महाशिवरात्रि से सृष्टि पूर्णिमा की सत्य कथा बता रहें हैं स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी…
महाशिवरात्रि 2019 दिनांक और समय:-
महाशिवरात्रि 2019 दिनांक :- सोमवार- 4 मार्च 2019 मंगलवार तक
समय सोमवार शाम 5 बजे से मंगलवार सुबह 5 बजे तक
एक बार सप्त सरोवर में विहार करते सत्य नारायण और सत्यई पूर्णिमाँ आनन्दयुक्त थे तब सत्यनारायण को अपनी और प्रेमपूर्ण द्रष्टिपात करते देख सत्यई पूर्णिमा बोली की हे नाथ ऐसे क्या निहार रहे हो इसपर मुस्कराते सत्य बोले की हे षोढ़षी यदि तुम ना होती तो ये आनन्ददायक सृष्टि नही होती। पूर्णिमा बोली कैसे? सत्य ने कहा की अभी आने वाले महाशिवरात्रि के महापर्व के महान दिवस का आपको स्मरण है सत्यई पूर्णिमाँ बोली हाँ महादेव स्मरण है और उसी स्म्रति दिवस की महान कथा को आप अवश्य मेरे और संसार के लिए सुनाये जिससे सभी को सत्य ज्ञान हो और ये पुरुषत्त्व की उपासना और शिवलिंग के सच्चे अर्थ को समझ सके ताकि स्त्री शक्ति का इस महाक्षण में क्या ओर कैसे सहयोग है ये भी भक्तों को सच्चा ज्ञान हो और अज्ञान का निवारण हो तब ये सुन सत्यनारायण बोले की महादेवी ये ज्ञान तो आप भी जानती है परंतु हम दोनों के आनन्दस्वरूप के लिए मैं इसको सुनाता हूँ की इस महादिवस को हमारे क्षण नामक संयुक्तिकरण से जो नित्य पल और प्रतिपल नामक क्रिया और प्रतिक्रिया होती है जिसके फलस्वरुप ये सम्पूर्ण सृष्टि का उदय जीवन और प्रलय तीन अवस्थाएं नित्य बनती रहती है इसी का एक प्रकार काल रूप में जगत में दिखाई देता है जिसे समय भी कहते है उस समय में एक समय ऐसा आता है। जब वर्तमान समयानुसार रात्रि के 12 बजते है तब दो घटनाएं घटती है की एक काल का लय होता है और दूसरे ही पल वहीं सृष्टि होनी प्रारम्भ होती है और इन दोनों के मध्य का मध्यकाल लीनावस्था जिसे शून्यवस्था भी कहते है। जब घड़ी में बारह बजे तीनों सुइयां एक स्थान पर आकर एक हो जाती है तब उसको महाक्षण कहते है ये तीनों सुइयां त्रिगुण तम रज सत् का प्रतीक है यही तीनों जीव जगत माया अर्थ भी है और इन तीनों सुइयों के एक हो जाने को ही त्रिगुणों का विलय या प्रलय कहते है ये तीनों सुइयां 12 बजे ऊपर की और स्थित होकर जिस प्रकार एक दूसरे पर ऊपर होकर एक प्रतीत होती है ठीक यही तीनों गुणों का एक एक भिन्न हो कर एक होना ही शिव का आज्ञाचक्र त्रिपुण्ड कहलाता है और बारह बजे पर सारे त्रिकाल एक हो जाने की अवस्था को कालरात्रि महाआमवस कहते है। इस समय कुछ काल को काल रुक जाता है। जबकि उस समय देखोगें की ये तीनों एक दूसरे के ऊपर होती है और वेसी अवस्था में बाहर से एक दिखाई देती हुयी भी अपनी अपनी अवस्था में स्वतंत्र होती है यही है त्रिगुणों का एकीकरण अवस्था बीज के रूप में एकत्र इकट्ठा होना यही एक बीज और एक स्थिर अवस्था जिसे शून्य भी कहेंगे ये ही ईश्वर कहलाता है।जिसे वेदों में सृष्टि में जब कुछ नही था ना सत् ना असत् अर्थात ना कोई स्त्री थी ना कोई पुरुष था तब केवल शून्य था उसी शून्य में अचानक हलचल होकर विस्फोट हुआ और ये सृष्टि निर्मित हुयी। यो ये शून्य अवस्था ऐसे सभी समय के क्षणों में सदा बनी रहती है। ये तीनों अवस्थाएं नित्य घटित होती है तब प्रारम्भ चाहे किसी भी अवस्था को मानो तथा एक से दूसरे में परिवर्तित होने का नाम प्रलय यानि पर में लय होना कहलाता है जैसे जब अष्ट विकार की अष्ट कलाये अपने चरम पर पहुँच कर सुकार नामक अष्ट कलाएं बनती है। दुःख से सुख व् रात्रि से दिन और पुनः दिन से रात्रि बनती है यो ये सब एक दूसरे के पूरक और सहयोगी होने से ही सम्पूर्ण होते है। यो जब विकार सुकार में परिवर्तित होते है तब उसी अवस्था को प्रलय कहा जाता है और जब सुकार भी अपने चरम पर पहुँच कर पुनः विकार बनते है जैसे मीठा अधिक होते होते पुनः विष बन जाता है ऐसे ही अन्यों को माने यो क्रिया से प्रतिक्रिया है और पुनः प्रतिक्रिया ही लोट कर क्रिया बनती है यही सृष्टि चक्र है इन दोनों के मध्य की कुछ कालिक अवस्था जिसमे स्थिरता बनती है वही मोक्ष क्षण कहलाता है और पुनः वहीँ से यही पुनः पुनः चलता है जब अष्ट विकार अपने चरम की और अष्ट सुकार बनते है तब वो अष्ट और अष्ट मिल कर सोलह कला का नाम पूर्णिमा है और पुनः इस पूर्णिमा से अष्ट सुकार भी रूपांतरित होते हुए अष्ट विकार बनते है यो ये सोलह कला का प्रलय ही अमावस कहलाता है जिसे काल रात्रि कहते है यो प्रतिदिन और प्रतिमाह ये दोनों अमावस और पूर्णिमा घटित होते रहते है इसे मनुष्य नित्य आकाशमण्डल में चंद्रमा की घटत बढ़त के रूप में सामान्यतोर पर देखता है। यो ये बारह अमावस और बारह पूर्णिमा मिलकर चौबीस कला कहलाते है। इन्हीं चौबीस कलाओं को वेद में गायत्री नामक और तन्त्र में श्री विद्या और यंत्र यानि योग में चौबीस तत्व और भोग में स्त्री और पुरुष की प्रेमावस्था का महारास कहते है यो इस फाल्गुन में आने वाली इस कालरात्रि जिसमें सृष्टि की प्रलय अवस्था बनती है और ठीक इसी के उपरांत सृष्टि का पुनः उदय होता है। जिसके उपरांत चैत्र यानि प्रेम की चैतन्यता का काल आता है और इस दोनों के मध्य का काल ही होली नामक काल आता है यो उस समय सृष्टि के पुनः उदय की प्रेमावस्था को हर्षोउल्लास के रूप में नर नारी मनाते है यो इस फाल्गुन की अमावस को महाकालरात्रि कहते है यही सृष्टि की महाप्रलय की अवस्था का नाम है और इस समय मैं सत्य और तुम सत्यई एक होते है तब हमारा प्रेम में लयकार अवस्था ही प्रलय कहलाती है और इसमें हमारे नाम एक होकर स और स=श बनता है और आपके हमारे मिलन से सृष्टि उदय की शक्ति जो महाशक्ति उत्पन्न होती है जिसे शाश्वत प्रेमशक्ति भी कहते है उसका नाँद “ई” ही शेष और प्रकट होता है। ये हमारी नाम श और ई मिलकर शि बनते है और इस प्रेमायुक्त सृष्टि महाशक्ति से जो व वर्णन वर्णित यानि वरण और वरदान प्रकट होता है जो सृष्टि कहलाता है वही नाम शिव नाम से जगत में प्रचलित है तब हमारा एकल स्वरूप प्रेमाभिव्यक्ति स्वरूप प्रेममगन होकर महाशक्ति रूप तरंगित होता है जो क्रिया प्रतिक्रिया या भोग और योग रूप में कर्म और उसका उपयोग बनता हुआ नवीन सृष्टि करता है। यही महावस्था की जागर्ति ही कुण्डलिनी का वक्री जागरण है और यही वक्रत्व तरंगित होना ही प्रेमनृत्य तांडव कहलाता है जिसमें प्रेम भी है रास भी है और लय भी हैं प्रलय और सृष्टि भी है इसी से त्रिगुणों का उदय होता है ये त्रिगुण ही ऋण धन बीज या पुरुष स्त्री और बीज कहलाते है इन्ही के संसारी नाम विभिन्न विभिन्न ब्रह्मा विष्णु शिव सरस्वती लक्ष्मी शक्ति आदि प्रचलित है। ओर प्रचलित शिव जी भी चन्द्रमा के चतुर्थ भाग को अपनाये है पूर्ण को नही।ये चतुर्थ धर्म का धारण करना अर्थ हैं।
और पृथ्वी से दो ग्रह उत्पन्न हुए मंगल ये लाल रंग का और विशाल है यो ये पृथ्वी पुत्र है और चन्द्रमा ये पृथ्वी के पास बना रहता है और शीतल श्वेत रंग से प्रकाशित है ये पृथ्वी की पुत्री है।यो मंगल पुत्र और चन्द्रमा पुत्री को हमने उत्पन्न कर संसार में पुरुष और स्त्री का सन्तुलन व् समानतावादी दर्शन दिया है की जो पृथ्वी और मनुष्य शरीर में है ठीक वही इस ब्रह्मांड में भी है दोनों में कोई भिन्नता नही है।
हे महापूर्णे जब मैं सत्य अपने में विलय होता हूँ तब पुरुष की कालरात्रि होती है यो यही महाशिवरात्रि है जो ठीक रात्रि के मध्यकाल में सम्पूर्ण होती है और कुछ काल मोक्ष में रहकर इसके आगे आपका काल का प्रारम्भ होता जाता है जो भी मनुष्य इस महाक्षण के पूर्व और मध्य और अंत समय तक रात्रि जागरण करता हुआ अपनी आत्मा के विश्वरूप का ध्यान और आत्मरूपी जप चिंतन मनन करता ध्यानस्थ रहता है वह नर नारी मनुष्य जीवन और मृत्यु के कालचक्र का ज्ञान प्राप्त करता है वो हम दोनों के प्रेमत्त्व स्वरूप शिव का आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति करता है जिससे एक एक कला प्रतिपदा अष्ट विकार अष्ट सुकार बनते हुए षोढ़ष कलाओं के स्वरूप में आपसे नवीन सृष्टि होती है जो आगामी पूर्णिमा को सम्पूर्ण होती है यो उस दिन को नवीन सृष्टि के जन्मोउल्लास को षोढ़ष पूर्णिमाँ या होली के पर्व के रूप में मनुष्य समाज मनाता है।
तथा इस होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। सतह ही भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है।और इसी दिन हम दोनों के मन में प्रेम से चैतन्य होकर नवीन स्वयं की सृष्टि करने का प्रथम विचार आया जिसे मन भी कहते है यो हमारे संयुक्त मनों में काम इच्छा की उत्प्तत्ति हुयी और हम दोनों के मन में संसारी काम भोग की इच्छा उत्पन्न होने हम दोनों की आत्म ऊर्जा का गमन संसार की और हुआ यो हमारे मूलाधार में बाहरी चेतना होने से हमारे शरीर में लिंगोउद्दीपन हुआ जिससे संसारी काम की उत्प्तति हुयी जिसे संसार काम देव और रति का प्रथम जनमोदिवस के रूप में भी व लिंगोउत्सव के रूप में मनाता है जिसमे एक सार्वजनिक स्थान पर बसन्त पंचमी को तुम्हारे स्त्री स्वरूप पृथ्वी को योनिरूप मान कर उसके ऊपर मुझ सत्य पुरुष रूप के पुरुष लिंग को एक खम्बे रूप गाढ़ कर खड़ा किया जाता है और आगामी दिनों में अन्य सभी गृहस्थी परिवार अपने अपने घर से गाय स्त्री के उपले जो योनि प्रतीक होते है और पुरुष लिंग रूप लकड़ियाँ वहां रखते जाते है और अंत में अमावस के अंत और पूर्णिमा के प्रारम्भ रात्रिक्षण में उस काम से उत्पन्न इस सृष्टि के उदय रूपी विशुद्ध कामाग्नि को प्रज्ज्वलित कर अपने संसारी अन्न को इस काम के कमनायज्ञमें श्रद्धा स्वरूप भेंट कर वापस प्रसाद रूप पाते ओर परस्पर बांटते है और अगले दिन नवीन सृष्टि का प्रेमोउत्सव प्रसन्ता के रंगो को डाल मनाते है यो इसी दिवस को हमारे मन के भीतर जो सन्तान का चित्रण सृष्टित हुआ वही प्रथम पुरुष मनु और प्रथम स्त्री मानवी नामक के हमारे लौकिक पुत्र और पुत्री का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि भी कहते हैं।और इन्हीं प्रथम नर को नारायण तथा नारी को नारायणी भी कहा जाता है यो इन नर और नारायणी का जन्मोउत्सव भी कहते और मनाते है।
ये सत्य कथा सुन पूर्णिमा ने कहा हाँ प्रभु यही सत्य महाशिवरात्रि की महाकथा है हे देवी-शिवलिंग पे जल चढ़ाने का सच्चा अर्थ है की जल अपनी वीर्य व् सिंदूर स्त्री की रज धातु का प्रतीक है जिसे ज्ञान और उन्नति के भाव को धारण करके अपने मूलाधार में प्रवाहित करते हुए उसे ध्यान ज्ञान शक्ति से काम की दिव्य ऊर्जा बनाते हुए उर्ध्व करते हुए सहस्त्रार चक्र तक ले जाना है और फल फूल चढ़ाना तथा पंचामृत चढ़ाना भी अपने पंचप्राणों रूपी पंचतत्व का प्रकर्ति शरीर को एक करते हुए अपने मूलाधार से सहस्त्रार चक्र तक चढ़ाना है यहाँ ये केवल पुरुष की शिवतत्व साधना है और स्त्री को अपने मूलाधार चक्र यानि श्री भग पीठ में इस सभी भावों को ऊर्जा बना चढ़ाना साधना उपासना अर्थ है यही करना चाहिए ना की ये बाहरी उपासना से दोनों पुरुष और स्त्री को कोई विशेष उन्नति नही होगी।यो इसे सुन और मनन करते हुए जो भी भक्त मनुष्य उस काल में अपने अपने मूलाधार चक्र में स्थित ऋण और धन रूपी स्त्री और पुरुष ऊर्जा के एकीकरण का स्मरण करते हुए ध्यान करता है वो मनुष्य अपनी आत्मा के विश्वरूप का साक्षात्कार की प्राप्ति करता है यो पुरुष युगों में पुरुष के मूलधार चक्र के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की अर्थ सहित अपने मूलाधार में ध्यान से स्थापना करते हुए साधना करते थे और वर्तमान में स्त्री युग में स्त्री को अपने मूलाधार चक्र में अपने श्रीभग पीठ की अर्थ सहित ध्यान करते हुए स्थापना करें और दोनों अपने अपने मूलाधार चक्र का ध्यान करते हुए इस महाक्षण में कुण्डलिनी जागरण और ज्ञान को आत्मसात करे। यही सच्चे ज्ञान को अपनाने का नाम ही संकल्प यानि व्रत कहते है। यो यही सच्चा शिवरात्रि का व्रत कहलाता है। जिसे कर मनुष्य शिवलोक यानि आत्मलोक की प्राप्ति करता है।
शिवाय शिवाय शिवाय्…
4 मार्च 2019 सोमवार महाशिवरात्रि पर्व पर भक्तों के लिए शिव महिमा का अर्थ बताते स्व रचित शिवाष्टक भक्ति के माध्यम से स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी और आश्रम में भक्तों द्धारा इस दिवस पर साय 5 से 6 तक यज्ञानुष्ठान है…
घनन घनन घन घोर घटा
सावल वर्ण आदित्य छटा।
ज्ञान परम् है मुख मुस्कान
आछंदित प्रभा किरण नटा।।
शिवाय शिवाय् शिवाय्..
तम् रज सत् त्रिशूल गुणी
मस्तक मध्य प्रज्ञा है मणि।
तीनों जग है केंद्र निवास
सुखासन सुखदायी घणी।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्…
गुंजयमान स्व ॐ है नाँद
कंठ न लांघता विषधर बाँध।
मन सिंहासन चरण है दास
चार धर्म सर चौथ है चाँद।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्…
गोरी बैठी वाम है अंग
सिंघी बाजे अमर अभंग।
डमरू देता बज त्रिताल
हिम धरा फूटता नित नव रंग।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्…
गंगा निकले जटा से फूट
हर हर कहती अमृतधारा।
निर्वाण द्धार से बह कल कल
दे लोक परलोक सुख सारा।।
शिवाय शिवाय् शिवाय्..
आनन्द के अश्नु रुद्राक्ष जने
पँच तत्व भस्म स्वीकार करो।
दिगम्बर हो कर व्योम धारण
अधिकार सभी दे प्रेम झरो।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्…
नर को नारायण बनाते शिव
कर्म को भक्ति रूपायन करो।
कंकर को शंकर बना लिंगी
शव में शक्ति भर शिव नाम धरो।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्…
सत्य हो सनातन स्वरूप
ॐ अरूप चैतन्य स्वमिव।
सिद्धायै हो स्वास्तिक सम्पूर्ण
नमः नाओहम एकमेव शिव।।
शिवाय् शिवाय् शिवाय्….
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
Discover more from Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Hindi News – Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines, current affairs, cricket, sports, business and cinema, Latest Hindi News, Breaking News in Hindi, Bollywood Gossip, Bollywood News, Top Hindi News Channel, Khabar 24 Express Live TV, Khabar24, Khabar24 Express



Jai satya om sidhay namah