स्वामी जी एक ऐसे अद्भुत ज्ञान के बारे में बता रहे हैं जो बेहद चमत्कारिक है। स्वामी जी के बताए अद्भुत ज्ञान को सुनने, पढ़ने, अपनाने से सभी कठिनाइयां आसानी में बदल जायेगी।
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(भाग-2)
गुरु राहु चांडाल योग नहीं तंत्र विद्याधर योग यानि तांत्रिक या अघोरी या कौल सिद्ध, वाममार्गी सिद्ध, अथवा साई होना है:-
“आउल बाउल दरवेश साई!
“चौसठ विद्या तंत्र वैष्णव अथाई!
अलख घोष,अघोर,कोल,कपालिक
शिवोहम् सत्य तांत्रिक कहाई!!
अर्थात-जो वैष्णव मत से तंत्र की चौसठ विद्याओं में इस क्रम से सिद्ध होता है की–1-आउल-2-बाउल-3-दरवेश और चौथी यानि पूर्ण अवस्था साई कहलाती है।
जन्मकुंडली में 12 प्रकार के गुरु राहु योग से तांत्रिक योग के तीन योग बनते है-1- निम्न-2-मध्यम-3-उच्च।।
ये तीनों स्थिति इन दोनों ग्रह के तीन स्थिति पर बनते है-1-(निम्न योग) इस योग में गुरु का राहु से कम डिग्री होना और राहु भी नीच राशि में हो,तो व्यक्ति अपनी विद्या का गलत उपयोग करता है लोगों को प्रताड़ित करता है-2-(मध्यम योग) इस योग में गुरु और राहु लगभग बराबर की ही डिग्री के हो और गुरु की मित्र राशि हो तो मध्यम योग बनता है,अर्थात ऐसा व्यक्ति गुरु से सीखकर उसे अपनी विद्या बताकर अपना नया मत खड़ा करता है और लोगों से प्राप्त धन की कितनी प्राप्ति है,उस हिसाब से लोगों की समस्या का निदान करता है,अतः वो पहले अपना लाभ और हानि देखता हुआ,उस विद्या से धन को कहीं न कहीं अधिक महत्त्व देता है।-3-(उच्च योग) इस योग में व्यक्ति अपनी गुरु परम्परा को ही उच्चतम अवस्था में ले जाता है,और अधिकतर बिन लोभ के सभी को समान मानते हुए जनकल्याण करता है,हाँ प्रारम्भ में कुछ समय दान और पद प्रतिष्ठा में रूचि दिखता है,परन्तु समय बीतने पर इन सबसे तटस्थ होता निर्विकार अवस्था को प्राप्त होता है।यो तो इन तीनों में भी निम्न-मध्य-उच्च स्थिति होती है।जो यहाँ नहीं कहीं गयी है।
तंत्र की तीन स्थिति है-मंत्र यानि मन की तीन अवस्था-1-इच्छा-2-क्रिया-3-ज्ञान या सिद्धि।मिलकर ही मंत्र कहलाता है यो ये मन्त्र की प्रारम्भिक जो इच्छा है वो ही भिन्न होने से ही भिन्न मन्त्र बने है और सभी मन्त्रों में बाकि दो-क्रिया और ज्ञान यानि सिद्धि ये समान ही रहती है।यो इच्छा ही मुख्य मन्त्र का स्वरूप है।जैसे-मुझे धन चाहिए या पद या प्रतिष्ठा या शत्रु विनाश आदि तो यहां प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा बदल जाने से ही मंत्र बदल जाते है-पर मंत्र के कार्य करने और करने की क्रिया शक्ति यानि योग एक ही रहता है-की वो मन्त्र अपने साधक के शरीर में जप ध्यान और जिसे देव या साधक की आत्मा के साथ संयुक्त होकर घर्षण करता शक्ति यानि ऊर्जा विधुत उत्पन्न करता है-जेसे-विधुत चाहे पानी से या कोयले से या पेट्रोल आदि से जरनेटर के माध्यम से उत्पन्न की गयी हो यो साधन अलग हो सकते है पर जरनेटर यानि क्रिया योग एक सा ही होगा और परिणाम है-विधुत उत्पन होना ही सिद्धि है,अब उपयोग रह जाता है,वो साधक की मनोकामना पर निर्भर करता है-जैसे-मुझे उत्पन्न या प्राप्त बिजली से कूलर या पंखा या बल्ब या कुछ और चलना है।यहाँ उपयोग यानि इच्छा भिन्न हो गयी,यो मंत्र अलग है।कुछ हद तक लोग कहेंगे की-जरनेटर यानि क्रिया भी अलग अलग होते है,यो प्रत्येक मन्त्र के साथ उसके यन्त्र भी अलग अलग होते है,ये सत्य है पर जो मेने यहाँ क्रिया योग की बात कही वो केवल घर्षण यानि संघर्ष से है।वो एक ही तरहां का होता है-यानि एक इच्छा करने वाला मनुष्य और एक उसकी प्राप्ति को प्राप्त होने वाला मनुष्य।इन दो के मिलन से घर्षण होकर ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही क्रिया योग है।
-जैसे-गायत्री में तीन शब्द-1-भुर्व-2-भुवः-3-स्वः है और शेष इन तीनों से बना मन्त्र स्वरूप है-यहाँ भुवः इच्छा है और भुवः क्रिया है और स्वः ज्ञान या सिद्धि है,अर्थात गायत्री में ये तीन स्तर ही-भुर्व-ब्रह्म और शक्ति स्वरूपी बीज है जिससे गायत्री प्रकट हुयी है,गायत्री माने-ज्ञेय यानि इस विश्व में जो भी -1-स्थूल-2-सूक्ष्म-3-सुक्ष्मातीत है,वही ब्रह्म और उसकी शक्ति है उसका नाम चाहे कुछ हो और-2- भुवः- विश्वामित्र ऋषि है-जिन्होंने सर्वप्रथम अपनी आत्मा के साथ योग करके यानि क्रिया करके इस गायत्री को इस विश्व में सबसे पहले देखा और प्रकट किया है यो विश्वामित्र ही इस गायत्री की क्रिया शक्ति के शक्ति ऋषि है,उन्हें आवाहन किये बिना गायत्री कभी सिद्ध नहीं होती है।और-3- स्वः साधक स्वयं ही है यानि साधक की आत्मा है और यो भुर्व- ब्रह्म और उसकी शक्ति इच्छा और शक्ति का आवाहन और भुवः-इस बीज को प्रस्फुटित करने वाले क्रिया योगी विश्वामित्र से योग करके गायत्री का शाप उत्कीलन करना और फिर-3-स्वः साधक अपनी आत्मा और उसकी शक्ति को इन दोनों से जोड़कर जो भी इच्छा है उसे प्रकट करके उसकी प्राप्ति करता है-ये बाकि गायत्री का मोटा सा अर्थ है। यो जो इन्हें जाने बिना गायत्री मन्त्र जपता है,वो केवल आग आग चिल्ला रहा है और ऐसा आग आग कहने से आग नही लगती है,हाँ मुख जरूर थक जायेगा और अंत में चुप होकर सब छोड़कर बैठ जायेगा और यही तभी मन्त्र जपने वालों का अंत होता है।
और ऐसे ही निर्वाण मंत्र में भी तीन स्थिति है-1-ऐं-2-ह्रीं-3-क्लीं-यहाँ ऐं ही इच्छा है यानि साधक की जो भी मन के भीतर इच्छा है उसे ये बीज मंत्र यानि मूल इच्छा शक्ति “ऐं” अपने में आत्मसात करके विश्व इच्छा में विलय करके उसे फिर ह्रीं यानि क्रिया से जोड़ देती है और फिर ये क्रिया से उस साधक की मूल इच्छा शक्ति पाकर इच्छा शक्ति बनकर सिद्धि में बदलकर उसे मनवांछित परिणाम दे देती है।
निर्वाण मन्त्र में अन्य चामुण्डायै में 9 शक्ति स्तर मनुष्य की कुण्डलिनी के नो चक्र है और विच्चे में 5 स्तर यानि प्रकर्ति के पंचतत्वों का इकट्ठा होकर उस साधक की मनोकामना का सूक्ष्म पंचतत्वों से बदलकर स्थूल स्वरूप यानि जो वो चाहता है वो उसे प्रकर्ति से प्राप्त हो जाता है और जो इसमें नमः लगा देते है,वे अज्ञानी अपनी जो भी इच्छा यानि मनोकामना है उसे क्रिया यानि शक्ति में बदलने के बाद उसे प्रकर्ति में चमत्कार में बदलने के बाद उसे साधक को प्राप्त होने से पहले ही फिर से बीज में बदलकर नष्ट करा लेते है यानि जहाँ से चले वहीं पहुँच गए।खाली के खाली ही रहे।क्योकि मन्त्र में तीन स्थिति है-1-नमः यानि इच्छा का बीज में परिवर्तित होना और रहना-2-फट् यानि बीज का संसार में प्रस्फुटित यानि प्रकट होना और-3-स्वाहा यानि प्रस्फुटित यानि विस्तार होना है, साधक की इच्छा का संसार में प्रकट होकर विस्तारित होना है यो ये तीन स्थितियों को मंत्र विधि विधान से उपयोग किया जाता है और जो साधक अपने गुरु से ये ज्ञान जानता है वहीं सच में कोई भी मंत्र हो उससे सिद्धि की प्राप्ति कर लेता है।वही पहली अवस्था-आउल यानि मांत्रिक ओर दूसरी-बाउल यानि यांत्रिक और तीसरी- दरवेश यानि तांत्रिक और अंतिम अवस्था तन्त्र में पूर्ण सिद्ध ही यथार्थ तांत्रिक या साई कहलाता है।
यो ये ज्ञान पाये बिना कोई मन्त्र यन्त्र तन्त्र सिद्धि नहीं मिलती है।केवल तरहां तरहां की जड़ी-हत्था जोड़ी या सियार सिंघी आदि और रुद्राक्ष आदि के पहनने से या बूटियां को रखने कोई मनोवांछित लाभ नहीं होकर कभी कभी हानि ही मिलती है।
यो इस लेख को ठीक से पढ़े।
ये ही इन सब वैदिक मन्त्रो के जप करने की एक वैदिक स्वर लहरी है,ये नही की किसी गाने वाली की आवाज में गायी गायत्री सुने या वेसे ही जपे या तेजी से मन्दा मन्दा जपे यो कोई लाभ नहीं होगा।उस स्वर लहरी को जाने सीखे तब जपे तो ही कल्याण होगा।
-अब आप इसमें कहेंगे की-जी इसमें गुरु और राहु और उनका योग कहाँ सिद्ध हुआ तो-वो इस प्रकार से है की-गुरु यहाँ साधक की मूल इच्छा और उसकी शक्ति है,क्योकि गुरु आध्यात्मिक यानि सूक्ष्म अंतर इच्छा है-जिसमें-शिक्षा-नोकरी व्यवसाय-प्रेम विवाह-संतान- और पांचवा म्रत्यु और मोक्ष है (और ये ही शुक्र यानि भौतिक इच्छा के अधीन भी है) ये पांच गुरु के अधीन है और राहु यहाँ क्रिया और उसकी शक्ति है जो साधक और उसकी इच्छा यानि गुरु के साथ मिलकर क्रिया करके उसका अभीष्ट की प्राप्ति कराता है,यो यदि गुरु की डिग्री कम हुयी यानि गुरु कमजोर हुआ जिसे अशुद्ध होना कहते है तब व्यक्ति की ये पांचों इच्छाओं में इच्छा तो होती है परन्तु उसमें बल यानि शक्ति नहीं होती है-जैसे मेने ऊपर कहा है की-आग आग कहने भर से आग नहीं लगती है।यो सही से क्रम से की गयी इच्छा या कर्म ही पूर्णता को प्राप्त होता है और अब यदि राहु कमजोर है तो व्यक्ति की इच्छा तो ठीक है बली है परन्तु उसकी क्रिया यानि टेक्नीक कमजोर या गलत है तब उस गलत टेक्नीक से कैसे ऊर्जा शक्ति उत्पन्न होगी ?? बताओ..यो ही इस योग में गुरु और राहु और संग में केतु यानि स्थूल या प्रत्यक्ष परिणाम यानि जो सोचा उसे करने के लिए जो शरीर चाहिए वहीं तो केतु ग्रह है.,यो जो इच्छा मनोकामना है जो मन्त्र है वो गुरु है वहीं ठीक नहीं है और ऊपर से क्रिया राहु ठीक नही और राहु ठीक नहीं तो अधिकतर केतु भी ठीक नहीं और हो तो भी नहीं हो तो भी सब किया हुआ व्यर्थ जा सकता है।यो ये गुरु राहु का तन्त्र योग की सही करें उसे आगामी लेखों में कहूँगा,,
-आगे के 3 भाग में इस गुरु राहु के जन्मकुंडली में 12 तन्त्र योग और उसके निम्न मध्य उच्च फल योग भी बताया जाएगा।
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जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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