मुंबई की राजनीति में आज एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। बीएमसी में कभी निर्विवाद वर्चस्व रखने वाली उद्धव ठाकरे की शिवसेना को करारी हार क्यों मिली?
क्या ये हार बीजेपी की रणनीति थी या फिर उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल? दरअसल इस हार की जड़ में एक नाम बार-बार सामने आ रहा है… राज ठाकरे।
आज की इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि कैसे MNS से गठबंधन उद्धव ठाकरे के लिए आत्मघाती साबित हुआ।
बीएमसी पर दशकों तक राज करने वाले उद्धव ठाकरे को इस बार ऐसा झटका लगा, जिसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। कांग्रेस को किनारे कर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से गठबंधन करना उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।
मुंबई में लाखों की संख्या में उत्तर भारतीय और गुजराती मतदाता रहते हैं, जिनकी भूमिका बीएमसी चुनाव में निर्णायक होती है। राज ठाकरे की आक्रामक राजनीति को इन वर्गों ने पूरी तरह नकार दिया। जनता ने सड़कों पर नहीं, बल्कि बैलेट से जवाब दिया।
बीएमसी चुनाव ने साफ कर दिया है कि मुंबई की राजनीति अब भावनाओं से नहीं, संतुलन और समावेशी सोच से तय होगी। राज ठाकरे की राजनीति को जनता ने नकार दिया, लेकिन इस फैसले की सबसे बड़ी कीमत उद्धव ठाकरे को चुकानी पड़ी।
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