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शिव क्या हैं? क्या है शिव का अर्थ? श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी से शिव के अनेक रूपों को जानें, जानें शिव के संसार को

शिव ही शक्ति हैं, शिव ही संसार हैं, शिव ही ज्ञान हैं, शिव ही जीवन हैं, शिव जी समस्त ब्रह्मांड हैं। कहते हैं शिव को जिसने जान लिया उसने संसार की समस्त चीजों को जान लिया, उसने जीवन को जान किया।

भगवान शंकर अपने भक्तों पर जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए इन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। भगवान शिव ही आदि अौर अनंत हैं जो पूरे ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान हैं। भोलेनाथ एक लोटा जल अर्पित करने से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। जिस पर भगवान शिव की कृपा हो जाती है उसके हर कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान शिव के बहुत सारे स्वरूप व नाम हैं। उनके हर नाम में विशेष शक्ति छिपी हुई है। भगवान शिव के नामों के जाप से व्यक्ति को हर परेशानी से मुक्ति मिल जाती है।

आज श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज शिव के परम ज्ञान को आपतक पहुंचा रहे हैं यह वह परमज्ञान है जिसके जानने और समझने से संसार की बहुत सारी चीजें समझ आ जाएंगी।

शिव शक्ति विवाह पर्व सावन यानि श्रावण और उसके सोलह सोमवार यानि सोलह कला और शिव का सत्यार्थ:-

नियमित सत्संग मे भक्तों ने स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी से पूछा कि- शिव कौन है? और शिव का सत्य अर्थ क्या है?
तो स्वामी जी बोले कि– शिव के बारे मे जो समाज मे प्रचलित है, वो एक अनादि व्यक्तित्व रुप है कि शिव एक योगी आदि है, उनका विवाह पहले सति से ओर उनके सती होने के बाद आगे पार्वती से हुआ ओर उनके दो पुत्र कार्तिकेय व गणेश है आदि आकेदि बाते, जो प्रचलित है जो ज्ञान कि द्रष्टि से बडी तर्कमय है कि- एक अनादि व्यक्ति जिसका जन्म ना म्रत्यु व सर्व गुण सम्पन्न तथा राग वैराग से परे ओर एक तरफ़ वो अपने समकालिन अनादि अवतरित हुए भाई ब्रहमा के वंश मे उत्पन्न प्रजापति जो एक प्रकार से शिव का भतिजा है, उसकी लडकी सति से कैसे विवाह कर सकता है व सति के आत्मदाह के उपरान्त वो पुनः अगामी ब्रह्मा के वंश मे ही हिमालय कि पुत्री पार्वती से विवाह कर लेते है, जोकि एक प्रकार से परपोती आदि हुयी व ये विवाह भी विवाह नही है, बल्कि एक वरदान है कि पार्वती ने घोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया व वरदान के रुप मे उनसे विवाह का वर माँग लिया ओर जो जन्मा है वो मरेगा जरुर, इस शाश्वत सत्य के आधार पर, पार्वती कभी की समाप्त हो गयी होंगी, क्योकि जब राम व क्रष्ण जैसे मनुष्य जनम में अवतार का, इस जगत मे जन्म होने पर शाश्वत ना रहे, तो पार्वती का मनुष्य शरीर में जन्म लेने के बाद उनका शरीर कैसे शाश्वत यानि अमर रह सकता है? कहने वाले अनावश्यक तर्क दे कि- वे तो अनादि शक्ति है, यदि ये सही है- तो सीधे ही आजन्म रूप में अवतरित होकर, शिव से विवाह करती ओर सीधे ही आजन्मा शिव के साथ रहती, ये सब बाते एक समय जब अशिक्षा का अत्याधिक बोलबाला हो गया था, तब जो सत्य था वो जनसामान्य कि ही भाषा मे कथाओ के रुप मे कहा गया। ताकि सब ईश्वर क्या है? उसे लोग सहज भाषा में समझ ले,जबकि उनकी समझ में जो आया,वो अज्ञान बनकर केवल एक बंधनयुक्त परम्परा बन उन्हें मुक्ति का सच्चा ज्ञान देने की जगहां और भी बंधन में जकड़ती गयी।जबकि असल सत्य ज्ञान ये है कि- शिव का अर्थ है-‘श’ माने शाश्वत सत्य जो स्थिर है वो आत्मा (स्त्री+पुरुष) “मैं” नामक रुप मे सर्वत्र व नित्य है तथा ‘ई’ माने आन्नद इच्छा ओर व माने वरण करना अर्थात शाश्वत सत्य स्वरुपी आत्मा मैं  की आन्नद इच्छा को आन्नद क्रिया दुवारा आन्नद रुप मे वरण करना या धारण करना या ज्ञान रुपी आन्नद मे रहने वाला ही ‘शिव’ कहलाता है तथा शिव का दुसरा अर्थ है- शव+ई अर्थात जो शव”शरीर” अपनी ‘ई’ रुपी आत्म उर्जा शक्ति से परिपूर्ण हो, वो ‘शिव’ कहलाता है।शिव के ये नामान्तरण अवस्थाये “मैं” मनुष्य रुपी आत्मा जो स्त्री+पुरुष है, कि कुंडलिनी जाग्ररण की एक क्रमबन्ध प्रक्रिया के भावार्थ मात्र है-जैसे-शिव का सिंहचर्मासन पर विराजमान होना भी मनुष्य का अपने सिंह रुपी मन की समस्त कामना,वासना या इच्छाओ को अपने वशीभुत कर स्थिर होकर बैठना नाम है, तथा शिव का त्रिशूल आत्मा के तीन गुण- तम-रज-सत या आन्नद इच्छा+आन्नद क्रिया+आन्नद ज्ञान का उर्ध्व होना है, जैसे- त्रिशूल का दंड है तथा जब ये त्रिगुण की अभिवयक्ति होती है तब ये त्रिगुण आन्नद इच्छा+आन्नद क्रिया+आन्नद ज्ञान आदि का एकीकरण से अनादि नांद ( ऊँ) प्रकट होता है वो है शिव का ड्मरु का अर्थ, और शिव के गले की सेँगी ओर आत्मा का तमगुण यानि प्रारम्भिक रूप में अन्य सभी पशु व्रती स्वरुप है- नन्दी है तथा सहत्रार चक्र यानि सर की जटाओ से ज्ञान रुपी ” गँगा” जनकल्याण हेतु प्रवाहित हो रही है, जो आत्मा का मोक्ष रुपी सत्य  ज्ञान है, जिसमे स्नान कर या उसे अपने घर में या आचमन के रूप में पीने यानि धारण करने पर प्रत्येक मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है तथा शिव की जो विशाल जटाये “माया” रुपी अन्नत प्रकर्ति है, उसी से सब ये स्रष्टि का माया से परे का ज्ञान व माया मुक्ति रुपी” गँगा” प्रवाहित हो रही है तथा उनके त्रिनेत्र का अर्थ है- आत्मा कि त्रिगुण क्रिया ओर आन्नद और ज्ञान को सम्पूर्ण जाग्रति से उपभोग करने कि “प्रज्ञा” स्थित है, ओर उनके मस्तक पर जो चतुर्थी का चन्द्रमा विराजमान है,वो आत्मा के चार धर्म है-अर्थ-काम-धर्म-मोक्ष या ब्रह्मचर्य-ग्रहस्थ-वानप्रस्थ-सन्यास या चार काल-युग आदि का प्रतिक है,और जो आत्मा कि प्रज्ञा स्थिति है,वो दोनों नेत्रो से आन्नद इच्छा की सोलह कलाओ के रूप के साथ धीरे धीरे प्रस्फ़ुरण होने का चित्रण है ओर शिव कि शाम्भवी मुद्रा से अर्धखुले नेत्रो से जो तीनों काल-भूतकाल+वर्तमानकाल+भविष्यकाल में मिलनेवाली आन्नद इच्छा+आन्नद क्रिया+आन्नद ज्ञान का एकीकरण है,जिसे वर्तमान भी कहते है,उससे उत्पन्न परमानन्द यानि”अद्धैतानन्द” को ग्रहण कर आत्म की जाग्रती है यानि कि एक “साम्य अवस्था” सदा समानतावादी अवस्था में रहने का नाम है अर्थात निर्विकल्प समाधि अवस्था है, कि मैं आत्मा सर्वरुपो मे अपनी स्रष्टि कर, सर्व आन्नद को भोगती हुयी भी एक मात्र चैतन्य शेष बनी रहती है, ये है-शिव की निर्विकल्प समाधि और उसका शाम्भवी मुद्रा में बैठे हुए का चित्रण।
तथा पार्वती का शिव के साथ चित्रण का अर्थ है की- स्त्री शक्ति यानि आत्मा के एक भाग पुरुष को चैतन्य करने के लिये उसे भोगने को अपनी ओर से तपस्या रुपी पहल कर अपने साथ विवाह रुप मे वरण करती है ओर उस पुरुष को बीज दान कने को उत्प्रेरण कर, उसे अपने दुवारा ग्रहण कर ये सम्पूर्ण या स्वयं के रूप की जीव स्रष्टि करती है, यही सति का  शिव से तपस्या कर विवाह करना है व अपने पिहर जाकर सांसारिक कार्यो के प्रति अपने को मिटाना आदि अर्थ है और पुनः पार्वती से दस महाविद्या- काली,तारा,छिन्नमस्ता आदि का शक्ति विस्तार स्वरुप स्त्री के ये तीन रुपी त्रिगुण प्रकर्ति-यानि अपने से उत्पन्न करना+विस्तार करना+ ओर अपने में लय करना या समाहित कर लेना अर्थ है ओर कैलाश पर्वत इस प्रथ्वी का सबसे उँचा स्थान है, यो ये चित्रण आत्मा कि स्रष्टि का आधार जगत के रुप मे दिखाया गया है कि- आत्मा ही अपने सर्व रुपो मे सर्वोच्चाधार यानि सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान है,आत्मा से ऊँचा कोई नहीं है और गणेश का अर्थ है कि- अद्धैत शिव आत्मा से उत्पन्न द्धैत “गण” यानि दो गण(स्त्री+पुरुष) या रिद्धि+सिद्धि  या दो आन्नद इच्छा का सँयोग + आन्नद इच्छा का वियोग व ‘एश’ माने एश्वर्य का इन दो क्रिया के द्धारा उत्पन्न हो कर प्रकाशित होना गणेश नाम है, गणेश शिव के पुत्र के रुप मे जो हाथी का सिर लगा है, वो इस अर्थ का प्रतिक है कि- प्रत्येक जीव मे उसी की भाँति एक ही आत्मा व्याप्त है, जैसे कि- मनुष्य मे व्याप्त है,वेसे ही जीवों में सबसे  बड़ा जीव हाथी है,उसमें भी वही एक आत्मा व्याप्त है ओर दोनो मे एक समान आत्मज्ञान प्रकाशित है, यो जीव + मनुष्य का एक रुप गणेश, आत्मा का मुलाधार एक रुप है। यहाँ मुलाधार यानि स्त्री+पुरुष का काम क्षेत्र है, जहाँ स्त्री बीज “रज” जो रिद्धि है व पुरुष बीज “वीर्य” सिद्धि अर्थ है, ये दोनो मिल कर ही जीव स्रष्टि करते है, यो ये बीजावस्था है। यही से जीव पैदा होने से लेकर सम्पूर्णता की प्राप्ति तक कि यात्रा करता है ओर कुण्डलिनी जाग्ररण मूलाधार से (भोतिक भोग+आध्यात्मिक योग) प्रारम्भ होने के कारण से ही गणेश कि प्रथम पूजा है,यहाँ पूजा माने स्त्री+पुरुष का मिलन रुपी  आन्नद रमण या एकीकरण अर्थ है। ओर गणेश पूर्व व उत्तर दिशा के स्वामी है, जो पूर्व मार्ग यानि ब्रह्मचर्य मार्ग यानि शिक्षाकाल है और दूसरा उत्तर मार्ग यहाँ चरित्र के अंतर्गत परस्पर ग्रहण किया गया ग्रह्स्थ मार्ग का नाम है व चतुर्थी का व्रत का अर्थ, यहां मनुष्य के चार धर्म है। मुषक की सवारी भी कुण्डलिनी रुपी शक्ति का सुष्मना नामक नाडी या बिल मे प्रवेश कर, सात चक्र रुपी परिक्रमा करना यानि अपनी मूल आत्मा- शिव+पार्वती की सहस्त्रार चक्र मे करना अर्थ है ओर शिव के दुसरे पुत्र कार्तिकेय क अर्थ है कि- ‘क’ माने आत्मा की काम  या कर्म इच्छा व त्री माने तीन इच्छा व केय माने प्राप्ति करना है अर्थात आत्मा(स्त्री+पुरुष) की सम्पूर्ण आन्नद अभिव्यक्ति की सोलह कला से पूर्ण “पूर्णत्व” की प्राप्ति करना ही “कार्तिकेय” नाम है। यो “कार्तिक पूर्णिमा” मनाने का जनसाधारण मे प्रचलन है। कार्तिकेय का जन्म या प्रकाट्य भी शिव+पार्वती यानि आत्मा कि दुसरी इच्छा”मन” के दो भाग “पुत्र” के रुप मे होने पर दक्षिण व पश्चिम दो दिशा या वाम मार्ग यानि वानप्रस्थ व सन्यास कर्म ओर धर्म है, यो कार्तिकेय का अविवाहित स्वरुप है, क्योकि वानप्रस्थ गुरु के रूप में ब्रह्मचर्य अवस्था है व सन्यास धर्म भी आत्म की मोक्ष अवस्था का रुप है व नील वर्ण मोर पर सवारी का अर्थ भी आकाश के समान अनंत व्यापी आत्मा की अवस्था यानि उस पर सवारी करना, की प्राप्ति का नाम है।यानि आत्मा की इस आकाश जैसी अनन्त परमावस्था की प्राप्ति होने पर मुक्तावस्था की प्राप्त होती है। यही सब आत्मा के नामार्थ शिव+पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि है। जो प्रत्येक पुरुष की स्त्री की साहयता यानि भोग ओर योग के सही उपयोग से अपनी आत्मा कि कुण्डलिनी जाग्ररण से लेकर सहत्रार चक्र मे जाकर आत्मसाक्षात्कार होने कि व्याख्या मात्र है- जो जनसाधारण मे मनुष्य कथा से समझायी गयी है अत; इस सत्यार्थ को जान जो मनुष्य आत्मसाधना करता है वही सत्य मे शिव है व वही सत्य मे पार्वती आदि अर्थ है ओर वही आत्मसाक्षात्कार पा कर मुक्त है। कि यही सत्य है और फिर आत्मघोष करता है की- अहम् सत्यास्मि..यानि मैं ही सदा सत्य रहने वाली शाश्वत आत्मा हूँ।

शिवलिंग-पुरुष कुंडलिनी जागरण अर्थ है
शिवलिंग के स्वरूप में दर्शाये गए सभी चिन्ह अर्थ वास्तव में पुरुष की कुंडलिनी जागरण का विज्ञानं अर्थ है-
-शिवलिंग का अर्थ-शिव माने पुरुष और लिंग माने पुरुष का पुरुषत्त्व शक्ति का जागरण है। श माने है शाश्वत सत्य पुरुष ई माने इस सत्य पुरुष में चेतना जागर्ति जिसके तीन रूप है-इच्छा+क्रिया+ज्ञान=शि है और व् का अर्थ है वर-वरदान-वरण यो जो पुरुष शाश्वत और सनातन और सत्य है वो स्वयं की इच्छा और क्रिया तथा ज्ञान से चैतन्य है तब वही पुरुष अपने में छिपे और प्रकट सभी वर यानि शक्तियों को दान या प्रकट या स्वयं की सृष्टि करता भी है और उसी को स्वयं ही वरण या धारण भी करता है यही उसका अमृत स्वरूप है जिसे सोम कहते है यही सोम को प्रकट और धारण व् देने वाला होने से वो वार भी कहलाता है यही सत्य पुरुष शिव का सोमवार कहलाता है यो उसके प्रकर्ति स्वरूप आषाढ़ माह की पूर्णिमा यानि पूर्ण प्रकाशित होने के उपरांत स्वयं को बाटना ही सावन माह का सोमवार कहलाता है।सावन माह में प्रकर्ति सभी जीवों को अपना अमृत जल बाटती है यही पुरुष का कुंडलिनी जागरण की सम्पूर्णता ही शिव अर्थ है। लिंग का अर्थ-पुरुष का मूलाधार चक्र है और पुरुष की पुरुषत्त्व शक्ति की सम्पूर्णता अर्थ है जिससे दो मार्गों का बहिर और अंतर या उर्ध्व विस्तार होता है। शिवलिंग में नीचे का भाग पुरुष के मूलाधार का आधार भाग है जिसमें तीन शक्ति का समावेश त्रिगुण शक्ति- ऋण और धन और बीज होता है यही स+त+य=सत्य या सत् गुण+रजगुण+तमगुण यहाँ स पुरुष है रजगुण स्त्री और तमगुण बीज है और यही अर्थ श+ई+व्=शिव है और जब ये त्रिगुण शक्ति चैतन्य होती है तब इसका परस्पर विलय होकर प्रथम ॐ नाँद होता है तब शिवलिंग का दूसरा भाग बनता है जो स्वाधिष्ठान चक्र है और इस ॐ का अनंत विस्तार ईं स्वरूप सप्त चक्र कुंडलिनी है तब इसका तीसरा रूप नाभि चक्र में बनता है जहाँ विश्व सृष्टि यानि सिद्धायै अर्थ प्रकट होता है यही सिद्धायै ही शिवलिंग में उर्ध्व लिंग से पहले जो योनि कुण्ड रूप है वो है जहाँ से पुरुष की जाग्रत शक्ति के दो भाग होते है एक बाहर की और संसार की भौतिक सृष्टि जो साकार कहलाती है दूसरी अंतर सृष्टि जो आध्यात्मिक जगत कहलाती है यो ये योनिकुंड प्रतीक सिद्धायै में सात अक्षर है जो सात चक्रों का प्रतीक व् बीजाक्षर भी है-स+ई+द+ध+आ+य+ऐ=सिद्धायै है यो सिद्धायै रूप कुंडलिनी शक्ति ही अपने दो चक्र नीचे मूलाधार+स्वाधिष्ठान से मध्यचक्र नाभि से सहस्त्रार चक्र तक सम्पूर्ण होती है यही सिद्धायै में ईं कुंडलिनी का उर्ध्व लिंग रूप जागरण ही शिवलिंग में पुरुष शिव का उर्ध्व लिंग स्वरूप अर्थ है। जिसके अंत से पूर्व शिव रूपी सत्य पुरुष के त्रिगुण पुनः एक एक करके त्रिगुण रूप में त्रिकुटी या आज्ञाचक्र में नमः-न+म+ह यानि “पुरुष +,स्त्री -, और (+,-) बीज” के रूप में दो दल के मध्य बिंदु चक्र है यही शिव की ध्यानस्थ अवस्था बताती हुयी शाम्भवी मुद्रा है जिसका अर्थ होता है की ध्यान करने वाला व्यक्ति तो मध्य बिंदु है और उसके दोनों और के दल में एक बहिर संसार को भी द्रष्टा भाव से देख अनुभव और भोगते हुए भी केवल साक्षी बना है ठीक ऐसे ही दूसरा दल का अर्थ है की ध्यानी मनुष्य जाग्रत होकर अंतर जगत की आध्यात्मिक संसार में भी देखता,अनुभव करता व् भोगता हुआ साक्षी बना हुआ है यही मध्य बिंदु स्थित मनुष्य आत्मा की परमवस्था प्रतीक है परमात्मा में स्थित या परमतत्व का बोध होना अर्थ ही नमः यानि नाओहम या मैं भी नहीं हूँ की निर्विकल्प समाधि अवस्था अर्थ है और शिवलिंग के उर्ध्व लिंग रूप में जो कुंडलिनी शक्ति है वो अपने चरम पर बिलकुल साक्षात् पुरुष के लिंग की भांति चीरी हुयी होती है जिसे मूत्र और वीर्य निकलता है यही यहाँ होता है की उर्ध्व शिवलिंग के अंत में कुण्डलिनी शक्ति फट्-फ+अ-ट+ट की चार अवस्था जो अर्थ+धर्म+काम+मोक्ष या चार वेद के रूप में संसार में प्रकट होना या फटना,प्रस्फुटित होना अर्थ है और शिवलिंग की चरमावस्था या अन्नतावस्था का सम्पूर्ण विस्तार ही स्वाहा अर्थ है ये स्वाहा के रूप में ही चार वेदों का 108 रूप यानि एक+शून्य+आठ- में एकोहम् बहुश्याम से शून्य रूप अंतर सूक्ष्म और बहिर स्थूल सृष्टि है और आठ का अर्थ है की मनुष्य की कुंडलिनी शक्ति सामर्थ्य अपनी अष्ट सुकार और विकार के समल्लित होकर सम्पूर्ण बनी रहती है यही 108 उपनिषद् कहलाते है। यही समझने के लिए शिवलिंग से अलग त्रिशूल जो पुरुष+स्त्री+बीज=पुरुष शिव अर्थ है।
और नन्दी का अर्थ है मनुष्य अपनी अज्ञान अवस्था में पशुत्त्व को प्राप्त होता है जिसका प्रतीक नन्दी या बैल है जो काम शक्ति और धैर्य और निरन्तर परिश्रम का प्रतीक स्वरूप है।
और सर्प कुंडलिनी का प्रतीक है।
और गंगा ज्ञान का प्रतीक है जो कुण्डलिनी के सहस्त्रार चक्र में पहुँचने के उपरान्त अमृत बनकर संसार में प्रकट होकर मनुष्य को मुक्त करती है। जो भक्त इस महाज्ञान को अपने अंतर्मन मन में बसा कर इस सिद्धासिद्ध महामंत्र का जप ध्यान करता है वो स्वयं के शिवतत्व स्वरूप को प्राप्त होता है जो केवल बेल,जल,भांग,धतूरा आदि बाहरी पदार्थो को चढ़ाकर ये विचार करता है की ऐसा करने से उसका कल्याण होगा वो संसार में उस मृग की भांति भ्रम में भर्मित रहता है की कस्तूरी कहीं और है जो की हिरण की नाभि में ही छिपी होती है यो गुरु ज्ञान पाओ और सच्ची शिव साधना को प्राप्त हो।
यहाँ पुरुष की कुण्डलिनी जागरण का सिद्धासिद्ध महामंत्र के भावार्थ के साथ सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ का शिवलिंग अर्थ संछिप्त में दिया है जिसका जो भी मनुष्य चिंतन मनन करता है वही आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर मुक्त हो जाता है। यो स्त्री को अपने श्रीभग की साधना करनी चाहिए ना की पुरुष के शिवलिंग की हां संसार में जो कथा पति प्राप्ति को शिवउपासना बताई है उसका सत्यार्थ भी स्त्री के स्वयं में छिपे पुरुष तत्व को प्रकट करने से जो की उसी के मूलाधार में छिपी कुण्डलिनी शक्ति के ही जागरण से प्राप्त होता है यो स्त्री को ये अज्ञान त्यागना होगा स्वयं का जागरण करना होगा अंन्यथा कितनी ही शिवलिंग पर जल चढ़ा ले कोई संसारी और आत्म लाभ को नहीं प्राप्त हो सकती है।

श्रावण का अर्थ :- श्रावण शब्द श्रवण से बना है जिसका अर्थ है सुनना। अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों को श्रुति कहा जाता है अर्थात उस सच्चे ईश्वर के ज्ञान को अपने गुरु से गुरु पूर्णिमा पर दीक्षा लेकर यानि सुनकर फिर उसे अपने में ग्रहण करके उसका आत्मसाक्षात्कार करके अन्य लोगो को सुनना ही श्रावण यानि सावन के व्रत(व्रत का अर्थ है जो सुना और ग्रहण किया ज्ञान है,उसपर सदा चलते रहने का संकल्प करना ही व्रत है) करना है।यो यही आप करें।

शेष ज्ञान अगले लेख में कहूँगा।

ॐ नमः शिवाय

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा।

“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब

https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े।

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज


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