
भारतीय सेना की जंग लगी बंदूकों को लेकर कांग्रेस पर तीखा वार करने वाले पीएम मोदी शायद CAG की इस रिपोर्ट को सुनकर चुप्पी साध लें या एक बार फिर से 70 सालों का रोना रो लें। लेकिन जो सच्चाई है वो बेहद कड़वी है। मोदी जी को केंद्र में 3 साल हो चुके हैं और इन तीन सालों में भारतीय सेना अभी भी वही पुराने हाल में है।
आपको बता दें कि CAG की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि भारतीय सेना 10 दिन तक भी नही लड़ सकती है क्योंकि हमारी सेना के पास पर्याप्त गोला बारूद नहीं है।
ये रिपोर्ट चौंकाने वाली ही नहीं बल्कि बेहद डराने वाली है। क्योंकि मोदी जिस राजनीति की सीढ़ी चढ़कर मोदी से पीएम मोदी बनें अब वो भी खंडहर में तब्दील हो रही हैं।
एक तरफ पाकिस्तान भारत की नाक में दम करे रहता है वो आये दिन सीज़फायर का उलंघन कर भारतीय सेना और नागरिकों को निशाना बनाता है दूसरी ओर चाइना भारत को चैन नहीं लेने दे रहा है। चाइना आये दिन भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है इतना ही नहीं वो भारतीय सीमा में घुसकर हमारे लोगों को डराता है भारतीय सेना को अपने ही क्षेत्र से चले जाने की चेतावनी देता है, धक्का मुक्की करता है।
अगर भारत के साथ इन दुश्मन देशों का युद्ध हुआ या यद्ध के आसार बनें तो भारत क्या करेगा? कैसे लड़ेंगे भारतीय जांबाज?
ये बहुत बड़े सवाल हैं जिनका जबाव मिलना मुश्किल है।

चीन और पाकिस्तान से चल रही तनातनी के बीच नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें भारतीय सेना के पास अपर्याप्त गोला-बारूद होने की बात बताई गई है। सीएजी ने शुक्रवार को पेश की गई अपनी रिपोर्ट में साफ बताया है कि पड़ोसी मुल्कों से जंग की स्थिति में भारत के पास 10 दिन लगातर लड़ने के लिए नाकाफी हथियार हैं। बता दें कि सीएजी सरकारी खातों का लेखा-जोखा रखने का काम संभालती है।
भारतीय सेना की ये कमजोरी दुश्मनों के हौसलें बढ़ा सकती है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय सेना के पुराने आर्मोमेंट रिकॉर्ड को बताते हुए उसकी बड़ी कमजोरी को पेश किया। दरअसल, सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक आर्मी हेडक्वॉर्टर ने 2009 से 2013 के बीच खरीदारी के जिन मामलों की शुरुआत की, उनमें अधिकतर जनवरी 2017 तक पेंडिंग थे।
2013 से ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की ओर से सप्लाई किए जाने वाले गोला-बारूद की गुणवत्ता और मात्रा में कमी पर जोर दिया, लेकिन बेहद सोचनीय स्थिति ये है कि इतनी बड़ी लापरवाही पर सेना का कोई ध्यान नहीं गया। वहीं, पॉड्क्शन टारगेट में भी कोई खास तरक्की देखने को नहीं मिली।

किसी काम ना आने वाले या रद्द किए हुए गोला-बारूद को लेकर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इतना ही नहीं सेना के आर्मामेंट डिपो में एक बड़ी लापरवाही ये भी देखने को मिली है कि डिपो में अग्निशमनकर्मियों की भारी कमी है क्योंकि यहां किसी भी वक्त बड़े हादसे होने का खतरा बना रहता है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर डाला गया है कि इस साल जनवरी में सेना के आर्मोमेंट प्रबंधन का पूरा फॉलोअप एडिट किया गया।
बताया गया है कि ऑपरेशन की अवधि की जरूरतों के हिसाब से सेना में वॉर वेस्टेज रिजर्व रखा जाता है। बता दें कि रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसे 40 दिन की मंजूरी मिली थी। वहीं, सेना ने 1999 में यह तय किया की ये अवधि सिर्फ 20 दिन की ही हो। लेकिन सितंबर 2016 की रिपोर्ट से सामने आया है कि केवल 20 फीसदी गोला-बारूद ही 40 दिन के मानक पर फिट बैठे।
वहीं, 55 प्रतिशत आर्मामेंट 20 दिन के न्यूनतम स्तर से भी कम आंके गए। माना कि इसमें प्रगति देखी गई लेकिन एक फायर पावर को मजबूत बनाए रखने के लिए बख्तरबंद वाहन और उच्च क्षमता वाले गोला-बारूद जरूरत से कम रहे।
रिपोर्ट में आगे बताया गया कि रक्षा मंत्रालय ने 2013 में रोडमैप को मंजूरी दी थी जिसमें इस बात पर फैसला हुआ कि 2019 तक पूरी तरह से फिट कर दिया जाए। 2013 में जहां 10 दिन की अवधि के लिए 170 के मुकाबले 85 गोला-बारूद ही (50 फीसदी) उपलब्ध थे, अब भी यह 152 के मुकाबले 61 (40 फीसदी) ही उपलब्ध हैं।
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