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Aravalli Hills Controversy: माइनिंग बनाम पर्यावरण, पहाड़ों को माफियाओं से नहीं बल्कि सरकार से खतरा?

Manish Kumar Ankur | Exclusive Report | Save Aravalli Hills | Khabar 24 Express



देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला पर खतरा मंडरा रहा है। अरावली… जिसने सदियों से उत्तर भारत को रेगिस्तान बनने से बचाया।

लेकिन अब सवाल उठ रहा है क्या विकास के नाम पर अरावली को खत्म किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद ये बहस फिर तेज हो गई है।

और इन सबमें इतर आपके मन में सवाल यह उठ रहा होगा कि आखिर सरकार क्या कर रही है? तो हम आपको बता देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की आड़ में सरकार ही माइनिंग करवा रही है। आपकी सांसों का सौदा और कोई नहीं बल्कि सरकार कर रही है।

सरकार कौन? कौनसी सरकार? अब सरकार चाहे राजस्थान की हो, हरियाणा की हो या केंद्र की मोदी सरकार… सरकार तो सरकार है। पीएम मोदी पर्यावरण को बचाने के लिए इतनी बड़ी बड़ी बाते करते हैं… आज कहां गया उनका पर्यावरण प्रेम? या पर्यावण प्रेम महज एक दिखावा है?

आखिर क्या है पूरा मामला, और इसका असर दिल्ली-एनसीआर तक क्यों डराने वाला है? आइए समझते हैं पूरी रिपोर्ट।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने नई बहस को जन्म दे दिया। कोर्ट ने कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को जंगल के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाएगा।

इस फैसले के बाद पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर ‘सेव अरावली’ अभियान चलाया जा रहा है और युवाओं में नाराज़गी साफ दिख रही है।

दरअसल, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में अरावली क्षेत्र की करीब 10 हजार पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना गया था। रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि इन इलाकों में खनन गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए।

लेकिन राजस्थान सरकार ने इस रिपोर्ट पर आपत्ति जताई। राज्य सरकार का तर्क था कि अगर इसे पूरी तरह लागू किया गया, तो प्रदेश की ज्यादातर माइनिंग बंद हो जाएगी।

सरकार की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर नया कानून बनाया जाना चाहिए, और तब तक पुरानी व्यवस्थाएं लागू रहेंगी।

यहीं से विवाद गहराता है। अब अरावली की परिभाषा बदल दी गई है। 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा। 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को जंगल नहीं माना जाएगा।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई कंपनियां माइनिंग के लिए पहाड़ियों की ऊंचाई कागज़ों में कम दिखा रही हैं।
100 मीटर से ज्यादा ऊंचे पहाड़ों को 60 या 80 मीटर बताकर खनन की अनुमति ली जा रही है।

अरावली क्यों इतनी अहम है, ये समझना जरूरी है। अरावली पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक फैली हुई है।

यह पर्वतमाला भूजल संरक्षण, तापमान संतुलन और प्रदूषण रोकने में बड़ी भूमिका निभाती है।

जानकारों का कहना है कि अगर अरावली कमजोर हुई, तो दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण और पानी की समस्या और गंभीर होगी। गर्मी बढ़ेगी, जल संकट गहराएगा और लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ेगा।

अरावली ही नहीं, देश की दूसरी पर्वत श्रृंखलाएं भी खतरे में हैं। पश्चिमी घाट में बड़े पैमाने पर आयरन, मैंगनीज और बालू का खनन हो रहा है। वहीं ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियां वर्षों से बॉक्साइट माइनिंग का शिकार हैं।

यानी सवाल सिर्फ एक पहाड़ का नहीं है,
सवाल पूरे देश के पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों का है।

आज फैसला हमारे हाथ में है या तो हम पहाड़ बचाएंगे, या आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ कंक्रीट और धुआं सौंप देंगे।

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