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आज के दौर का RIP Journalism : मनीष कुमार अंकुर (Manish Kumar Ankur)

वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार अंकुर ने एक फेसबुक पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने बहुत कुछ लिखा है। उन्होंने आज के पत्रकारिता के हाल पर लिखा है। पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है इसके बारे में लिखा है। उन्होंने सत्तादल के ऊपर भी सवाल उठाए हैं, तो साथ ही उन ट्रॉल्स को भी अपने निशाने पर लिया है जो सत्ता पक्ष की गुलामी करता है। आप भी मनीष कुमार अंकुर (Manish Kumar Ankur) की इस फेसबुक पोस्ट पर नज़र डालें

आज भले बीजेपी की जीत हो लेकिन याद रखिए जिस-जिस ने भी बीजेपी को वोट दिया है वो अपने बच्चों, परिवार का भविष्य बिगाड़ने के लिए स्वयं जिम्मेदार होंगे।
बीजेपी ने पिछले 5 सालों में हिन्दू-मुस्लिम के अलावा कुछ नहीं किया।
आपको हिंसा पसंद है, अराजकता पसंद है, जातिवाद पसंद है, हिन्दू-मुस्लिम की नफरत पसंद है, संविधान रहित भारत पसंद है, लूट खसूट पसंद है, महंगाई पसंद है… तो आपने अपनी पसंद के मुताबिक ही तो वोट किया है।
अगर कल बीजेपी जीत जाती है तो
तो इन निम्नलिखित बातों का रोना नहीं रोना
जैसे :
बेरोजगारी का रोना नहीं रोना।
मुफ्त और अच्छी शिक्षा का रोना नहीं रोना।
अपने शहर की कुव्यवस्था पर रोना मत रोना।
बढ़ती अराजकता का रोना नहीं रोना।
हिन्दू मुस्लिम खतरे में हैं इसका रोना नहीं रोना।
बढ़ती महंगाई का रोना नहीं रोना।
रोने के लिए अभी कोरोना भी है…. और भी बहुत कुछ है। लेकिन आप रोना नहीं रोना… क्योंकि हो सकता है आपके इस रोने का मजाक हम बनाएं।

दिखने के बावजूद भी कुछ न दिखे इसे ही अंधभक्ति कहते हैं।
और इसी अंधभक्ति ने भारत को बर्बाद किया है। वरना कांग्रेस केंद्र की सत्ता में 50 साल से ज्यादा नहीं रहती।
और अगर रही भी तो… या तो उसने बेहद अच्छे काम किये होंगे या उसने भी भक्त बनाये होंगे। लेकिन उनकी इस भक्ति में न तो ईवीएम का रोना था और न ही सोशल मीडिया और मीडिया का हाथ था।

लेकिन 2014 के बाद देश ने इन 8 सालों में जो झेला है वो बेहद डरावना और भयावह रहा है। भले आप आज हमें गालियां दें, बिकाऊ बोलें लेकिन आपकी इस करनी का फल आपकी औलादें जरूर झेलेंगी।

10 मार्च को अगर भाजपा की जीत होती है तो बहुत से पत्रकार या तो पत्रकारिता छोड़ चुके होंगे या अपनी कलम नीलाम कर रहे होंगे। उनमें से हम भी एक हो सकते हैं।

देश की आजादी की लड़ाई के लिए जिस तरह स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी थी उसी तरह बहुत से पत्रकार भी हैं जो आपको सही गलत का फासला बताते हुए शहीद हो गए या बुरे दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन आप लोगों ने क्या किया? उनकी शहादत का मजाक बनाया, या उनकी सच्चाई पर आप लोगों ने उनकी माँ बहन बेटी को टारगेट करते हुए भद्दी-भद्दी गालियां दी।
वो मजाक, गालियां या टिप्पणियां उनके लिए नहीं बल्कि आपकी खुद की बर्बादी के लिए थीं। जो आपने किया उसे भोगना पड़ेगा, गीता में भी यही लिखा है।

याद करिए आज़ादी से पहले जब स्वतंत्रता सेनानी देश को आजाद करवा रहे थे तब अंग्रेजों के दलाल बहुत से भारतीय उनका मजाक बना रहे थे, उन्हें मरवाने का काम कर रहे थे, उनके परिवारों को बर्बाद करने का काम कर रहे थे।
आज भारत की हालत ठीक वैसी ही हो गयी है।
लेकिन अब बहुत कम पत्रकार, समाजसेवी या अच्छे नागरिक बचे हैं जो दूसरों की आवाज बनने के लिए खुद दुःख तकलीफ सहते हों।
लेकिन आपकी करनी की वजह से बहुत से लोग अपने कदम पीछे खींच रहे हैं…. उनमें से हम भी एक हो सकते हैं…।
अब नहीं सह सकते, न तो हमारे पास बड़ा वेंचर है और न ही बहुत ज्यादा धन दौलत। हम जैसे पत्रकारों ने पत्रकारिता से कभी समझौता नहीं किया हो सकता है कि करें भी न।
लेकिन यकीन मानिए इन आठ सालों में बहुत से लोग टूट चुके हैं। और इसका कारण आप लोग हैं। आप अभी तो मन मारकर खुश हैं लेकिन ये खुशी कभी भी मातम में बदल रही है… । उदाहरण के तौर पर “स्कूल नहीं चाहिए, अस्पताल नहीं चाहिए, रोटी नहीं चाहिए, मंदिर चाहिए, मंदिर” कहने वाला पिछली साल कोरोना की मौत मारा गया। यानि ये खुशी कभी भी किसी के जीवन को मातम में बदल सकती है। ऐसा नहीं है कि हम अजर अमर हैं। लेकिन। सुकून है दिल को, तसल्ली है कि हमने न तो अपनी कलम बेची, न ईमान बेचा और न ही देश को बेचने में अपना प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष योगदान दिया।

धन्यवाद।

शायद अंतिम पोस्ट

#ManishKumarAnkur


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