
1-मन्दिरों में प्रातः और साय की आरती और पाठ आदि का उच्चारण केवल मंदिर के पुजारी और वहाँ उपस्थित भक्तों के गायन स्वर में ही अनिवार्य होना चाहिए नाकि किसी फ़िल्मी या कैसेट चलकर किया जाना चाहिए इन्हें बिलकुल बंद कर देना चाहिए।
2-मंदिर की दैनिक सेवा सफाई से वहाँ आने वाले भक्तों को अवश्य जोड़ना चाहिए ताकि मंदिर की महिमा और मन्दिर के प्रति श्रद्धा भाव और धर्म के प्रति श्रद्धा भाव की बहुत वृद्धि होती है और मन्दिर के आसपास होने वाले अधार्मिक उपद्रवियों की गतिविधि भी कम व् समाप्त हो जाती है।
3-मन्दिर उत्थान,जीणोउद्धार और
उत्सवों में भी भक्त लोग बढ़ चढ़ कर पूरी श्रद्धा से भाग लेते है और उन्हें लेना भी चाहिए।
4-मन्दिरों में आने वाले भक्तों को ये समझना चाहिए और उन्हें समझाना भी चाहिए की मन्दिर में अपने घर से जब पूजा करने चले तो स्नान करके चले अथवा कम से कम हाथ मुख धोकर मन्दिर में प्रवेश करें और अधिक उत्तम तो यही रहता है की भक्तजन पूजा के वस्त्र ही पहन कर तब मन्दिर में पूजा करने आये।
5-मन्दिरों में प्रवेश करने से पहले अपने अपने मोबाइलों को बन्द कर दे ताकि विर्विघ्न रूप से पुरे मन से एकाग्रचित होकर पूजापाठ कर सके व् अन्य पूजा कर रहे भक्तों का भी ध्यान आपके अचानक बजने वाले मोबाईल से पूजा में विघ्न नही पड़े और वो भक्त भी आपके प्रति मन ही मन दुर्वचन या शाप नही दे क्योकि आप मन्दिर में वरदान लेने आये है नाकि वहाँ से ऐसे व्यवहार से शाप लेकर वापस जाये।
6-मन्दिर के प्रसाद को इधर उधर नही डाले न ही कुत्तों को इतना डाले की वे सहजता से खा सके वेसे भी वे कितने भक्तों का डाला प्रसाद खाएंगे? जब वे खाएंगे ही नही तो वो प्रसाद आप जेसे ही किसी न किसी भक्त के पैरों के नीचे आकर देवता व् देवी के अपमान का कारण बनेगा और आप शाप के भागीदार बनेगे।
7-भक्तों को सदा मन्दिर के नियमों के अनुसार चलना चाहिए ना की अपनी मर्जी से चले यदि मन्दिर का पुजारी या व्यवस्थापक आपको किसी नियम को मानने के कहे तो आप माने आप ये तर्क नही करें की अजी उस मन्दिर में तो ऐसा नही होता है या अजी मुझे आप पूजा नही करने दे रहे है अजी सबका मन्दिर है कोई आपका मन्दिर है ?आदि कुतर्क नही करके आपको उनका सहयोग करना चाहिए तभी सही से व्यवस्था बनती है।
8-मन्दिर में होने वाले धार्मिक उत्सवों में भक्तों को अधिक से अधिक दान और जेसी बने साहयता अवश्य करनी चाहिए ये नही की हमसे जो बनेगा वही देंगे अर्थात आप सामर्थ्यशाली है और आप जरा से धन देकर अपना पीछा छूटा लेते है और फिर ये भी कहते फिरते है हम तो अधिकतर जो बनता है दान करते रहते है तो ये जानों जिस ईश्वर से आप अपनी मनचाही मनोकामना पूरी होने की आशा करते है वो “जेसी करनी वेसी भरनी” का सिद्धांत आपको ही सिखाएगा क्योकि जो भी धार्मिक उत्सव हो रहा है वो आपके भले और आपकी ही मनोकामनाओं की पूर्ति को ही किया जा रहा है यही जिस देवी देवता को आप मानते है वो भी आपका भक्ति और सेवा और दान का भाव देखता है यो निस्वार्थभाव से अधिक से अधिक सेवा दान आदि जो बने वो अवश्य करते रहना चाहिए।
8-आपके पास कोई भी मन्दिर हो उसमे आरती के समय अवश्य ही सम्मलित होना चाहिए ये नही की हम तो केवल अपने व्रत वाले दिन ही मन्दिर जाते बाकि तो अपने घर में ही पूजा कर लेते है या अजी लोग टोकते है की बड़ी पूजापाठी बन रहे हो ये सब बहाने छोड़कर आरती में अवश्य जाये ये सबसे बड़ी ईश्वरीय पूजा और सेवा है जो की प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को अवश्य करनी चाहिए।
तो भक्तों आज और अभी से इन धार्मिक नियमों को अपनाते हुए व् पालन करते हुए अपने अपने ईश्वर देव देवी आराध्य की कृपा पाये और इस धार्मिक लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों को लाइक ओर शेयर से भेजकर धर्म पूण्य कमायें।
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी
Www.satyasmeemission.org
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