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प्रत्येक 3 साल में आता है यह दुर्लभ महीना, सभी समस्यायों से मिल सकती है मुक्ति, बता रहें हैं श्री सत्य साहिब जी महाराज

 

 

 

“श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के अनुसार प्रत्येक 3 साल में यह दुर्लभ संयोग बनता है कि “15 मई से लेकर 16 जून” की अवधि आपके जीवन में एक बड़ा प्रभाव डालेगी।”

 

-हिंदू पंचाग के अनुसार इस चंद्र वर्ष में ज्येष्ठ माह में अधिक मास पड़ रहा है, जो कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मई और जून माह में रहेगा। 2018 के पश्चात अधिक मास 2020 में आयेगा।
ये ज्येष्ठ मास में अधिक मास का योग 10 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 2007 में ज्येष्ठ मास में अधिक मास पड़ा था। इस वर्ष “15 मई से लेकर 16 जून तक” की अवधि मल मास की रहेगी।

-अधिक शब्द जहां भी उपयोगी होगा, निश्चित रूप से वह किसी तरह की अधिकता को व्यक्त करेगा। हाल ही में अधिक मास शब्द आप काफी सुन रहे होंगे। विशेषकर हिंदू कैलेंडर वर्ष को मानने वाले इस शब्द से खूब परिचित हैं। ज्योतिषीय ज्ञान में जब किसी मास में दिनों की संख्या दो मास के बराबर हो जाये तो वह अधिक मास होता है।

-इस मास की विशेषता यह होती है कि- इसमें सूर्य एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या के बीच सूर्य का राशि परिवर्तन यानि संक्रांति नहीं होती है। यानि कह सकते हैं कि- जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती उस मास को अधिक मास, पुरुषोत्तम मास, मल मास, भगवती का श्री मास आदि नामों से जाना जाता है।यो इस मास के बिन बांटे ही दो पक्ष बन जाते है-पुरुष मास और स्त्री मास।यहाँ कुछ युगल देवो के उपासकों ने इस अधिक मास को अपने युगल देव देवी जेसे-विष्णु लक्ष्मी या शिव पार्वती अथवा सीता राम या राधे कृष्ण की युगल उपासना करने को सबसे सर्वोत्तम सिद्धि प्रदान करने वाला माना है।
और देवी प्रधान मतों में इसी अधिक माह को “भगवती मास” के रूप में उनके आराधना को सर्वोत्तम सिद्धि प्रदान करने वाला माना और पूज्य बताया है।

-शास्त्रानुसार इस माह में मांगलिक कार्य और विवाह संस्कार नहीं किये जाते है, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान, स्नान, दान, उपवास आदि धर्म-कर्म के कार्य ही किये जाते हैं।

-कैसे होती है अधिक मास की गणना;-

असल में ज्योतिष में सौर वर्ष जो कि सूर्य की गति पर आधारित है, और चंद्र वर्ष चंद्रमा की गति पर। अब सूर्य एक राशि को पार करने में 30.44 दिन का समय लेता है। इस प्रकार 12 राशियों को पार करने यानि सौर वर्ष पूरा करने में 365.25 दिन सूर्य को लगते हैं।

-वहीं चंद्रमा का एक वर्ष 354.36 दिन में पूरा हो जाता है। लगभग हर तीन साल (32 माह, 14 दिन, 4 घटी) बाद चंद्रमा के यह दिन लगभग एक माह के बराबर हो जाते हैं। इसलिये ज्योतिषीय गणना को सही रखने के लिये तीन साल बाद चंद्रमास में एक अतिरिक्त माह जोड़ दिया जाता है। इसे ही ज्योतिषीय गणना में “अधिक मास” कहा जाता है।

-किस चंद्र मास में होता है अधिक मास:-

-ज्योतिषीय गणना और शास्त्र सम्मत मत के अनुसार चैत्र मास से लेकर अश्विन मास तक यानि प्रथम सात मासों में ही “अधिक मास” हो सकता है। आश्विन माह के पश्चात पड़ने वाले कार्तिक, मंगसर या मार्गशीर्ष और पौष मास में “क्षय मास” हो सकता है। हालांकि क्षय मास कम ही होते हैं। चंद्र वर्ष के अंतिम दो माह माघ व फाल्गुन में कभी भी अधिक या क्षय मास नहीं होते है।

-इसलिये कहते हैं मल मास:-

-अधिक मास को “मल मास” भी कहा जाता है। इसके पीछे की मान्यता है कि- “1-शकुनि-2- चतुष्पद-3- नाग-4- किंस्तुघ्न” यह चारों करण रवि का मल यानि सूर्य का मल यानि सूर्य के तेज के घर्षण से उत्पन्न गंदगी या इस समय सूर्य से विनाशकारी किरणे निकलती है यो ये मल मास होता हैं। सूर्य का संक्रमण इनसे जुड़े होने के कारण अधिक मास को मल मास भी कहा जाता है।

अधिक मास की पुण्य तिथियां:-

-अधिक मास की शुक्ल एकादशी “पद्मिनी एकादशी” यो ये स्त्री शक्ति को समर्पित है और कृष्ण पक्ष की एकादशी “परमा एकादशी” कहलाती हैं।ये पुरुष शक्ति को समर्पित है।बाद के पुरुष प्रधान युग में ये दोनों एकादशी केवल पुरुष देवों को ही समर्पित होती चली गयी,ये ये अधिक मास “पुरुषोत्तम मास” या “विष्णु मास” कहलाया जाने लगा।मान्यता है कि-इन एकादशियों के व्रत पालन से नाम व प्रसिद्धि मिलती है और व्रती की मनोकामना पूर्ण होने के साथ खुशहाल जीवन मिलता है।

अधिक मास में क्या करें क्या न करें:-

-मलमास में कुछ कार्यों को न करने का विधान हैं। जैसे कि इस माह में कोई स्थापना, विवाह, मुंडन, नव वधु गृह प्रवेश, यज्ञोपवित, नामकरण, अष्टका श्राद्ध जैसे संस्कार व कर्म करने की मनाही है, तो साथ ही कुछ नया पहनना वस्त्रादि, नई खरीददारी करना वाहन आदि का भी निषेध माना जाता है।

-अधिक मास में सूर्य उपासको के लिए उपासना कैसे करें:-

-अधिक मास के आरंभ होते ही प्रात:काल स्नानादि से निबट स्वच्छ होकर भगवान सूर्य को पुष्प चंदन एवं अक्षत से मिश्रित जल का अर्घ्य देकर उनकी पूजा करनी चाहिये। इस मास में देशी (शुद्ध) घी के मालपुए बनाकर कांसी के बर्तन में फल, वस्त्र आदि सामर्थ्यनुसार दान करने चाहिये। इस पूरे माह में व्रत, तीर्थ स्नान, भागवत पुराण, ग्रंथों का अध्ययन विष्णु यज्ञ,देवी पूर्णिमां जप यज्ञानुष्ठान आदि किये जा सकते हैं। जो कार्य पहले शुरु किये जा चुके हैं-उन्हें जारी रखा जा सकता है। महामृत्युंजय, रूद्र जप आदि अनुष्ठान भी करने का विधान है। संतान जन्म के कृत्य जैसे गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत आदि संस्कार किये जा सकते हैं।यहाँ तक की आप अपने पितरों के लिए पितृ श्राद्ध और उनके लिए गायत्री जप अथवा गुरु मंत्रानुष्ठान द्धारा उन्हें मोक्ष विधान भी किया जा सकता है।

 

-तीन साल में एक बार आने वाला अधिक मास शुरू हो गया है। इस साल दो ज्येष्ठ मास रहेंगे। ज्येष्ठ का अर्थ होता है बड़ा। यो इस अधिक मास के दो भाग होते है-15 दिन का एक पक्ष स्त्री देवी को सम्पर्पित होता है और दूसरा 15 दिनों का एक पक्ष पुरुष देव को समर्पित होता आया है।यही प्राचीन सनातन ज्ञान है।

-परन्तु बाद के पुरुष युगों में केवल पुरुष देवों की उपासना की प्रधानता के बढ़ने कारण इस अधिक मास को “पुरुषोत्तम मास” भी कहा गया है, जिसमें भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। विशेषतौर पर वैष्णव संप्रदाय में इसका बहुत अधिक महत्व है। वैष्णव मंदिरों में 30 दिन उत्सव का माहौल रहेगा। अधिक मास में भगवान विष्णु अथवा श्री कृष्ण के कुछ छोटे-छोटे उपाय करने से अनेक लाभ पाए जा सकते हैं। इस महीने में यदि वेष्णव या कृष्ण पंथी आपने लगातार 21 दिन विष्णु जी अथवा श्री कृष्ण मंत्र का जाप कर लिया तो अधिक लाभ मिलता है।

 

-ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।
-ॐ क्लीं कृष्णाय नमः।
-ॐ राधे कृष्णाय नमः।

 

 

-और इस स्त्री प्रधान युग-सिद्धयुग के प्रथम चरण में यदि कोई भी भक्त अपनी सहज भक्ति से केवल इस माह के 15 दिनों अथवा 30 दिनों में स्त्री महावतार माता पूर्णिमाँ के श्रीभगपीठ पर जाकर जल सिंदूर का तिलक उन्हें लगाये और खीर का प्रसाद का भोग उन्हें लगा कर,जो भी मनोकामना मांगेगा,उसकी वो मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी,क्योकि पूर्णिमाँ अर्थ ही है-पूरी माँ…और ये अधिक मास का अर्थ भी है..अधिक वरदायी महीना..यो ये माह पूर्णिमां माता को अधिक समर्पित है।यो इसे “श्री मास” भी कहते है।
– ये माता का सिद्धासिद्ध महामन्त्र है:-

“”सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा””।।

-कैसे करें जाप:-

1 – सूर्योदय के पूर्व जागें, स्नान के बाद भगवती पूर्णिमां की मूर्ति स्थापित करें।
2 – मूर्ति का दूध से अभिषेक करें। अभिषेक करते समय सत्य ॐ सिद्धायै नमः का जाप करते रहें।
3 – दूध से अभिषेक के बाद साफ पानी से नहलाएं फिर पोछकर माता को वस्त्र पहनाएं।
4 – कुंकुम, चंदन, अक्षत आदि से पूजन करें।
5 – गुलाब या मोगरे या गेंदे या पीले कनेर के फूल चढ़ाएं, फिर खीर अथवा माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
6 – इसके बाद आसन पर बैठकर सम्भव हो सके तो-16 मुखी रुद्राक्ष की माला अथवा पंचमुखी रुद्राक्ष की माला या फिर तुलसी की माला से “सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करें।
7 – जाप के बाद भगवती पूर्णिमाँ की आरती करें और खुद प्रसाद लेकर परिवार के लोगों में बांट दें।
इस क्रम को 21 दिन लगातार करें। इससे आपको बहुत सारी परेशानियों से मुक्ति मिलने लगेगी।

 

 

सत्य ॐ पूर्णिमाँ आरती

ॐ जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ,देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।
जो कोई तुम को ध्याता-2,ब्रह्म शक्ति पाता…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
जो करता है ध्यान तुम्हारा,नित सुख वो पाता..देवी-2
जिस चित छवि तुम्हारी-2,सुख सम्पत्ति पाता..देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
ॐ नाम की परब्रह्म तुम हो,ब्रह्म शक्ति दाता-देवी-2
त्रिगुण तुम में बसते-2,तुम आदि माता…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
अखंड मंत्र का जाप करे जो,मुँह माँगा पाता-देवी-2
ऋद्धि सिद्धि हो दासी-2,सिद्ध हो वो पूजता…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
कोई देव हो या हो देवी,सब रमते तुममें-देवी-2
धर्म अर्थ मिल काम मोक्ष हो-2,जो ध्याता तुम में…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
जो कोई करे आरती हर दिन,कष्ट मिटे उसके-देवी-2
रख जल चरण तुम्हारे-2,जो कहे सिद्ध तब से…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
सिद्ध चिद्ध तपि हंसी युग चारो,श्री भग पीठ निवास-देवी-2
जल सिंदूर जो चढ़ाये-2,सुख चार नवरात्रि विकास…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
अखंड दीप पूर्णमासी करे जो,मुँह माँगा पाता-देवी-2
हर माह करे जो ऐसा-2,परम् पद वो पात…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।
वाम भाग में शक्ति बसती,उत्तर बसे हरि-देवी-2
शिव संकल्प तुम्हारे-2,जो कहो ब्रह्म करी…देवी जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ।।

 

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बोलो-जय सत्य ॐ पूर्णिमाँ की जय।

 

***

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


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