
भारत घटिया शिक्षा के मामले में नं0 2 पर है। अब आप पहला नं0 मत खोजिए कि पहला किसका होगा। हम दूसरे नं0 पर हैं इसकी चिंता होनी चाहिए और इस पर चिंतन भी होना चाहिए। भारत में शिक्षा आजके दौर में अपने सबसे निम्न स्तर पर है और इसका स्तर रोजना गिरता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि हम भारतीय उच्च शिक्षा में किसी से कम हैं हम वहां भी बहुत ऊपर हैं लेकिन सवाल उच्च शिक्षा का नहीं है, यहाँ सवाल है भारत में गिरती हुई शिक्षा प्रणाली के ऊपर।
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से भारतीय शिक्षा के स्तर में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली है और यह गिरावट छोटे बच्चों की शिक्षा में ज्यादा है। भारत में पाँचवी कक्षा के बच्चों पर रिसर्च हुआ और यहाँ पर बच्चे नर्सरी के सवालों का भी जबाव नहीं दे पाए।
मीडिया ने कई बार दिखाया है कि भारत में शिक्षा के नाम पर कैसे व्यापार हो रहा है यहाँ डिग्रियाँ बेची जाती हैं। यहाँ अनपढ़ लोगों से पैसे लेकर उन्हें फर्जी शिक्षित बनाया जाता है।
ये सब हमारी आंखों के सामने होता रहा है लेकिन सरकारें मूक बधिर बन सब देखती रही हैं।
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत उन 12 देशों की सूची में दूसरे नंबर पर है जहां दूसरी कक्षा के छात्र एक छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाते। विश्व बैंक के अनुसार, 12 देशों की इस सूची में मलावी पहले स्थान पर है। भारत समेत निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अपने अध्ययन के नतीजों का हवाला देते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बिना ज्ञान के शिक्षा देना ना केवल विकास के अवसर को बर्बाद करना है बल्कि दुनियाभर में बच्चों और युवा लोगों के साथ बड़ा अन्याय भी है। विश्व बैंक ने कल अपनी ताजा रिपोर्ट में वैश्विक शिक्षा में ‘‘ज्ञान के संकट’’ की चेतावनी दी। उसने कहा कि इन देशों में लाखों युवा छात्र बाद के जीवन में कम अवसर और कम वेतन की आशंका का सामना करते हैं क्योंकि उनके प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल उन्हें जीवन में सफल बनाने के लिए शिक्षा देने में विफल हो रहे है।
भारत में शिक्षा का स्तर गिरने की कई वजह है। छोटे बच्चों के मामले में ही शिक्षा का स्तर गिरा हुआ नहीं है बल्कि बड़ों का भी यही हाल है।
इनमें सबसे बड़ी वजह हैं कि हम भारतीय जातियों में बंटे हैं, धार्मिक आधार भी शिक्षा में गिरावट का बड़ा आधार है, भारत में आज भी बड़े स्तर पर ऊँच नीच के भेदभाव हैं।
दूसरा कारण है तेज़ी से बढ़ती हुई जनसंख्या। भारत में जनसंख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और इसमें भी हम दूसरे नम्बर पर हैं।
तीसरा बड़ा कारण है भारत की गरीबी। भारत ने आज वैश्विक स्तर पर अपना कितना भी नाम कर लिया हो लेकिन भारत में बेरोजगारी अपने चरम पर है। अगर हम बीते कुछ सालों के आकंड़े देखें तो बेरोजगारी तेज़ी से बढ़ी है। बीते 10 सालों में भारत में लगभग 20 लाख छोटे बड़े उद्धोग बंद हुए हैं। इन 2 सालों में ही लगभग 15 लाख उद्धोगधंधे बन्द हुए हैं जिसकी वजह से बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ी है। और ये भी एक बड़ी वजह है कि निम्न आय वाले अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते हैं।
चौथा कारण हैं आपसी भेदभाव और लड़ाई झगड़े। हम भारतीय एक दूसरे से भेदभाव करने में बहुत आगे रहते हैं यहाँ धार्मिक उन्माद सबसे ज्यादा होते हैं बात बात पर झगड़ना, दंगे होना इसकी भी एक बड़ी वजह है कि कुछ धर्म विशेष के लोग शिक्षा के मामले में पीछे रह जाते हैं। और लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। उन्हें धार्मिक स्थलों में शिक्षा लेनी पड़ती है जो आजके दौर की प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे है।
वहीं ‘‘ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चौथाई छात्र दो अंकों के, घटाने वाले सवाल को हल नहीं कर सकते और पांचवीं कक्षा के आधे छात्र ऐसा नहीं कर सकते।’’ रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना ज्ञान के शिक्षा गरीबी मिटाने और सभी के लिए अवसर पैदा करने और समृद्धि लाने के अपने वादे को पूरा करने में विफल होगी। यहां तक कि स्कूल में कई वर्ष बाद भी लाखों बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते या गणित का आसान-सा सवाल हल नहीं कर पाते।
इसमें कहा गया है कि ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाई को छोटा करने के बजाय उसे और गहरा बना रहा है। विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष जिम योंग किम ने कहा, ‘‘ज्ञान का यह संकट नैतिक और आर्थिक संकट है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब शिक्षा अच्छी तरह दी जाती है तो यह युवा लोगों से रोजगार, बेहतर आय, अच्छे स्वास्थ्य और बिना गरीबी के जीवन का वादा करती है। समुदायों के लिए शिक्षा खोज की खातिर प्रेरित करती है, संस्थानों को मजबूत करती है और सामाजिक सामंजस्य बढ़ाती है।’’ उन्होंने कहा कि ये फायदे शिक्षा पर निर्भर करते हैं और बिना ज्ञान के शिक्षा देना अवसर को बर्बाद करना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत उन 12 देशों की सूची में मलावी के बाद दूसरे नंबर पर है जहां दूसरी कक्षा का छात्र एक छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाता। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘वर्ष 2016 में ग्रामीण भारत में पांचवीं कक्षा के केवल आधे छात्र ही दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम के स्तर की किताब अच्छे से पढ़ सकते हैं जिसमें उनकी स्थानीय भाषा में बोले जाने वाले बेहद सरल वाक्य शामिल हैं।’’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 में भारत के आंध्र प्रदेश में पांचवीं कक्षा के वह छात्र पहली कक्षा के सवाल का भी सही जवाब नहीं दे पाए, जिनका परीक्षा में प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था। यहां तक कि पांचवी कक्षा के औसत छात्रों के संबंध में भी यह संभावना 50 फीसदी ही थी। इस रिपोर्ट में ज्ञान के गंभीर संकट को हल करने के लिए विकासशील देशों की मदद करने के वास्ते ठोस नीतिगत कदम उठाने की सिफारिश की गई है।
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