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आज 9 सितम्बर को है पितरों को खुश करने का दिन, पितरों को समर्पित “कुश ग्रहणी या पिठोरी अमावस्या” में कुश के महत्व को बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

पितरों को खुश करने का दिन यानि पितरों को समर्पित “कुश ग्रहणी या पिठोरी अमावस्या” में कुश के महत्व को समझा रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

आज 9 सितंबर 2018 रविवार के दिन अमावस्या है, जिस कारण इस दिन का महत्व बहुत बढ़ गया है क्योंकि रविवार को सूर्य अपनी सिंह राशी में है व् सिंह राशि में सूर्य चंद्र बुध है। सूर्य के मंगल का षडाष्टक योग बना है।साथ ही आज सूर्य की चंद्रमा के साथ युति बनी है। शुक्र का 8 बजे के बाद पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र  भी है। इस समय अपने पितरों को प्रसन्न करने से नोकरी,कारोबार,खेती और विद्यार्थियों की उत्तम पढ़ाई,परिवार में धन और सुखी जीवन का वरदान मिलता है।

पितृ अमावस्या में कुश का महत्त्व और क्यों आवश्यक है,कुश?:-

पूर्णिमां पुराण में वर्णित कथा:- एक समय अमोघ और हंसी ने अपने पिता सत्यनारायण व् माँ सत्यई पूर्णिमां से पूछा की-ये अमावस्या और पूर्णिमा के पूजन का और पितरों के पूजन आदि और शास्त्रों में वर्णित कुश के पूजन का क्या महत्त्व है।
तब देवी सत्यई पूर्णिमां ने दोनों को पास बैठकर संछिप्त में ये आत्मज्ञान कथा कहीं की- अमावस्या हो या पूर्णमासी,ये दोनों का पूजनकाल साय से रात्रि और प्रातः तक ही होता है।इसमें चन्द्रमाँ के दोनों स्वरूपों की पूजा होती है-पूर्णिमां देवत्त्व उपासना है और अमावस्या पितृ उपासना है।यानि मनुष्य का जन्म लेने का उद्धेश्य है- अपनी आत्मा की प्रावस्था परमात्मा प्राप्ति के ज्ञान की सोलह कला के दोनों पक्षों को जानना और अपनाना-यानि संसार में जो भी अच्छा और बुरा है,वो सब उपयोगी है-जैसे-रात्रि का भी अपना पूरा महत्त्व है और दिन का भी पूरा महत्त्व है।यो मनुष्य के दो पक्ष स्त्री और पुरुष है और इनका परस्पर सहयोग लेने से संसार चलता है।यही ईश्वर का वैदिक ज्ञान है।यो अँधेरे यानि अमावस और उजाले यानि पूर्णिमां का अपने अपने में सम्पूर्ण महत्त्व अर्थ है।तभी पूर्णिमां की भांति अमावस की भी पूजा है।बहुत से धर्मों में अमावस को शैतान का दिन बनाकर मनुष्य को अँधेरे से डराया है और तब उसकी पूजा को निषेध किया है।हमारे धर्म में केवल ये अँधेरे यानि अज्ञान से ज्ञान की और ले चलने का दिवस अर्थ है।यही गायत्री का अर्थ भी है।
और हमारे यहां उत्तरायण और दक्षिणायन पक्ष के प्रारम्भ और अंत के संधिकाल के दोनों क्षणों को पूज्य माना है।क
क्योकि ये दोनों समय जिसमें वर्ष एक आत्मा है और इसके दो जीवंत पक्ष स्त्री और पुरुष उत्तरायण और दक्षिणायन प्रकर्ति के दो पक्ष है।और इन्ही के और भी माह के दो पक्ष अमावस्या और पूर्णिमां भी स्त्री और पुरुष दो पक्ष है।और इनका संधिकाल ही इन स्त्री और पुरुष या इंगला पिंगला या सूर्य और चन्द्र नाड़ी का प्रेम मिलन ही सुषम्ना नाडी यानि एक मन होना या कुण्डलिनी जागरण है।और ठीक इस संधिकाल में किया मनुष्य का अपनी आत्मा का ध्यान उसे सभी सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों से मुक्त कराता है।यो ही प्रातः और सायंकाल में ध्यान करने को विशेष कहा है।यो ये अब का समय जो सनातन वेदिक गणित ज्योतिष से सितम्बर का माह या आगे पीछे होता हुआ समय है,वो उत्तरायण और दक्षिणायन का संधिकाल होता है।यो इस समय की अमावस्या को मनुष्य के मृत्युकाल से प्रारम्भ होकर,जिसे श्राद्धों का समय माना है और पूर्णिमां का समय मनुष्य के जीवनकाल के प्रारम्भ होकर क्वार की नवरात्रि जो धर्म नवरात्रि कहलाती है,इसे बड़ा महत्त्व पूर्ण माना गया है।यो ये अमावस से पूर्णिमा तक एक प्राकृतिक सन्धिकाल समय है।जिसे प्राकृतिक सुषम्ना नाड़ी या प्रकार्तिक विश्व मन का मध्य काल कहते है।इस समय विश्व कुण्डलिनी जाग्रत होने का समय होता है और जो व्यक्ति इस समय जप ध्यान और दान करता है।उसका दोनों पक्ष यानि भौतिक और आध्यात्मिक से परे एक आत्मपक्ष में स्थिति की प्राप्ति होती है।यो ये विश्व कुण्डलिनी का प्रारम्भिक पक्ष अमावस्या है।जिसमे ध्यान करने से मृत्यु से जीवन की कला का ज्ञान उपलब्ध होने का योग बनता है।यो इसे पितृ यानि अपनी ही अनगिनत जन्मों की पूर्व जन्म यात्रा के पथ से,वर्तमान से नवीन जन्मों की नवीन यात्रा का पथ खुलने का पक्ष ही पितृ अर्थ है।और हमें जन्म देने वाले माता पिता और उनके माता पिता की जो कड़ी है,उस सब आत्मा की जो एक श्रंखला बनी हुयी है,उसका जो मध्यकाल यानि बीच का जन्म ये वर्तमान है।इसमें स्थिर होकर ध्यान करने पर ही सभी ये 7 से 14 पीढ़ियों की कड़ी नष्ट या शुद्ध होकर होकर हमें आत्म ज्ञान का पथ मिलता है।यो ये समय ज्ञान ध्यान को सर्वोत्तम है।

कुश के धारण की संछिप्त ज्ञान विषय कथा:- अनादिकाल में जब किसी भी आत्म नियम के संकल्प को धारण करने के इस प्राकृतिक रूप से बने घास की डोरी से जनेऊ बड़ा पवित्र महत्त्वपूर्ण माना जाता था।पहले ये केवल संकल्प के तौर पर शिष्य या दीक्षित साधक के पूर्वजन्म के सभी बुरे या अज्ञान कर्मों के दोष या शाप मोचन को किये उसके उलटे कन्धे पर कुश को पूजन करते रखा जाता था।और कुश से निर्मित डोर को पहनाया जाता था।यो तुम हनुमान जी को उनके कंधे पर मुंज जनेऊ पहने या चढ़ाते देखोगें।क्योकि वे ब्रह्मचारी का प्रतीक है।और बाद के वर्षों में जब द्धापर काल में श्री कृष्ण के यदुवंशी आपस में ही युद्ध करके, गंधारी के शाप वश कुश के ही अस्त्र बनने से मारे गए।तब से और भी कुश को वेदिक यज्ञ पूजन के बदले, इस अस्त्र बनने के शाप से मुक्ति दिलाने हेतु,पितरों के इस दिवस पर ये कुश का भी शाप विमोचन किया जाता है।ऐसे अनेक प्राकृतिक संस्कार है,जिन्हें जीवन्त और उपयोगी मानकर उनका भी पृथ्वी पर जन्म लेने और उनका भी पितृवत् शोधन संस्कार किया जाता है।जो विस्तृत ज्ञान विषय है।यो कुश का उपयोग है।

और वर्तमान की प्रचलित ज्ञान बातें भी यहां बताई जा रही है।की- भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुश ग्रहणी अमावस्या यानि कुश को ग्रहण या एकत्र करके उसका पितृ पूजन में उपयोग करने वाले दिवस कहते है। इसे देव पितृ कार्य अमावस्या आैर पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह अमावस्या 9 सितंबर 2018 रविवार को पड़ रही है। मान्यता है कि- इस दिन इस दिन व्रत और अन्य पूजन कार्य करने से पितरों की आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है।भारतीय शास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव होता है, इसीलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण आैर दान-पुण्य का अत्याधिक महत्व होता है। इस दिन कुश से पूजा की जाती है।

कुश के कर्इ प्रकार होते है:-

कुश ग्रहणी अमावस्या को विभिन्न प्रकार कुश से पूजा करने का विधान है। शास्त्रों में 10 प्रकार कुशों का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि घास के इन दस प्रकारों में जो भी घास आपके क्षेत्र यानि प्रदेश में हो,वो आसानी से मिल सके, उसे पूरे वर्ष के लिए एकत्रित कर लिया जाता है।विशेष बात ये है कि- सूर्योदय के समय घास को केवल दाहिने हाथ से उखड़ कर ही एकत्रित करना चाहिये। और उसकी पत्तियां पूरी की पूरी सबूत होनी चाहिये। यो इस कुशोत्पाटिनी अमावस्या को ही वर्ष भर के धार्मिक कार्यों के लिये कुश एकत्र की जाती है, क्योंकि आज के दिन ही इकट्ठी की गयी कुश का प्रयोग प्रत्येक धार्मिक कार्य के लिए किया जाता है।यद् रहे की- कुशा का सिरा नुकीला होना चाहिए आैर यदि कुश की गांठ जो जड़ से उखाड़ने पर, इसमें सात पत्ती हो तो सर्वोत्तम कुश होता है।इसका कोई भाग कटा फटा न हो आैर कुशा तोड़ते समय ‘हूं फट्’ मंत्र का जाप करते रहना चाहिए।

कुश ग्रहणी यानि पिठोरी अमावस्या का महातम्य:-

1-इस दिन पूर्व या उत्तर मुक्त बैठ कर ही पूजा करें। इस दिन का महत्व बताते हुए कर्इ पुराणों में कहा गया है कि रूद्र अवतार माने जाने वाले हनुमान जी कुश का बना हुआ जनेऊ धारण करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कांधे मूंज जनेऊ साजे। साथ ही इस दिन को पिथौरा अमावस्या कहते हैं। आैर इस दिन दुर्गा जी की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार स्वयं पूर्णिमां देवी ने पार्वती जी को और पार्वती ने देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी को और आगे समाज में इस व्रत का महत्व बताया था। इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा संतान प्राप्ति आैर उसकी कुशलता की कामना के लिये उपवास किया जाता है।जो ऐसे ही त्रिगुणों-स्त्री+पुरुष+बीज- के चार धर्मों यानि गुणों-अर्थ-काम-धर्म-मोक्ष की सोलह कलाओं का चार गुना यानि चोसठ कलाओं का पूजन देवी इर् देव रूप में चावल,आटा,जल आदि से पिंड बनाकर किया जाता है।जो दुर्गा सहित सप्तमातृ आैर 64 अन्य देवियों के रूप में पूजा की जाती है।

और शास्त्रज्ञ उपाय क्या करें:-

1-आज सारे काम सुबह सूर्योदय से यानि 8 बजकर 1 मिनट के बाद ही करें।

2- इसके बाद अपने स्नान के जल में थोडा गंगा जल डालकर नहाएं।

3-पुरुष सफेद वस्त्र पहनें,स्त्रियां सुहागन वस्त्र पहने,तब पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म करें।

4-अपने पितरों के नाम पर चावल, दाल, सब्जी, दक्षिणा या पका हुआ भोजन का दान पण्डित या गरीब को करें।

5- एक लोटे में दूध, जल, सफेद फूल डालकर पूर्णिमां देवी या अपने इष्टदेव पर चढ़ाएं।

6-आज केवल सरसों तेल का ही दीपक जलाएं।

7-तब ही ऊपर दी गयी सभी खाने और दक्षिणा आदि वस्तुओं का दान मंदिर में करें।

पिठौरी अमावस्या को ग्रहों का अद्भूत संयोग है मिलेगी बहुत सफलता-

1- शाम को चन्द्रमाँ के अमावस रूप की पूजा करें।

2- तांबे  का दान अवश्य करें। क्योंकि तांबे  पात्र का दान करना अच्छा होता है।

3- चांदी का दान करें।चांदी  पितरों  की  प्रिय धातु है।

4- शाम को 4 बजे पूजा स्थान और अपने मुख्य द्वार पर दोनों हाथ की और एक घी का सीधे हाथ पर व् एक तेल का दीपक उलटे हाथ पर जलाएं।

5- शाम को थाली  में एक आटे का दीपक बनाकर का जलाएं।
व् थाली में मिठाई, फल, चावल रखें और पूरे घर के इस थाली को धुप दीप दिखाते घुमाएं अर्थात घर का कोई भी  कोना बाकी ना रहें।फिर घर से निकलकर पूर्व  दिशा में जाएं और वहाँ थाली रख कर वापस आएं और अगले दिन प्रातः उन थाली से सभी खाने की वस्तुओं को किसी भिखारी को दान कर दें।नहीं तो मन्दिर में रख आये।
तब आप अपने घर में पितरों की कृपा से खुशियों का भंडार पाएंगे।

6-इस दिन बहुत से भक्त अपने गांव में जाकर पितरों के थान पर दीप जलाकर गंगाजल मिश्रित जल चढ़ाते है।वो भी कर सकते है।ये सब अपने पितरों के प्रति प्रेम स्मरण भरी श्रद्धांजलि होती है।

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


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