कहते हैं गुरु और शिष्य का सम्बंध सबसे बड़ा होता है। गुरु ही हैं जो शिष्य को मार्ग दिखाने का काम करते हैं उसे जीवन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बताते हैं। गुरु अपनी शिक्षा से अपने शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं। उसको सफलता का मार्ग दिखाते हैं। शिष्य के जीवन से अंधकार को दूर करने का काम करते हैं। आने शिष्य के जीवन में ज्ञान के प्रकाश का प्रसार करते हैं।
आज यानि 27 जुलाई को गुरु पूर्णिमा है और गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से अपने गुरु की पूजा की जाती है। गुरु और शिष्य का सम्बंध अनूठा होता है।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने गुरु शिष्य की महिमा के ऊपर एक महत्वपूर्ण प्रसंग लिखा है। जिसे आप भी पढ़ें।
27 जुलाई 2018 गुरु पूर्णिमा पर गुरु और शिष्य की परिभाषा क्या है..जाने स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी द्धारा रचित गुरु शिष्य महिमा प्रसंग :-
शिष्य क्या और कौन होता है? :-
प्रश्न,चिंतन,अर्थ,पूछ
और गुरु,मंत्र,विधि,विश्वास।
सदा आज्ञा पालक नाम शिष्य
पाये सिद्धि वही जो रखे गुरु में आस।।
भावार्थ :-
जिसके पास आत्म जिज्ञासा और उससे सम्बंधित प्रश्न हो और उस प्रश्न के उत्तर को बताने के उपरान्त उस उत्तर में छिपे अर्थ का चिंतन करता हो तथा ना समझ आने पर या जहां समझ नही आये वहाँ पर अनुरोध के साथ आगे का उत्तर विनम्रता के साथ पूछता हो और गुरु बनाया हो और उनके दिए मंत्र में तथा विधि में विश्वास रखता हो साथ ही गुरु की आज्ञा का सदा पालन करने वाला हो और सिद्धि पाने पर अपने में अहंकार के स्थान पर गुरु को उसके उपकार और ज्ञान को ही अर्थ सहित धारण किये हो अर्थात स्वयं गुरु का वास रखे ऐसा व्यक्ति चाहे वो स्त्री हो या पुरुष हो वही शिष्य कहलाता है।
आजकल जो देखो गुरु बनाता फिरता है और अपने में गलती नही देखता है बल्कि गुरु में ही गलती देखना उसकी आदत होती है बस गुरु की सामर्थ्य का लाभ उठाने के लिए उनकी चापलूसी “जी गुरु जी सही कह रहे हो” करने का नाम शिष्य अर्थ बन गया है ऐसे शिष्य को जो विद्या और बल और एश्वर्य मिलता भी है तो वो कभी स्थायी नही होता है यो पहले ऊपर दिए इन सत्यास्मि के सत्संग वर्णित अर्थ को धारण करो तब गुरु और उसके शिष्य कहलाओगे।
गुरु का वर्तमान समय में क्या अर्थ है:-….
गुरुदेव अर्थ वर्तमान है
जन सेवक का दास।
मनवांछित कार्य कर्म
गुरु बनाते निज आस।।
गुरु नाम कठपुतली बना
जिसकी शिष्य हाथ है डोर।
जब मन आये उपयोग करे
चलाये पंचम अंगुली पोर।।
पाँच मनोरथ सिद्ध करे
अर्थ धर्म काम विश्राम।।
और जगता गुरु रहे
दे पहरा शिष्य के धाम।।
जब मन आये जाये शिष्य
गुरु सुने दुखित शिष्य पुराण।
जप तप सिद्धि गुरु की
केवल शिष्य भौतिक कर्म त्राण।।
गुरु सुनाये धर्म ज्ञान
शिष्य करता मात्र हुंकार।
सही कहा गुरु देव तुम
पर कैसे करें हम निःसार।।
ये भी तुम ही शक्ति देना
जिसे समय निकाल सके हम।
कृपा गुरुदेव आप ही करना
अधिक नही तो कम।।
पर कहाँ से आयें समय नही
आपको ज्ञात है सब।
अंतर्यामी आप श्री
आएंगे जब समय मिलगा तब।।
चिंता मत करो गुरुदेव जी
मुझे धनी बना दो जग।
तब देखो क्या क्या करूँ
गर्व करोगे शिष्य पाया इस जग।।
बस इस बच्चे को शिक्षा दो
और इस पुत्री शुभ वर विवाह।
पति सही चले घर मार्ग पर
और धन तन चैन दो अथाह।।
तब मैं यही रहूँगी
और करूँगा सेवा दिन रात।
गुरु देव शक्ति लगाओ और
मेरे शत्रु मिटे अज्ञात।।
अरे क्या पता गुरु जी तुम्हें
हूँ कितना दुखी दरिद्र।
एक प्रश्न और शेष मुझ
शांति मिले मुझ कब निंद्र।।
भोंस भोंस गुरु चले गए
पर सेवा नही समाप्त।
पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ चढ़ी
शिष्य वंश चले मनोरथ व्याप्त।।
जिसे त्याग ब्रह्मचारी बने
और लिया भोग ना सुख।
सदा घिरे उसी पँच माया से
मोक्ष नाम मिला गुरु दुःख।।
गुरु पूर्णिमा एक दिन
और पुरे वर्ष अमावस मात्र।
सम्पूर्ण जीवन शिष्य दिवस
गुरु मुक्ति किस दिन रात्र।।
जय जय शिष्य तू महान है
तू उस माया का है रूप।
जिसे वशीभूत कर गुरु बने
गुरु नाम धर सेवक तुझ भूप।।
गुरु शिष्य का योग कैसा हो:-…
गुरु में शिष्य शिष्य में गुरु
तब जगे कुंडलिनी आत्म तरु।
दोनों मध्य हो प्रेम रति
स्थूल सूक्ष्म एक हो उदित अरु।।
आत्म कुंडलिनी तब जगे
जब नवधा भक्ति जानों।
आत्म मंत्र,सत्यसेवा,सत्संग
प्रीति,त्याग,अहं को भानों।।
गुरु शिष्य अर्थ कर धारण
और एक प्रेम कर अर्थ।
एक पथ चले निरंतर
इससे परें सभी व्यर्थ।।
यूँ करें अपने में गुरु ध्यान
और आत्म नाम का जाप।
मैं नहीं सब गुरु बसें
इस एकाकार मिले तब आप।।
भावार्थ:-
जब शिष्य अपने अंदर गुरु को धारण करके की ये देह मेरी नही है गुरु की है और मेरे स्थान पर गुरु ही योग विराजमान् है तब गुरु मंत्र स्वमेव चैतन्य हो कर सम्पूर्णत्त्व को प्राप्त होता है और इस आत्म पथ पर चलने के लिए नो प्रकार की भक्ति चाहिये जो इस प्रकार से है गुरु यानि ज्ञान से प्रेम हो और व्यर्थ के विषयों का त्याग करें तथा अपने अंदर जो अहंकार है उसे दो तरहां से भाने यानि अध्ययन करें की मैं कौन हूँ? और जो सत्य मैं है वो कौन और किसे कहते है तब जो गुरु है जिसके तुम शिष्य बने हो उससे किसी भी प्रकार का भेद आपमें है या नही इसका अध्ययन करें की मेने गुरु तो बना लिए है क्या सच में मैं उनका शिष्य बना हूँ या बनी हूँ कहीं उनसे मेरा कोई विरोध तो नही है तब ये ज्ञान ध्यान चिंतन ही मन को शुद्ध करता है इससे गुरु में अपना सच्चा समर्पण का भाव उतपन्न होता है।
तब गुरु को धारण करने का अर्थ समझ आता है इस सत्यसंग को नित्य अपने में मनन करें और गुरु से अपनी सभी जिज्ञासाओं को पूछे और उनसे प्राप्त उत्तर का अध्ययन करता अपनाये ये सत्संग है और तब गुरु और शिष्य में क्या सम्बन्ध है वही ज्ञान प्रेम बनता हुया प्रेम का अर्थ प्रकट होता है तब एक ही पथ पर चलता है भिन्न भिन्न सिद्धांतों को मानना त्यग जाता है जैसे आप किसी एक ही मार्ग पर चलकर ही लक्ष्य पर पहुँच सकते है ना की बदल बदल कर अनेक मार्गों को अपनाते अपना लक्ष्य कभी नही पा सकते हो यो इस ज्ञान से परे सभी व्यर्थ है यूँ अपने में गुरु को संयुक्त करके तब आत्म मंत्र का जाप करें और तब मैं नही गुरु ही सब कर्ता है ये भाव धारण करता अपने को गुरु में एकाकार करने पर स्वयं ही अपने आप की प्राप्ति होती है यही सत्यास्मि है।
“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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