Breaking News
BigRoz Big Roz
Home / Breaking News / स्त्री मिशन को मजबूती देता सत्यास्मि मिशन, स्त्रियों के उत्थान की बात करता सत्यास्मि मिशन, स्त्री शक्ति को अलग पहचान देते श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के सत्यास्मि मिशन को जानें

स्त्री मिशन को मजबूती देता सत्यास्मि मिशन, स्त्रियों के उत्थान की बात करता सत्यास्मि मिशन, स्त्री शक्ति को अलग पहचान देते श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के सत्यास्मि मिशन को जानें

नारी उत्थान, नारी शक्ति, स्त्री मिशन, स्त्रियों की अपनी पहचान आदि यह सब सत्यास्मि मिशन का हिस्सा हैं। सत्यास्मि मिशन स्त्रियों को अपनी पहचान बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

चाहे 1000 साल पहले की बात हो या अबकी, नारी के स्वरूप में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। स्त्रियों को तब भी घर संभालने, बच्चा पैदा करने, उनकी देखभाल करने, पुरुषों को खुश करने इत्यादि के लिए माना जाता था सो आज भी स्त्रियों को स्तिथि कुछ ऐसी ही है। शहरों में भले थोड़ा बहुत बदलाव आया हो लेकिन गाँवों की हालत अब भी वैसी ही है।
विश्व के अनेक देशों में स्त्रियों की हालत बद्दतर है।

लेकिन एक ऐसा मिशन भी है जो स्त्रियों को स्त्री नहीं बल्कि इंसान मानता है, ठीक वैसा इंसान जैसे कि पुरुष, जो हक पुरुष को हैं वो स्त्रियों के लिए भी होने चाहिए, इस कदम पर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज का मिशन “सत्यास्मि मिशन” काम कर रहा है। इस मिशन के साथ लाखो स्त्रियां जुड़ी हुई हैं तो वहीं बहुत से पुरुष भी इस शुभ कार्य में उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं।

तो आइए जानते हैं इस मिशन के बारे में : –

सत्यास्मि मिशन का स्त्री शक्ति के विषय में “पुरुष पूर्ण स्त्री अपूर्ण नवयुग नारी उत्थान। सत्यास्मि मिशन यही ज्ञान दे रहा महान।।

सनातन धर्म में प्राचीनकाल से ही पुरुषों द्धारा स्त्री शक्ति के सार्वभोमिक उत्थान को लेकर अनेक आध्यात्मिक प्रयास रूपी आंदोलन हुए है। जो अंत में केवल पुरुष वर्चस्व ही बन गए जिनमें एक है – शाक्त सिद्धांत:-👉 इस मत में स्त्री शक्ति को प्रमुखता दी गयी है। इस मत में जितनी स्त्री को प्रमुखता प्रदान करने का प्रयास किया गया, उतना ही पुरुस शक्ति का यहाँ वर्चस्व बढ़ा और अंत में स्त्री शक्ति को महावतार आदि घोषित करते करते पुरुष ही मुख्य महावतार बना रहा। क्योकि जिस स्त्री शक्ति की परिकल्पना इस सिद्धांत में की गयी। वो स्त्री शक्ति यथार्थ में थी ही नही, ये सबसे बड़ा सत्य है। जो अनगिनत लोगो को जरा सा भी नही पचेगा। उन्हें एक आघात लगेगा की ये क्या?
आओ ऐसे प्रमाणित करें:-👉शाक्तों की आध्यात्मिक परिकल्पना के अनुसार परब्रह्म निष्कल,शिव,सर्वज्ञ,स्वयं ज्योति,आद्यन्त-विररहित तथा सच्चिदानन्द स्वरूप है।(कुलार्णव 1।6-10)।

जीव अग्नि विस्फुलिंगवत ब्रह्म से आर्विभूत हुआ है। शाक्त तंत्र में शक्ति की कल्पना वैदिक सिद्धांतों के ही आधार पर है। यो आगमों के सिद्धांतों से निगमों के सिद्धांत से किसी भी प्रकार का भेद दिखाई नही देता है। शाक्त आचार का भी विचार नितांत वैदिक है।
गुरु के द्धारा शिष्य को शक्तिपात दीक्षा से ये नितांत गूढ़ रहस्य समझ आता है। यो इसके अनेक पक्ष शास्त्रों से परे व्यक्तिगत गोपनीय रखे गए है।

शाक्त मत में तीन भाव और चार आचार होते है-1-पशुभाव,2-वीरभाव और-3- दिव्यभाव ये तीन भाव है और 1-वेदाचार,2-वैष्णवचार,3-शैवाचार,-4-दक्षिणाचार,5-वामाचार,-6-सिद्धांताचार और-7- कौलाचार ये सात आचार है, जो पूर्वत भावो से ही सम्बंधित है। भाव मानसिक अवस्था है और आचार का अर्थ है, जो विचार या सिद्धांत है। उसे आचरण में लाना अर्थात भाव थ्योरी है, और आचार प्रेक्टिकल है। और इनका अंतिम लक्ष्य श्री विद्या है।ऐसे करते इनके अनेक विस्तारी विषय है। यहाँ थोडा संक्षित में बताया है। और इन सब भावों के लेखक और प्रयोग कर्ता वे सभी पुरुष है-और श्री विद्या के 12 उपासक प्रसिद्ध है-मनु,चन्द्र,कुबेर,लोपमुद्रा,अन्मथ यानि कामदेव,अगस्त,अग्नि,सूर्य, स्कन्द,शिव और क्रोध भट्टारक यानि दुर्वासा मुनि।।यो दत्तात्रेय की दत्तसंहित जो उपलब्ध नही उसका संक्षितिकरण 50 खण्डों में और 6 हजार सूत्रो में किया,जो परुषराम कल्पसूत्र में संक्षित उल्लेख है। और इधर के आचार्यों में गौडपाद श्री विद्या के बड़े भारी उत्पासक हुए। इनके शिष्य शँकराचार्य ने सोन्दर्यलहरी लिखी। ऐसे ही लगभग सभी पुरुष लेखक ही है।

शक्ति का अर्थ:-शक्ति परम् शिव में अपर्थक सिद्ध होकर रहने वाला विश्लेषण है, ना की स्त्री अर्थ है।जेसे फूल में गंध दोनों एक है, यो यहाँ शिव ही शक्ति है। यो इसी शक्ति की आराधना सति व् पार्वती ने की और शिव को प्राप्त किया।

यहाँ पति का अर्थ भी तीन है-1-शिव-2-जीव और-3- पाश यानि जीव के सारे कर्म आदि।।यहाँ पत्नी शब्द शिष्य और शक्ति यानि शिव को प्राप्त करने वाला जीव है। वो जीव चाहे पुरुष हो या स्त्री हो।

शिवलिंग का अर्थ:-यो शक्ति के क्षोभमात्र से स्थल (परमशिव) के दो रूप प्रकट होते है-उपास्य जिसका नाम लिंग है, यानि शिव और उपासक रूप जिसका नाम अंग यानि जीव है।परम् शिव की द्धिरूपता के समान शक्ति में भी दो रूप प्रकट होते है। लिंग को शक्ति का “कला” नाम कहा है। जो प्रवर्ति उतपन्न करती है और अंग की शक्ति ‘भक्ति’ है। जो निवर्त्ति को पैदा करती है। कला शक्ति से ये जगत परम् शिव से उतपन्न होता है। तथा भक्ति के द्धारा यह जगत परमशिव के साथ एकीभूत हो जाता है, और लिंग यानि शिव के भी तीन रूप है- 1-भावलिंग,2-प्राणलिंग और-3- इष्ट लिंग। और जीव भी तीन प्रकार का है-1-कारण यानि प्राज्ञ और-2- भोगांग यानि सूक्ष्म रूप जिसे तैजस कहते है, और-3- त्यागांग यानि ये स्थूल रूप का ये जगत है। ये सब गुरु की कृपा से उसकी अनुग्रह शक्ति जिसका नाम दीक्षा या कृपा है, उससे प्राप्त होता है। यो सर्वत्र गुरु महिमा मुख्य है। यो जहाँ भी ये कथन आया है की- शिव तथा शक्ति और बिंदु वहाँ केवल पुरुष और उसमें जो अर्द्ध स्त्री शक्ति है और उनका सम्मलित रूप बीज यानि वीर्य है, उसे ही कहा गया है।

शिवलिंग की पूजा:- में केवल पार्वती और गणेश व् कार्तिकेय और नन्दी ही क्यों दिखाए जाते है? शिव क्यों नही ? क्योकि जिस शिवलिंग को ये पुंज रहे है, वो शिव पुरुष ही है।यो शाक्त मत में केवल पुरुष और उसकी व्यक्तिगत शक्ति की उपासना ही है, स्त्री नही,और श्री विद्या भी पुरुष की कुंडलिनी जागरण का ही योग विज्ञानं का नामार्थ से अधिक कुछ नही है।

अर्धनारीश्वर:-के चित्र में भी पुरुष का ही स्त्री और पुरुष के रूप में अर्द्धनारीश्वर चित्रण है। पुरुष में ऋण और धन होते है, यो उसका प्रत्यक्ष् चित्र अर्धनारीश्वर के रूप में बनेगा। जो केवल और केवल पुरुष का ही चित्र है।यहाँ कोई स्त्री नही है।

गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय:-में भी निखिलरसामृतमूर्ति श्री कृष्ण के सन्तत कुमार यानि षोढष वर्षीय होने का सम्पूर्ण अर्थ और रहस्य यही है। वहाँ ‘ललिता’ ही पुंरूपधारण यानि जितने भी प्रकार की स्त्री शक्ति गोपियाँ आदि है। वे सभी श्री कृष्ण रूप से ही प्रकट होती है। क्योकि वहाँ भी जितनी गोपियाँ थी। वे सब पूर्ण जन्म के “क्लीं” काम बीज मंत्र से श्री भगवान से दिव्य प्रेम की प्राप्ति को तपस्यारत होने के फलस्वरुप द्धापर युग में स्त्री स्वरूप में प्रकट हो रासमयी हुये। तब वहां स्त्री देखने भर में थी ,पर सब पुरुष ही थे। तभी कृष्ण ही एक मात्र पुरुष सिद्ध होते है। और राधा भी इन्ही की एक शक्ति ही थी-जैसे-पुरुष में + और – होते है। ये वही + यानि × एक्स रूपी कृष्ण में स्वयम्भू स्त्री है -जैसे फूल में गन्ध।ठीक यही सारे भगवानों के विषय में जाने। यो वेष्णव मत में भक्ति के लक्षण प्रदर्शित हुए है।कृष्ण में नही। क्योकि वे तो सम्पूर्ण है।ये कृष्ण ही एक मात्र आनन्दनिकेतन सचिदानंद विग्रह परमतत्व के भिन्न भिन्न प्रतीक है। साधन साम्राज्य का यही मञ्जुल सामन्जस्य यानि साधना का रहस्य विज्ञानं है।और चेतन्यमहाप्रभु स्वयं पुरुष होकर स्त्री बने और कृष्ण से प्रेम कर पाये। और उनका ये प्रचलित महामंत्र “हरे राम हरे कृष्ण..में भी उनके द्धारा स्त्री रूप बनकर केवल पुरुष तत्व की ही उपासना है। कुछों ने अनावश्यक अर्थ कर हरे को स्त्री राधा सीता बनाया है। जो की मंत्र जप से स्पष्ट नही होता है। और वल्लभ दर्शन में कहा भी है की- जब भगवान को रमण करने की इच्छा उतपन्न होती है। तब वे अपने आनन्दादि गुणों के अंशों को तिरोहित कर स्वयं जीवरूप ग्रहण कर लेते है। उनकी श्री यानि व्यक्तिगत शक्ति ही को वे अपने से प्रकट कर रमण करते है। ना की किसी बाहरी स्त्री शक्ति से। यो यहाँ उन्ही की अर्द्ध पुरुष शक्ति का नाम राधा है। जिसे स्वतन्त्र गठित कर एक स्वतंत्र स्त्री शक्ति बना दिया, जो की है नही। और जो आज संसार में पूजापाठ के नाम पर भागवत में प्रदर्शित है।वो मात्र अनावश्यक बाहरी रूप है। जिससे कोई विशेष लाभ नही है। ये सब पुरुषों का साहित्य और उनकी व्यक्तिगत आत्मुन्नति का तांत्रिक साधना जगत का अति गम्भीर राज्य का लेखन है।जिसे निम्न कथन से अंतिम रूप दिया है-

भोगो योगायाते सम्यक् पातकं सुकृतायते।
मोक्षायते च संसारः कुलधर्मे कुलेश्वरि।।

दुर्गासप्तशती:-में भी पुरुष देव और पुरुष दैत्य के बीच का युद्ध है। और उसमें देवताओं ने अपने अंदर की स्त्री शक्ति को प्रकट कर एक किया जो “दुर्गा”कहलायी। ओर उस एक्त्त्व प्राप्त पुरुष शक्ति ने दैत्यों का संहार किया। और जहाँ से आई वही समा गयी, यानि पुरूषो से आई और पुरुषो में समा गयी। और पुरुषो की ही अभय वरदान दिया। जब जब संसार में दानवी बांधा उपस्थित होंगी,मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूंगी। और एक स्थान पर भी स्त्रियों के विषय और उनके हित को कोई वरदान वाक्य नही कहा है। तथा पुरुष ही लेखक मार्कण्डेय ऋषि और वेश्य,समाधि,ब्रह्मा,शंकर,विष्णु आदि… और श्रोता है- पार्वती। तब यही यहाँ प्रमाण बहुत है।यो सभी भगवानो की सन्तान प्रत्यक्ष में पुत्र ही दिखाए है।

शिव के गणेश,कार्तिकेय।राम के लव, कुश व् कृष्ण के प्रधुम्न।कन्या किसी के नही है। जबकि कन्या से ही आगामी सृष्टि है। यो केवल पूर्णिमाँ देवी के हंसी पुत्री व् अरजं पुत्र है।जो संसार में स्त्री पुरुष का स्वरूप है।और पूर्वत सारी दस महाविद्या सन्तान विहीन और केवल विध्वंसक रूपी है।जो स्त्री का स्वरूप नही है।पूर्णिमाँ ही सम्पूर्ण स्त्री शक्ति का सम्पूर्ण स्वरूप है।

सत्यास्मि दर्शन:-में वर्णित सत्यई पुर्णिमा स्वतंत्र स्त्री शक्ति है।ये अनादि वो स्त्री शक्ति है, जो वेदों से पूर्व एक पुरुष सत्य और उसके साथ स्त्री शक्ति स्त्री है। जिनके द्धारा ही सत्य पुरुष ने प्रेम रमण कर ये जगत उतपन्न किया है। और इन्ही की सभी स्त्रियां स्वरूप है।ये नवीन नही है। और ये स्त्री शक्ति का सम्पूर्ण प्रतीक है, जिन्होंने पुरुष काल में पुरुष को सम्पूर्ण होने में अपना सहयोग दिया,और अब स्त्रीकाल में पुरुष इनका यानि इनके सर्व स्त्री स्वरूपों का सहयोग दे रहा है।तभी सर्वत्र स्त्री सार्वभोमिक उन्नति की और है। और इनकी पूजा का अर्थ प्रतीक की पूजा नही है। बल्कि किसी भी जीवन्त स्त्री का एक रूप लेकर उसे पूजनीय बनाना यहाँ उद्धेश्य नही है। उसकी जगहां एक मूल स्त्री की सम्पूर्ण शक्ति का सम्मलित रूप को इस रूप में प्रकट कर, विश्व में स्त्री शक्ति को उसकी सर्वांगता को उजागर करने का धर्मआंदोलन है।जो अभी धर्म में निम्न स्तर की शिक्षित है। वे अपने में छिपी स्त्री की सम्पूर्ण शक्ति में विश्वास नही कर पाती है। उन्हें किसी अन्य सहारे की आवश्यकता होती है-जैसे-बच्चों को दिया जाने वाला ज्ञान,तो उनके लिए ये स्त्री शक्ति की प्रतीक है। और जो स्वयं में स्वयं की स्त्री शक्ति को जाग्रत करने के योग रहस्य को जान साधना रत है। उन्हें इसकी कोई आवश्यकता नही है। जैसे बड़े विद्यार्थी को पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति पर ज्ञान हो जाता है की- ये सम्पूर्ण ज्ञान मेरे ही अंदर व्याप्त है। मैं ही ज्ञानमय हूँ। तब वो जीवंत ज्ञान और सम्पूर्णता का स्वामी है। तब उसे अन्यों अपने ही स्त्री पुरुषों को समझाने के लिए अपने को प्रमाणित करना पड़ता है-जैसे ये सब पूर्वत पुरुष अवतार है। वेसे ही स्त्री भी भौतिक और अध्यातिक रूप से सम्पन्न होकर अवतार बने। यही यहाँ सत्यास्मि दर्शन का पूर्णिमा की चतुर्थ धर्म नवरात्रि आदि की स्थापना का ज्ञान है। जब स्त्री इस स्तर को प्राप्त हो जायेगी की- मैं बिना किसी अग्नि और ब्राह्मण और समाज,साक्षी,मंत्र,7 वचनों के, केवल अपने और पुरुष प्रेमी की व्यक्तिगत प्रेम शक्ति के साक्षी मान कर परस्पर विवाह और सामाजिक सम्बंधों को चला सकती हूँ।तब उसके बीच किसी ईश्वर या उसके किसी पूर्वत प्रतीक,मन्त्रों,वचनो की कोई आवश्यकता नही रह जायेगी। इतने ऐसा करने में अभी या जब तक सक्षम नही है, तब तक ये प्रेम प्रतीक पूर्वत ईश्वरीय प्रतीकों की आवशयक्ता रहेगी।यही सत्यास्मि मिशन का ज्ञान दर्शन है।।

-कितनी लड़कियां और महिलाएं है जो स्वयं नोकरी पर होकर किसी बेरोजगार लड़के से विवाह कर जीवन जी सकती है?

-कितनी लड़कियां या महिलाएं है- जो अपने से निम्न स्तर के वेतन वाले व्यक्ति से विवाह कर सकती है? सभी अपने से उच्चतर व्यक्ति से विवाह करने में अपना व्यक्तित्त्व और गरिमा बढ़ाने का भाव स्वयं अभी पुरुष के ही व्यक्तित्त्व से अपना स्तर ऊँचा मानना स्वयं पुरुष की दास्तवत्ता को अपना है। इससे कितनी स्त्री मुक्त है?

-कितनी स्त्रियां है, जो ये ज्ञान जानकर की-उनकी सारी पूजा उपासना केवल पुरुष प्राप्ति और भौतिकता की प्राप्ति को लेकर ही है? कितनी है-जो केवल अपनी आत्मिक उन्नति को ही धर्मउपासना साधना करती है?

-कितनी स्त्रियों ने प्रत्यक्ष सिद्धि की प्राप्ति की है?

-पूर्वत सभी स्त्री सती अनसूया आदि की भी शक्ति चमत्कार का स्रोत्र पुरुष ही था। स्वयं का आतबल नही। वही आज भी कितनी स्त्री अपने चरित्र के बल से अपने पति बच्चों को उच्चतर प्रेरित या केवल एक शाप या वरदान से बदल सकती है?

-कितनी स्त्रियां है की-जो अपने ज्ञान अनुभव से साधना जगत के तंत्र-मंत्र-यंत्र आदि स्त्री सम्बंधित स्वतंत्र शास्त्र लिख सकती है?

-कितनी स्त्रियां है, जो अपने प्रशाशनिक अधिकारों का स्त्रियों की उन्नति में सहयोग दे रही है?

-कितनी स्त्रियां है- जो अपना स्वतंत्र मन्दिर धर्म पीठ केवल स्त्री शक्ति को अपना आदर्श बनाकर महंत या पीठाधीश या धर्माचार्य या महामण्डलेश्वरी बनी है? आज भी पुरुषों के माध्यम से ही वे अपने को धर्म के पदों पर शोभित पाकर गौरान्वित अनुभव करती है?

ऐसे अनगिनत उदाहरण है-जिनमे अभी स्त्री को आगे आना है,यो जब तक ऐसा करने में सबल नही है। तब तक उसे स्त्री शक्ति के प्रतीकों को अपना ध्यान का केंद्र बनाकर अपनी भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति को अपनाना पड़ेगा।

सत्यास्मि मिशन इन सभी धर्म प्रश्नों को स्वतंत्र रूप से प्रत्यक्ष मना कर स्त्री शक्ति की उन्नति को बढ़ा रहा है। आज जरूर अल्प है। कल अवश्य कल्प होगा।।
यो स्त्री अपने सम्पूर्णत्व को सभी रूप में प्रकट करो। यही अहम् सत्यास्मि-मैं ही शाश्वत सत्य और नित्य वर्तमान हूँ, का अर्थ घोष है।इसे जानना और अपना ही होगा।

 

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब

https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े

********

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


Discover more from Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Check Also

Mumbai Family Death Mystery: Watermelon Not the Cause Behind 4 Deaths, Forensic Probe Reveals Shocking Details

Mumbai Family Death Mystery: Watermelon Not the Cause Behind 4 Deaths, Forensic Probe Reveals Shocking Details

Leave a Reply

Discover more from Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading