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हिन्दू धर्म के पतन, हार और नरसंहार के ऊपर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के सवाल : आओ चिंतन करें

 

 

 

 

“आज हिन्दू धर्म में जिस तरह से त्रुटियां जन्म ले रही हैं, विषैली ताकतें जन्म ले रही हैं, धर्म किस ओर जा रहा है? इस विषय पर चिंतन बेहद जरूरी है। हम किस ओर जा रहे हैं और किस समाज की कल्पना कर रहे हैं, हम खुद ही नहीं जानते हैं।”

 

 

 

सवाल बेहद पेचीदे हैं, लेकिन चिंतन करना बेहद जरूरी है। संसार का सबसे पुराना धर्म जिसने विश्व के सबसे महानतम लोगों को जन्म दिया। और इसी धर्म से न जाने कितने धर्म बनें लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

आखिर हमारी कमी कहाँ रह गयी?

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज आज इसी विषय पर आप सब लोगों का चिंतन चाहते हैं।

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज बताते हैं कि अगर हिन्दू धर्म के इतिहास पर दृष्टि डालें तो सर्वसम्मति से और विभिन्न साक्ष्यों और प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हिन्दू धर्म का आरंभ सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। सिंधु घाटी सभ्यता में मिली पशुपतिनाथ की मूर्ति, जर्मनी में 1939 में मिली नरसिंह की मूर्ति इस बात के ठोस प्रमाण हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हिन्दू धर्म का जन्म वेदों से ही हुआ है इसलिए इसे वैदिक धर्म भी कहा जाता है। वेदों की संरचना का साथ ही मंत्रों का जन्म हुआ और हिन्दू धर्म के दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्ष का विकास हुआ। इसी समय योग, सांख्यिकी और वेदान्त और उसके बाद पुराणों की रचना हुई जिनमें धर्म, ज्ञान विज्ञान और इतिहास का वर्णन मिलता है।

 

हिन्दू धर्म और विज्ञान:
हिन्दू धर्म विज्ञान आधारित धर्म कहा जाता है। प्राचीन काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार न होने के कारण, हिन्दू धर्म में ज्ञान विज्ञान की शिक्षा धर्म से जोड़कर और परम्पराओं और मान्यताओं में बांधकर सिखाने का प्रयास किया गया। कहते हैं जो वैज्ञानिक नियमों के अनुसार अपना विकास करता है वही शाश्वत होता है, इसी कारण हिन्दू धर्म को सनातन धर्म भी कहा जाता है। इस धर्म की नींव भी वैज्ञानिकता पर ही आधारित है। या यूं कहें कि विज्ञान को जन्म भी हिन्दू धर्म ने ही दिया है।इसका प्रमाण सबसे पहले मिलता है प्राचीन काल के कार्यानुसार किए गए वर्ण विभाजन से, जहां व्यक्ति के कार्य के अनुसार उसके वर्ण को विभाजित किया गया था। सभी वर्णों में आपसी प्रेम और समन्वय था। इसके अलावा हमारे पूर्वजों ने अनेक धार्मिक परम्पराएँ और मान्यताएँ निर्धारित की हैं लेकिन जब उन्हें वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाता है तो वे खरी उतरती हैं। इससे यह पता चलता है कि हिन्दू धर्म पूरी तरह वैज्ञानिक है. आइये देखें किस तरह हर परंपरा और मान्यता विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती है।

इस धरा के सबसे प्राचीन और पवित्र धर्म के पतन का कारण शायद हम खुद बन रहे हैं।

 

 

हिंदू की हार और नरसंहार के कारण क्या है-???

1- क्या इनके राजा कुशल योद्धा नहीं थे?
2- उनकी सेना के सिपाही कुशल लड़ाका नहीं थे?
3- उन्हें धोखा देने वाले लोगों के विषय में राज्य में नियुक्त गुप्तचर संस्था कमजोर थी, जिस कारण उन्हें पता ही नहीं चलता था?
4- शत्रु के प्रति युद्ध की नीति के बीच धर्म की नीति आड़े क्यों आती थी, यानि राजनीती पर धर्म नीति का प्रभाव क्यों प्रबल था, यानि जिससे शत्रु की क्षमा करने का कारण बनने से शत्रु को पुनः आक्रमण का मौक़ा मिल जाता था?
5- ये मुस्लिम आखिर कितनी सेना लेकर आये और सदूर देश और वातावरण में पले होने पर भी उसी वातावरण के हिन्दू राजाओं और उनकी कथित प्रशिक्षित विशाल सेना को गाजर मूली की तरहां काट परास्त कर देते थे? यानि कि क्या उनका सैन्य और युद्ध नीति हमारी युद्ध नीति से उच्चकोटि की थी?
6- हमारे राजाओं के ऊपर राजनीती का प्रभाव अधिक था या धर्म नीति का प्रभाव अधिक था ?, जिससे उनमें राजनीति के नियमों को कठोरता से स्वयं से लेकर सेना और समाज में कट्टरता से लागू करने में ढिलाई आती थी, जो वर्तमान तक भी ऐसे ही प्रभावी दिखाई देती है?
7- क्यों क्षत्रिय धर्म पर ब्राह्मण धर्म हावी था?
8- या हमारे देश में पूर्व से लेकर वर्तमान तक क्षत्रिय धर्म लागु ही नहीं है?
9- आखिर दूसरे देशों के इतिहास को उठा कर देखें, तो पता चलेगा की- वहाँ एक सामान्य से कबीले से एक योद्धा उठ खड़ा होता है और एक संगठित सेना बनाता हुआ, अपने देश से लेकर हमारे देश तक सभी को हराता हुआ राज्य करता है, वेसा हमारे देश में क्यों नहीं दिखाई दिया?
10- हमारे धर्म और जातिवाद के बीच इतना मतभेद क्यों रहता है? आखिर हमारा धर्म हमारे समाज को क्यों नहीं जोड़ पा रहा है, जिससे हिन्दू समाज एक और कट्टर नहीं है?
तब ऐसे अनेक प्रश्नों का समाधान में ही हिंदुओं की धार्मिक और राजनैतिक और सामाजिक शोषण और उससे उन्नति का निदान है.. आओ इस पर अपना विचार दे…

 

***

 

 

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धाय नमः


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