श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के अनुसार शमी वृक्ष भगवान शनिदेव का प्रिय वृक्ष है, यह तत्काल चमत्कारी वरदान देने वाला है।
स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के अनुसार – शमी का अर्थ है-शम माने शमन और ई माने शक्ति अर्थात जो सभी दुर्गुणों का शमन करने की शक्ति रखता हो-वो शमी है।
1-भारतीय ज्योतिष में ग्रहों और कुंडली दोषों को दूर करने में वृक्षों और पौधों का महत्वपूर्ण स्थान है। जिनमें पंचवटी यानि पांच वृक्षों का समूह, जिसके नीचे बैठकर जप साधना करने से सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है- अशोक, पीपल, केला, तुलसी, वट वृक्ष आदि की पूजा इसी का हिस्सा हैं। इसी प्रकार शनि ग्रह के सभी दोषों- चाहे वो शनिदेव की महादशा हो या शनि की साढ़े साती, या ढईया हो, उन सबके दोषो को दूर करने में शमी का पौधा प्रमुख स्थान रखता है। यह एक ऐसा पौधा है जिसका केवल घर में होना ही शनि के सभी कुप्रभावों को भी कम करता है। जबकि पीपल को घर में लगाना निषेध माना जाता है। पर शमी शुभ अतिशुभ होता है।
2- शनि के इस वृक्ष शमी पर माता पूर्णिमां और नवग्रहों सहित, देवताओं और देवियों और दिव्य शक्तियों का वास होना माना जाता है। आयुर्वेद में भी शमी वृक्ष की विशेष उपयोगिता मानी गई है।
शमी वृक्ष का पंचांग प्रयोग :-
3- शमी के पौधे या वृक्ष को ‘ शनि घर’ भी कहा जाता है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि घर में एकमात्र इस पौधे के होने से त्रिदेव सहित, सभी देवी-देवताओं, दिव्य आत्माओं की कृपा होती है और लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। शनि के ‘पंचांग’ यानि कि
1-जड़,
2-टहनियां,
3- फूल,
4- पत्तियां
5- कांटे
सभी प्रकार के शनि दोषों को दूर करते हैं।
4- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शमी का पौधा घर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर लगाने से घर में किसी भी प्रकार की किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा यानि नजर या तांत्रिक क्रिया आदि का प्रवेश नहीं होता और घर में धन-धान्य सुख बना रहता है। तंत्र-मंत्र की क्रिया प्रयोगों में शमी के कांटों का शत्रु विनाश अथवा अपनी सुरक्षा को विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।
5- प्रत्येक प्रकार की मनवांछित सफलता के लिए प्रतिदिन सूर्य या पूरब की ओर मुख करके शमी के पौधे में पानी डालने से शनि का प्रकोप कम होता है और व्यक्ति के जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं। इस प्रकार व्यक्ति अपनी खोयी प्रतिष्ठा और पद तथा प्रेम व् गृहस्थ सुख और शिक्षा, व्यापार, कॅरियर में तरक्की करता है और सफलता पाता है।
6- महाभारत में श्मशान में स्थित शमी वृक्ष पर ही पाण्डवों ने अपने दिव्य अस्त्र उसकी कृपा से छिपाये थे और वहीं से पुनः प्राप्त किये थे, शमी वृक्ष में सभी दिव्यता देने की शक्ति है।
तथा तुलसीदास को नियमित शमी वृक्ष के नीचे बैठकर अपने गुरु मंत्र के जपने के उपरांत शमी वृक्ष पर अपने कमण्डल से 41 दिन जल डालने के फलस्वरुप उन्हें दिव्य आत्मा की प्रत्यक्ष दर्शन कृपा प्राप्त हुयी थी,उसी की साहयता से तुलसीदास जी ने हनुमान जी फिर राम जी के दर्शन किये थे। इसकी लकड़ी को यज्ञ की वेदी के लिए भी पवित्र माना जाता है। विशेषकर शनि दोषों को दूर करने के लिए की जाने वाली पूजा में शमी वृक्ष की लकड़ी से बनी वेदी प्रयोग करने से यज्ञ का पूरा फल माना जाता है।
7-भगवान गणेश का प्रिय पौधा
शमी वृक्ष लगभग सभी देवताओं का प्रिय पौधा है। शनिदेव के अलावा यह भगवान गणेश और लक्ष्मी जी को भी विशेष रूप से प्रसन्न करता है। इसलिए गणेश जी के पूजा में हरी दूब के अलावा शमी की पत्तियां प्रयोग करने से व्यक्ति पर सदैव ही गणेश जी और उनकी रिद्धि सिद्धि की कृपा रहती है।
8- सुबह के समय शमी वृक्ष का दर्शन करना शुभ माना गया है। इसके अलावा किसी शुभ काम, यात्रा पर जाने से पूर्व या नियमित काम पर जाने से पूर्व शमी वृक्ष को प्रणाम कर उसकी एक पत्ति अपने साथ पर्स या गाड़ी में सामने रखने या लेकर निकलने से आगे आने वाली विघ-बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति का कार्य सफल रहता है।
शनि दोषों के लिए खास प्रयोग :-
यदि आपके आसपास शनि मन्दिर नहीं है तब शनि दोष दूर करने में शमी को पीपल के वृक्ष का विकल्प माना गया है। गमले में लगे शमी के पौधे को मुख्य द्वार पर बायीं ओर लगाएं। नियमित रूप से इसके नीचे सरसों के तेल का या काले तिल के तेल का दीपक जलाएं। इसके लिए मिट्टी का दीपक प्रयोग करें। ऐसा करने से आप पर सदैव ही शनि की कृपा बनी रहेगी और सभी प्रकार की बाधाओं से आप बचे रहेंग़े।
चमत्कारिक अनुभूत उपाय :-
10- जो मनुष्य शमी वृक्ष के नीचे सामान्यतोर प्रत्येक शनिवार या 8 या 17 शनिवार की प्रातः और साय के 4 से 8 बजे के समय में कम से कम ढाई घण्टे सरसों के तेल या तिल के तेल का दीपक जलाकर और धुप बत्ती जलाकर “”ॐ शं शनैश्चराय नमः”” शनि महामन्त्र का जप करने से अवश्य उसपर शनिदेव की कृपा दर्शन शक्ति की प्राप्ति होती है और जो भक्त अमावस्या की दोपहर अथवा विशेषकर अमावस्या की रात्रि में गंगा जल डालकर स्नान करने के उपरांत के 11 से 2 बजे के मध्य अपने इष्ट मंत्र अथवा अपने गुरु मंत्र का जप ध्यान करता है,उसे अवश्य कोई न कोई आलौकिक दर्शन और शक्ति की प्राप्ति होती है।
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ॐ शं शनैश्चराय नमः
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी महाराज
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