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मत्स्येन्द्रासन कैसे है लाभकारी? सूर्य चन्द्र नाड़ियों में प्राणशक्ति के प्रवाह में जाने रहस्य, बता रहे हैं महायोगी सद्गुरु स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

मत्स्येन्द्रासन का नाम,महायोगी मत्स्येंद्रनाथ के नाम से सिद्ध है,मत्स्येंद्रनाथ नाथ पंथ के मुख्य संस्थापक हुए है।

सबसे पहले,आप अपने उस समय चल रहे स्वर को अपनी हथेली पर नांक से सांस छोड़कर जाने,फिर जो स्वर चल रहा है,उसी पर को,मानो बायां स्वर चल रहा है,तो पहले बाएं पैर को मोड़ते हुए कूल्हों की तरफ ले जाएं। इसे करते समय बिल्कुल सीधे बैठें।सांस सामान्य लेते रहे।


इसे करते समय जो पैर मोड़ा है,अब उसके विपरीत हाथ का इस्तेमाल करें। जैसे आपने बाएं पैर को मोड़ा था तो दाएं हाथ को उठाएं और बाएं हाथ के घुटने पर मोड़कर रखें।
अगर आपकी फ्लैक्सीबिलिटी अच्छी है तो आप अपने पैर को या उसके टखने या पंजे को भी पकड़ सकते हैं।
ऐसा करने के बाद अपने शरीर को पीछे की तरफ घुमाएं।
ओर दूसरे हाथ को पीठ के पीछे ले जाकर कमर या जमीन पर रख शरीर का बैलेंस बनाएं रखे,साथ ही अपने सिर को जो पैर नीचे जमीन पर रखा था,व जो स्वर चल रहा था,उसी दिशा में देखते हुए रखें।

ऐसा करके,उसके बाद एक गहरी सांस लें और छोड़ें।इसी मुद्रा में अपनी गहरी सांस पेट व मूलाधार तक लगभग 5 या 10 बार ले और सहजता से छोड़े।
इस आसन को करते समय 30 सेकेंड तक इसी मुद्रा में बैठें।
ऐसे ही पलटकर दूसरी ओर से इसी मुद्रा में मत्स्येन्द्रासन को करना चाहिए।
इसे कुल मिलाकर दोनों ओर से 3-3 बार ही करना चाहिए,ओर आगे चलकर केवल अधिक देर तक दोनों ओर से मिलाकर दो बार ही करें,इस मुद्रा में प्राणों का शरीर मे कहां गति हो रही है,इसका विशेष ध्यान करना चाहिए।

मत्स्येन्द्रासन करने के फायदे जाने:-

मत्स्येन्द्रासन आपके सांस को सीधा चलाकर ब्लड प्रेशर को नियमित करने में मदद करता है।
किडनी और लिवर में प्राण शक्ति जाने से,वहां एक प्रकार की मालिश होने फायदा होता है।
आपके लिवर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालने में सहायता करता है।
डायबिटीज का इलाज करने में बहुत लाभकारी होता है।
कमर दर्द से राहत दिलाने और रीढ़ की हड्डी को स्वस्थ रखने में बड़ा लाभ देता है।

कब नहीं करें:-

कमर पेट या हार्ट का ऑपरेशन हुआ है,कम से कम 1छः महीने बाद कर सकते है,वो भी बहुत धीरे धीरे अभ्यास बढ़ाकर।
इसमें जब बहुत अच्छा अभ्यास हो जाये तब ही एक बार ही, सहज चल रही सांस को खींचकर मूलबंध लगाकर थोड़ी देर तक हल्का कुम्भक किया करें।
इससे प्राण शक्ति का इंगला व पिंगला नाड़ियों में पैर के अंगूठे तक जाकर कालाग्नि की जागृति होकर सभी कुंडलिनी के 16 शक्ति पॉइंटों की जागृति होकर प्राण शक्ति सुषम्ना में गति होने लगती है और अनहद नांद का गूँजय अनुभव होने लगता है।

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
महायोगी स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब की

www.satyasmeemission.org


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