
इस बार बीजेपी और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने बम्पर जीत हासिल की थी। और इस बार बीजेपी उससे भी बड़ी जीत का दावा ठोक रही है। वहीं कांग्रेस भी अपनी जीत का दावा करने में पीछे नहीं है।

लेकिन आंकड़ों के हिसाब से इस बार बीजेपी को खासा नुकसान होता दिख रहा है और 2014 के मुकाबले कांग्रेस को बढ़त मिलती नज़र आ रही है।
संघ यानि आरएसएस के गढ़ नागपुर में भी इस बार का मुकाबला काफी दिलचस्प दिखाई दे रहा है।
नागपुर एक ऐसी लोकसभा सीट है जिसे आरएसएस का गढ़ कहा जाता है संघ कार्यालय का मुख्यालय भी नागपुर में ही है। लेकिन नागपुर सीट से भाजपा को कुछ ही जीत नसीब हुई हैं।
नितिन गडकरी नागपुर लोकसभा सीट से पहली बार 2014 में लोकसभा चुनाव जीते। उन्होंने कांग्रेस के विलास राव मुत्तेमवार को चुनाव हराया। इस बार भी नितिन गडकरी दोबारा यहां से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस के नाना भाऊ पटोले से है। मालूम हो कि नितिन गडकरी मोदी सरकार के सबसे बेहतरीन परफॉरमेंस वाले मंत्रियों में गिने जाते हैं।

लेकिन अब बात करते हैं 2019 के लोकसभा चुनावों की। इस बार इस सीट पर नितिन गडकरी का मुकाबला नानाभाऊ पटोले से है। नाना भाऊ पटोले को जमीनी स्तर का नेता माना जाता है किसानों में नाना भाऊ का अच्छा दबदबा माना जाता है। नाना भाऊ के बारे में सबसे बड़ी बात कि वो गोंदिया-भंडारा लोकसभा सीट से भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ चुके हैं जिसे वे जीते भी। लेकिन नाना भाऊ की पीएम से अनबन की खबरें आईं और उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए 2017 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए।
नाना भाऊ ने एनसीपी के कद्दावर नेता प्रफुल्ल पटेल को हराया था। 2009 में नाना भाऊ निर्दलीय चुनाव लड़े थे और वे दूसरे नं. पर आए थे। इसी को देखते हुए भाजपा ने 2014 में दाव खेला और नाना भाऊ ने जीतकर भाजपा के दावे को सही कर दिया।
लेकिन पीएम मोदी से नाराजगी के चलते नाना भाऊ ने पार्टी को अलविदा कह दिया। नाना भाऊ की नाराजगी किसानों को लेकर थी। नाना ने आरोप लगाया था कि विदर्भ के किसानों के साथ केंद्र की सरकार छल कर रही है। वे मोदी शाह से भी मिले लेकिन किसानों के लिए कोई हल न निकला और इसके बाद नाना ने पार्टी छोड़ने तक की धमकी दी, फिर भी शीर्ष नेताओं के कानों पर जूं तक न रेंगी। और अंत में नाना भाऊ ने पार्टी से इस्तीफा से दिया।

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नाना भाऊ पटोले के राजनीतिक करियर को देखें तो नाना पटोले करीब 30 साल से राजनीति में हैं। 1990 में पटोले सांगड़ी जिला परिषद इलाके के भंडारा जिला परिषद से सदस्य बने।
सांसद बनने से पहले नाना पटोले तीन बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए। अपने पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय के तौर पर वो मैदान में उतरे, हालांकि बीजेपी से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 1999 और 2004 में नाना पटोले कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव में उतरे और जीत दर्ज की। पटोले कांग्रेस की ओर से महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता भी रहे हैं। हालांकि वो पहली बार तब सुर्खियों में आए जब 2014 में बीजेपी से सांसद बने।
नाना पटोले की पहचान तेज तर्रार नेता के तौर पर रही है। पटोले हमेशा से वह किसानों के मुद्दे को उठाते रहे हैं। बीजेपी में आने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यहां वो खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं। उन्होंने पहले भी कई बार इस बात का जिक्र किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सवाल पूछना पसंद नहीं है। पटोले ने बताया कि पीएम मोदी उस समय उनसे गुस्सा हो गए जब उन्होंने ओबीसी मंत्रालय और किसानों की आत्महत्या के बारे में सवाल करने की कोशिश की। पटोले के अनुसार उन्होंने यह सवाल भाजपा सांसदों की मीटिंग में उठाने की कोशिश की थी।
नाना पटोले केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की किसानों को लेकर भूमिका पर काफी समय से नाराज चल रहे थे। नाना पटोले ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के किसानों की समस्या को लेकर उन्होंने कई बार सवाल पूछने की कोशिश की, हालांकि जब भी उनसे सवाल किया जाता है, तो प्रधानमंत्री मोदी पूछने लगते हैं कि क्या आपने पार्टी का घोषणा पत्र पढ़ा है और क्या सरकारी स्कीमों की जानकारी है आपको?’
नाना पटोले ने जब लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन को अपना इस्तीफा दिया तो उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को जो पत्र भेजा उसमें उन्होंने अपने इस्तीफे की 14 वजहें गिनाईं। लोकसभा और बीजेपी से इस्तीफा देने के बाद पटोले ने कहा भाजपा में लोकतंत्र बिल्कुल नहीं है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सवाल सुनना पसंद नहीं है। पटोले ने कहा था कि बीजेपी ने सत्ता में आने से पहले जनता से वादा किया था कि सरकार बनने पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेंगे, लेकिन केंद्र सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं कर सकते। ये देश की जनता और किसानों के साथ धोखा था।
नाना भाऊ पटोले को इसी तेज़ तर्रारी के लिए जाना जाता है और उनकी छवि भी साफसुथरी मानी जाती है। नाना पटोले पर कांग्रेस ने नागपुर से ऐसे ही दाव नहीं खेला है। भविष्य की संभावनाओं के प्रधानमंत्री कहे जाने वाले नितिन गडकरी के सामने नाना भाऊ की चुनौती इस लिहाज से कम न होगी।
नागपुर लोकसभा सीट पर नितिन गडकरी का मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार नाना पटोले से है। 2014 में नाना पटोले ने भंडारा-गोंदिया सीट पर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए एनसीपी कद्दावर नेता प्रफुल्ल पटेल को हराया था। 2017 में नाना पटोले बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे।
अब देखना यह दिलचस्प रहेगा कि इस सीट पर भावी प्रधानमंत्री नितिन गडकरी जीत हासिल करते हैं या किसानों, गरीब, मजदूरों की उम्मीद माने जाने वाले नाना भाऊ पटोले बाजी मारते हैं।
तो आइए डालते हैं नागपुर की राजनीति पर एक नज़र :
महाराष्ट्र की उपराजधानी और विदर्भ का सबसे प्रमुख शहर नागपुर वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ है, लेकिन यहां सबसे ज्यादा चुनाव कांग्रेस ने जीते हैं। वर्तमान में यहां से बीजेपी के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सांसद हैं। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में चार बार के सांसद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विलास मुत्तेमवार को चुनाव हराया था।
नागपुर लोकसभा सीट 1951 में अस्तित्व में आई थी। यहां अनुसूया बाई सबसे पहले 1952 में सांसद बनी। वो 1956 में चुनकर आई थी। इसके बाद 1962 में माधव श्रीहरि अणे यहां से निर्दलीय चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। इसके बाद 1967 में नरेंद्र देवघरे कांग्रेस को वापस सीट दिलाने में सफल रहे।
लेकिन नागपुर में विदर्भ को महाराष्ट्र से अलग करने को लेकर उठी आवाज ने कांग्रेस को यहां सत्ता से बाहर कर दिया। 1971 में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी के जामबुवंत धोटे चुनाव जीते। मालूम हो कि जामबुवंत धोटे अपने समर्थकों के बीच विदर्भ के शेर कहलाते थे। लेकिन 1977 के लोकसभा में उनकी हार हो गई। उन्हें कांग्रेस के गेव मनचरसा अवरी ने चुनाव हराया।
इसके बाद जामबुवंत धोटे कांग्रेस (I) से जुड़ गए। इसका फायदा उन्हें 1980 के चुनाव में भी मिला। वो जीते और लोकसभा पहुंचे।
मालूम हो कि वर्तमान में तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने कांग्रेस को 1984 और 1989 के लोकसभा चुनाव में जीत दिलाई। वो यहां से लगातार दो बार चुनाव जीते। इसके बाद जब बीजेपी ने राम मंदिर बनाने का मुद्दा छेड़ा तो बनवारी लाल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आ गए। उनकी जगह कांग्रेस ने दत्ता मेघे को टिकट दिया। दत्ता मेघे के हाथों बनवारी लाल पुरोहित की हार हुई। हालांकि, 1996 में बनवारी लाल पुरोहित ने दोबारा लोकसभा में बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ा और वो जीतने में कामयाब रहे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विलास मुत्तेमवार ऐसे इकलौते नेता रहे जिन्होंने 1998, 1999, 2004 और 2009 में कांग्रेस को लगातार जीत दिलवाई।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, उनके द्वारा किये गए विकास पर वोट मांग रहे हैं जबकि कांग्रेस नोटबन्दी, किसानों की आत्महत्या और जीएसटी को मुद्दा बनाये हुए हैं.
तो पहले चरण में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, उत्तराखंड, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और तेलंगाना की सभी लोकसभा सीटों के लिए मतदान होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों (सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और नोएडा) और बिहार की चार सीटों (औरंगाबाद, गया, नवादा और जमुई), असम की पांच और महाराष्ट्र की सात, ओडिशा की चार और पश्चिम बंगाल की दो सीटों के लिए मतदान होगा।

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