श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ऐसे ही दोषों के ऊपर बात कर चुके हैं। वो कालसर्प दोषों के बारे में पहले ही अवगत करा चुके हैं। आज स्वामी जी ऐसे ही दोषों के बारे में बात कर रहे हैं। पितृदोष होने के कारण घटित होने वाली घटनाओं के बारे में आज स्वामी जी अवगत करा रहे हैं। और साथ ही बता रहे हैं कि किस प्रकार आसान उपाय करके इन सब चीजों से बचा जा सकता है।
जानिए क्या है पितृदोष : –
“पितृदोष पर अभी तक ऐसा प्रमाणिक लेख जो अपने न सुना न पढ़ा न जाना होगा….पितृ दोष क्या है ? और किस शाप के कारण कैसे बनता है ? आइये जानते हैं।”
पितृ दोष भारतीय ज्योतिष का विशेष अंग है., ये ही समस्त जन्मकुंडली में अन्य सभी दोषों का किसी न किसी अन्य नाम के दोषों का निर्माण करने में पूर्ण साहयक है।
-आपकी जन्मकुन्डली का नवां घर जोकि सबसे महत्त्वपूर्ण घर है, जिसे कर्म और धर्म और विशेष भाग्य का घर कहा जाता है, और यह पिता का भी घर होता है, व्यक्ति के जीवन में जितने भी अचानक धन लाभ-जैसे-लाटरी निकलना और गढ़ा खजाना जो की पितरों का दिया होता है अथवा जिसे मिलता है, वही अपने पिछले जन्म में उस धन को किसी गुप्त स्थान पर रख गया होता है और आगामी जन्म के लेने पर ठीक उसी समय वो उसे उस स्थान से जाने अनजाने में नवीन मकान या भूमि या कुएं को खरीद कर प्राप्त कर लेता है, वो भी पितृ द्धारा धन की प्राप्ति का योग कहलाता है।
जिन पर पितरों के द्धारा स्वप्न में अपना अथवा किसी परिजन का भविष्य बताने की भी शक्ति मिलती है और जो ऐसी ही पितृ साधना के द्धारा भी सिद्धि भी प्राप्त करते है, उस व्यक्ति ने पिछले जन्म में अपने पितरों की निरन्तर सेवा सम्मान करने से उनकी इतना आशीर्वाद प्राप्त कर लिया होता है की-वे पितृ ही उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आकर उसे भुत वर्तमान और भविष्य की सिद्धि प्रदान करते है, ये अति उच्च कोटि का पितृ कृपा योग इसी नोवे घर से पता किया जाता है।
-अगर किसी प्रकार से नवां घर खराब ग्रहों से ग्रसित होता है तो यह सूचित करता है कि-उसके पूर्वजों की इच्छायें अधूरी रह गयीं थी, जो प्राकृतिक रूप से खराब ग्रह होते है- जैसे-सूर्य, मंगल और शनि कहे जाते है और कुछ अन्य लग्नों में अपना योग बनाकर ये काम करते हैं, लेकिन राहु और केतु अधिकतर सभी लग्नों में अपना दुष्प्रभाव देते हैं, नवां भाव, नवें भाव का मालिक ग्रह, नवां भाव चन्द्र राशि से यानि चन्द्र कुंडली में नोवा घर और चन्द्र राशि से नवें भाव का मालिक, अगर राहु या केतु से ग्रसित है, तो यह “पितृ दोष” कहा जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति हमेशा किसी न किसी प्रकार की टेंशन और कठनाई में रहता है, उसकी शिक्षा पूरी नही हो पाती है, वह जीविका के लिये तरसता रहता है, वह किसी न किसी प्रकार से दिमागी या शारीरिक रूप से अपंग होता है।
अगर किसी भी तरह से नवां भाव या नवें भाव का मालिक राहु या केतु से ग्रसित है, वेसे नवम का सातवां घर तीसरा होता है, अतः वो भी इस दोष से पीड़ित हो जाता है, जो-व्यक्ति के छोटे भाई बहिन और नोकर चाकर तथा पराक्रम हिम्मत व् व्यापार, सभी प्रकार की कि गयी महनत का फल, दमा-खांसी से उपजे रोग और व्यक्ति में चतुरता और भतीजे भतीजी तथा अन्य सभी परिवारिक रिश्ते सम्बन्ध पर अच्छा बुरा प्रभाव और योगाभ्यास से प्राणायाम की सिद्धि मिलनी या उससे अचानक हानि हो आदि सब परिणामों पर इस दोष से प्रभाव पड़ता है।यो यह सब दूषित होकर सौ प्रतिशत पितृदोष के कारणों में आ जाता है।
-पितृ दोष के लिये दो चमत्कारिक अमोघ उपाय :-
किसी भी पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान आदि करके अपने साथ एक जनेऊ, कलावा, रोली, चावल, हलदी और थोडा सा गेंहू का आटा, चमेली का तेल का दीपक, और गाय के घी का दीपक, गंगा जल मिला सादा जल का लोटा ले कर, किसी बड़े से बड़ के पेड़ के पास जाये और अब पहले बड़ को नमन करके 21-21 बार अपने गुरु और इष्ट मन्त्र को जपे और अपनी मनोकामना कहें कि- हे बड़ देव आप अपने द्धारा मेरे पितरों का अपने ऊपर आवाहन करें और जब भी वे आये तो मुझ पर जो भी पूर्वजन्म का पितृ दोष है, वो मेरे पितरो की कृपा से कम होता हुआ समाप्त हो जाये और मेरे पितृ मुझ पर प्रसन्न होकर मेरा और अपने कुल का सभी प्रकार से कल्याण करें और अब उस पर गंगा जल मिश्रित जल थोडा सा चढ़ाये और थोडा सा ही उस पेड़ के तने को धोये, जब ऐसा करें तो आपका मुख पूर्व दिशा की और होना चाहिए और फिर उस धोये स्थान यानि तने पर हलदी से स्वास्तिक बनाये और रोली से उसमें चार टीके लगाएं और चावल वहां चिपका से दे, हो सकता है पेड के खुरदरे होने से साफ़ सतिया नहीं बनेगा तो कोई बात नहीं है।
अब उसी सतिये यानि स्वास्तिक से ही अपने सीधे हाथ की और को चलते हुए बड़ के पेड़ पर कलावा लपेटते जाये और ऊपर बताई प्रार्थना करते जाये, ऐसा चौदह बार चक्कर- इन चौदह चक्कर लगाने का मतलब है की-7 पुरुष पितरों के और 7 स्त्री पितरों-जिनमें माता-दादी और परदादी और उनका कुल सम्मलित होता है, उनके मिलाकर ये चौदह पितरो का आवाहन और उन्हें प्रणामी होती है और आटे का एक चक्कर ब्रह्मचारी अथवा निसन्तान रहे पितृ के लिए समर्पित होता है, और बाकि स्वास्तिक आदि पूजन संस्कार सोलहवीं कला होने से पूर्णिमा योग बन कर मनुष्य जीवन में पितृ सहित देवों का भी कृपा प्रकाश लाता है। चौदह चक्कर लगाते हुए कलावा बांधें (कलावा ज्यादा सा ले जाये) और अब केवल एक बार के एक चक्कर में इसी प्रकार से आटे की भी रेखा बड़ के चारों और बनाकर जो आटा बचे उसे उस बने सतिये के सामने धीरे से सम्मान से डाल दे और अब अपने साथ लाये चमेली के तेल का दीपक और घी का दीपक जलाये और उन्हें बड़ पर बने सतिये के सामने अपने सीधे हाथ पर घी का दीपक पुरुष पितरों के नाम का जलाकर रखे और अपने उल्टे हाथ पर चमेली के तेल का जलता दीपक रखे और सतिये पर अपने साथ लाया जनेऊ गायत्री मन्त्र जपते हुए चढ़ा दे यानि वहां जो कलावे के धागे बंधे है, उनमें इस प्रकार से उसे टाँग दे की सतिया यानि स्वास्तिक जनेऊ के बीच में रहे। वैसे जैसा बने वेसा करें, ये नहीं सोचे की कुछ गड़बड़ या गलती हो गयी तो हमारे पितृ हमें हानि न पहुँचा देंगे। ऐसा नहीं होगा। आप दिल से करें, साफ मन से करें।
ये उपाय प्रत्येक पूर्णिमासी को करते हुए 12 पूर्णिमा पूरी करें।और यदि व्रत भी रख ले तो बहुत ही चमत्कारिक उपाय बनकर आपको सभी पितरों की कृपा लाभ और यहां तक की पितृ स्वप्न दर्शन की सिद्धि भी सम्भव होगी। अब वहां शेष बचे जल को चढ़ाये और थोडा सा बचा कर घर ले आये और उसके दो भाग कर ले, उसमे थोडा सा गंगा जल और मिलाकर एक का सभी परिवार वाले आचमन यानि जरा-जरा सा पूजा के बाद नित्य पीया करें और एक को रोज घर में किसी भी समय छिड़क दिया करें, तो घर से सभी विपदाएँ समाप्त होकर घर कील यानि सुरक्षित हो जायेगा और सब के जल पीने से सभी परिजनों पर पितरों की अद्धभुत कृपा होती जायेगी। मनोवांछित कल्याण होगा। ये अनुभूत उपाय है। बस करो और चमत्कार देखों।
-2-उपाय:-
मंगल और शनिवार को अपने पितरों के लिए अपना गुरु व् इष्ट मन्त्र जपते हुए चावल उबाल कर और घी मिलाकर बनाये लड्डू को अपने पितरों को नमन करते हुए अपनी मनोकामना कहते हुए अपनी छत्त पर कव्वों के लिए रख दिया करें अब उसे कव्वे खाये या चिड़िया खाये, आपका वो भोग पितरों को ही प्राप्त होगा। यदि किसी वजह से ऐसा भी नहीं कर सकते है, प्रत्येक अमावस्या और पूर्णमासी को अवश्य ही ऐसा करें और यदि आप पूर्णिमासी को गंगा जी नहाने जाये, तो यही भोग बनाकर उसे अपने पितरों की स्मरण करते हुए क्षमा याचना करते हुए अपनी मनोकामना कहते हुए गंगा में मछलियों के लिए डाले, तो ये पितृ दोष सम्बंधित कोई भी नोवें घर के राहु और तीसरे घर के केतु से बना किसी भी ग्रह के साथ निर्मित कालसर्प दोष हो वो घटता हुआ समाप्त होगा तथा आपके लिए और भी अधिक चमत्कारिक रूप से कल्याण होगा।
-विशेष:-
आपको जितने भी महंगे जप अनुष्ठान इस पितृदोष के लिए कराये हो, और उनसे मनवांछित लाभ नहीं हुआ हो, लेकिन उन सबकी अपेक्षा ये अमोघ और सम्पूर्ण रूप से चमत्कारिक फल देने वाले सहज उपाय हैं। बस श्रद्धा से करने एक बार करके देखें। परिणाम आप स्वयं शुभ देखेंगे।
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श्री सत्यसाहिब
स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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