सौ व् भेजने का खर्चा अलग से तक बनता है।।अभी महादेवी की कृपा हेतु सम्पर्क करें।।

माँ माँ है वे बहुमूल्य है- जो मांगेगा मिलेगा।।

!!जय पुर्णिमाँ महादेवी की जय!!

 

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA  से तुरंत जुड़े

 

 

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

शजय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


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