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तंत्र त्राटक (भाग-1) से कैसे प्राप्त करें अन्तर्द्रष्टि, इससे कैसे कर सकते हैं गहन अध्ययन, जानें सब श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से

 

 

 

तंत्रा त्राटक से कैसे प्राप्त की जा सकती है सिद्धि? इससे कैसे सीखा जा सकता है सम्मोहन और योग निंद्रा, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज विस्तारपूर्वक बता रहे हैं।

 

 

“तंत्रा त्राटक” से कैसे गहन ध्यान और अन्तर्द्रष्टि की सिद्धि प्राप्त करें-आज इस विषय पर स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहे है।जो उन्होंने अपनी पुस्तक “सम्मोहन और योग निंद्रा” तक में भी विशेष रूप से बताया है:-
इसे तंत्रा त्राटक क्यों कहा गया है?:-

 

“स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज इस अद्भुत और अकल्पनीय ज्ञान के लिए किसी से कोई धन नहीं लेते हैं वे सिर्फ अज्ञानता को दूर कर ज्ञान को बांटने का काम करते हैं।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज, श्री सत्यसिद्ध शानिपीठ और सत्यस्मि मिशन के संस्थापक हैं। स्वामी जी गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोल रहे हैं तो दूसरी ओर सत्यस्मि मिशन के माध्यम से महिलाओं के उत्थान का भी कार्य कर रहे हैं। संक्षिप्त में बताते हुए अगर कोई इन सबको आगे बढ़ाने में, पूण्य कार्य करने में सहयोग करना चाहता है तो आप भी स्वामी जी के आशीर्वाद से पुण्य के भागीदार बन सकते हैं। लेख के अंत में सभी जानकारियां हैं आप पढ़ें और दूसरों को भी पूण्य कमाने के लिए प्रोत्साहित करें”।

 

 

 

तंत्र त्राटक को जाने

【भाग-1】

पहले त्राटक का अर्थ जाने,हमारे अंदर व्याप्त आकर्षण और विकृष्ण दो विरोधी शक्तियां कार्यरत होती है,और ये दोनों प्रत्येक अंग के माध्यम से अपना कार्य करते हुए शरीर में सन्तुलन बनाये रखती है।यो ही हमारी दो द्रष्टि के द्धारा ये देखने का और उस देखे द्रश्य को मस्तिष्क में इकट्ठा या संकलन करती है।यो विभिन्न रंग और उनसे निर्मित ये प्रकर्ति की वस्तुओं के चित्रों को एक द्रष्टि से देखना और दूसरी दृष्टि से उसे और उसकी गति को भी बनाये रखना व् दूसरे ही पल उसकी सुचना से लेकर अंदर और फिर बाहर आना आदि क्रियाओं का इन्हीं दो दृष्टि नेगेटिव और पॉजिटिव से कार्य चलता रहता है।अब इन्हें और इनके पीछे जो मन है,वहीं सब दृश्यों का निर्माण कर रहा है क्योकि यदि ये दृष्टि देखा रही होती तो,मनुष्य के सोने या मरने के बाद भी ये कार्य करती,परन्तु ऐसा नहीं होता है।तब कौन है,जो इनके माध्यम से कार्य कर रहा है?वहीं जो इनके द्धारा देख रहा है,उसे ही स्तब्ध करना या स्थिर करना, इन दो दृष्टियो को बिना द्रश्य के यानि ऐसी आधारहीन अवस्था में स्थिर करना,जहां से दिखाई देने वाली प्रकर्ति के संयोग से कोई चित्र नहीं बन सके।उस आधार में,जिसेअंधकार कहते है,वहाँ स्थिर करना ही तीसरी अवस्था जो मन है।उस सहित एक करने का नाम त्रि अटक यानि त्राटक कहलाता है।और इन सबके साथ जो तन्मात्राएँ है,जो 64 है।उन्हें और उनके समीकरण को भी स्तब्ध करके अपने अनुसार समझ कर, चलना यानि नियंत्रण करना ही,तंत्रा कहलाता है।यो दोनों ज्ञान और विधि मिलकर “तंत्रा त्राटक” अर्थ है।

 

 

अंधकार ही क्यों:-संछिप्त में बताता हूँ की-

क्योकि ये अवस्था यानि अंधकार हमारे लिए प्रकाश की कम मात्रा है और अब हमें प्रकर्ति से निर्मित चित्रों को नहीं देखना पड़ेगा और यहीं इस ब्लेंक आधार को अपने लिए,बाहर की दृष्टि को समाप्त करके यानि उसे स्तब्ध उठा रोक कर,अब जो अंदर से द्रष्टा है,उसके द्धारा यानि अंतर दृष्टि से अपने संकल्प या चिंतन से बने दृश्यों को भी, जिन्हें हम स्वप्न कहते है,उन्हें भी जाग्रत अवस्था में उत्पन्न होते देखेंगे और उन्हें भी स्तब्ध यानि रोक देंगे।यो इन्ही सब क्रिया योग के लिए अंधकार ही हमारा ब्लैकबोर्ड आधार होता है।

ये त्राटक बड़ा ही सहज और सफलता देने वाला है, ये रात्रि में किया जाने वाला त्राटक होने से “तंत्रा त्राटक” कहलाता है। इसे मायाजाल विद्या की प्राप्ति होती है और अंत में बहिर समाधि की भी प्राप्ति होती है। जो भी साधक विद्यार्थी इसे करता है। उसे अति शीघ्र ही मन बुद्धि की एकाग्रता की प्राप्ति होती हुयी स्मरण शक्ति का असाधारण विकास होता है।
आओ विधि जानें:-
सत्यास्मि योग कहता है की- साधक इसे रात्रि में तब करे, जब अंघेरा हो और अपने कमरे में ऐसा कुछ भी नही हो, जो मन को बाटे, यो नितांत एकांत हो, तो बहुत अच्छा है। अन्यथा आप एक आरामदायक अवस्था में बैठ जाये और अपनी दोनों द्रष्टि को अपने कुछ सामने के अंधकार में एकाग्र करें तब आपको वहाँ एक कुछ अग्नि और श्वेत रंग का बिंदु दिखने लगेगा। बस उसे ही देखते रहना है। चूँकि अंधकार में त्राटक करने पर, सहज में ही मन का प्रारम्भिक रूप बिंदु रूप में ही दर्शन होता है। ये मन का द्धार है। यही से मन में प्रवेश होता है। यो इसे ही लगातार अपनी खुली आँखों से ध्यान से देखते हुए, ध्याते रहना ही “त्राटक” कहलाता है। और इस त्राटक में एक विशेष बात यह है की- इसमें यदि आपकी पलकें झपकती है, तो झपकने देना है,इस प्रकार से सहजता से सामने को देखते रहना ही इस त्राटक को अन्य सभी त्राटकों से अलग और सर्वश्रेष्ठ बनाता है। धीरे धीरे इसी बिंदु में आपको अपनी दैनिक स्म्रति के द्रश्य बनते बिगड़ते दिखाई देंगे। तुम्हारा काम केवल इतना है की- उन्हें द्रष्टा भाव से साक्षी बन देखते रहना भर है। इसमें कोई मंत्र नही जपना है। जो भी मनन चिंतन चले, चलता रहे, परवाह नही करें। उसे रोके नही, उसका विरोध नही करें, केवल अँधेरे में बिंदु को घूरते रहना है। आगे चलकर बिंदु बड़ा होता जायेगा। ज्योति बन जायेगा। ये मन की शक्ति का विकास है। उसी ज्योति में मन की सभी 64 तन्मात्राओं से बना भूतकाल, वर्तमान काल व् भविष्यकाल की स्म्रतियां और साथ ही जिनसे इस भौतिक संसार में सम्बन्ध है। वे सभी रिश्ते नाते द्रश्य बन कर दीखते रहेंगे। तो रहे बस देखते।और ऐसे ही निरन्तर अभ्यास करते हुए, इसी अवस्था में ही मानसिक शक्ति की अति व्रद्धि होती है। चमत्कारिक्ता मायाजाल के रहस्य सामने आते है। मन सुद्रढ़ होता है।इच्छा और उसे प्राप्त करने की शक्ति यानि इच्छा शक्ति या विलपावर बढ़ती जाती है। असाधारण आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। और धीरे धीरे आप बाहरी चेतना को त्याग कर अंतर्चेतना से जुड़ जाते है।ठीक इसी अवस्था के अभ्यास के चलते हुए,एक दिन यहीं, आप देह के भान को भूलते है। एक ऐसी स्थिरता की प्राप्ति करते है।जिसमें मस्तिष्क विषय शून्यता को प्राप्त होता है।यहां मस्तक का सो जाना या निष्क्रिय होना अर्थ नहीं है बल्कि यही अवस्था में, विषय शून्य और चैतन्य समाधि का प्रारम्भ है।और भी आगे बहुत रहस्य है। तत्व दर्शन है। नाँदों की प्राप्ति है। सम्मोहन शक्ति का असाधारण विकास है। अन्तर्द्रष्टि सिद्धि है। विचार प्रेक्षेपण सिद्धि है.. आदि आदि अनगिनत माया जगत की सिद्धियां है। और निर्विकल्पता भी प्राप्ति है।जिसे करो और स्वयं जानो।

विशेष:-

त्राटक के अंत में अपनी आँखे स्वच्छ पानी से छपाके मार कर धो लेना। इससे आखों में आई गर्मी शांत हो जाती है।और प्रारम्भ में पन्द्रह मिनट से ज्यादा नही करना चाहिए। कम से कम पन्द्रह दिन तक,बिना अधिक बढ़ाये,केवल इतना ही समय रखना अनिवार्य है। इसके बाद तीन मिनट के अंतराल से बढ़ाते जाना और तीन माह बाद स्वयं ही आप अनन्त त्राटक में खो जायेंगे।इतने नियम का पालन अवश्य करें।
और जो सत्यास्मि गुरु मंत्र ध्यान विधि से दीक्षित है। उनके लिए ये आवश्यक नही है। हाँ जिज्ञासा और ज्ञान को केवल पन्द्रह मिनट रात्रि को कर सकते है ज्ञान ही आत्मविकास का साधन है।।
मेरी पुस्तक सन् 2002 में प्रकाशित हुई थी।जो मेरे ही सचित्रों के साथ प्रयोगो के साथ प्रमाणिक चित्रो के साथ छपी है।इसे आप इस स्थान से खरीद कर अध्ययन कर सकते है।
त्राटक के अनछुए पहलुओं के साथ अन्य त्राटकों के विषय में आगामी लेखों में [भाग-2] बताऊंगा।

-“सम्मोहन से योग निंद्रा-एक विज्ञानं” को खरीदने के लिए-बी.आर.पी.सी.(इंडिया)लि.
4222/1,अंसारी रोड,दरिया गंज,नई दिल्ली-110002।

 

 

“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

 

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब

https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े

 

 

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


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