भस्त्रिका का जन्म कहाँ
ये जन्मी घर लौहार।
फूंक भरे मंद तेज संग
वायु अग्नि प्रचण्ड फुहार।।
बीस चालीस बीस बार
मंद तेज और मंद क्रम।
इसे सुदर्शन क्रिया कहे
प्राणायाम नाम ये भ्रम।।
खींचो छोडो स्वास् को
भर छोड़ पेट के बल।
मांग बिना हो पूर्ति
प्राणायाम नाम ये छल।।
मूलबंध बिन करे क्रिया
और प्राण ज्ञान बिन योग।
मनन बिन ध्यान करे
घिरे व्याधि संग वियोग।।
घोडा धावक नित्य करे
दौड़ दौड़ ये योग।
सिद्ध कभी न ये हुए
भस्त्रा विफल यहाँ इस योग।।
!!सिद्ध प्राणायाम!!
बैठो सीधे आँखे बंद
नासाग्र ध्यान लगाय।
श्वास खींचो शनै शनै
मूलाधार दो पहुंचाए।।
धीरे छोडो श्वास को
लगाओ मूलबन्ध।
संग संग गुरु मंत्र जपो
नासाग्र भरे दिव्य गंध।।
मेरु पथ में स्वास् खींच
और मेरु पथ से छोड़।
आज्ञा से मूलाधार तक
चले सांस सांस अछोड़।।
अब रुक जाओ सहज बैठ
और ध्याओ अपनी सांस।
मंत्र जपो श्वास श्वास
तब खोओगे इस रास।।
इस क्रम मिले सुषम्ना
मेरु पथ के बीच।
श्वास प्रश्वास स्वं गति रुके
मन शून्य कुम्भक हो खींच।।
योग भावार्थ:-
जो साधक ये जाने बगैर की प्राणायाम का सच्चा अर्थ क्या है? और ऐसे ही प्राणायाम करता है, वो शीघ्र अनेक रोगो से घिर जाता है। क्योकि प्राणायाम का अर्थ है प्राणों(दो प्राण है-अपान वायु+प्राणवायु)अंदर आती सांस व् बाहर जाती सांस का आयाम माने स्तर, यानि हमारे अंदर आने वाला प्राण कहाँ से आ रहा है? और अंदर जाने वाला प्राण कहाँ तक जा रहा है? और अंदर से बाहर तक कहाँ तक जा रहा है? इस ज्ञान को मिलाकर जो विद्या बनती है वह प्राणायाम कहलाती है। लेकिन प्राणों के पीछे कौन है? कौन है? जो ये प्राणों को चला रहा है? वो है मन, यो मन से प्राण है, यो मन के साथ प्राणों को एकाग्र करके ही प्राणायाम किया जाता है। मन के एकाग्र होने पर साँस कम हो जाता है और मन के गतिमान रहने पर साँस तेज व् अनियमित बना रहता है। यो मन के साथ हमारा शरीर अपनी मांग के अनुरूप स्वयं सांस लेता छोड़ता है और उसमे जबरदस्ती करके साँस भरने से भारी गड़बड़ हो जाती है। प्राणायाम में एक विधि भस्त्रिका कहलाती है, जैसे लौहार की लोहे को तपाने के लिए एक चमड़े से बनी धौकनी होती है। वो उससे वायु को उसमे भरकर अपनी सविधानुसार तेजी या धीरे से छोड़कर आग को तेज या मंदी करके लोहे को तपाता है।ठीक ऐसे ही मनुष्य अपने शरीर रूपी इस चमड़े की धौकनी में प्राण वायु को भरकर अपने अंदर के अनगिनत जन्मों के कर्म रूपी लोहे को पिघलाता है, और उन कर्मो को शुद्ध करके अपने अनुरूप ऊर्जा बनाता है। बुरे कर्मो को शुद्ध करके जो ऊर्जा या शक्ति पायी जाती है, उसी का नाम कुंडलिनी शक्ति है। इस प्रकार प्राणों को खीचने छोड़ने के संघर्ष से ऊर्जा और प्रकाश उत्पन्न होता है। यही ध्यान करने पर हमारी आँखो के सामने ज्योति के रूप में दिखाई देता है। और इस ऊर्जा को अपने मूलाधार से चढ़ाते हुए सहत्रार चक्र तक लाया जाता है। लेकिन यह देखने कहने में बड़ी आसान लगती है,ध्यान रहे की- अगर इतनी आसान होती तो घोड़े और दौड़ने वाले मनुष्यो की तो भस्त्रिका रोज होती है। ये दोनों कभी सिद्ध नही होते है। हां आक्सीजन की मात्रा शरीर में बढ़ने से शरीर अच्छा रहता है, इतना ही होता है। इससे ज्यादा लाभ भी न घोड़े, न दौड़ने वालो की आयु आदि को अधिक नही होता है। अब सच्चा प्राणायाम ये है की-सहज आसन में बैठ कर अपनी आँखे बन्द कर ले और अपना ध्यान अपनी दोनों नाकों पर लगाये। वहाँ से धीरे से सांस खीचते हुए साथ ही अपने गुरु मंत्र को भी जपते हुए ऐसा अनुभव करे की- मैं अपनी नाक से साँस को भरते हुए यानि सबसे पहले अपने प्राणों के स्पंदन को अनुभव की भावना करें की-मेरी प्राणवायु अपने आज्ञाचक्र में से भरते हुए धीरे धीरे अपनी रीढ़ की हड्डी के सहारे अपने मूलाधार तक सांस को पहुँचा रहा हूँ। अब जब साँस मूलाधार में जा लगे,तब मूलाधार में मूलबंध लगाये(मूलबंध-जैसे जब हमे पेशाब आ रहा होता है और पेशाब करते में अचानक हमे उठना पड़ जाये तो हम अपनी वहां की मासपेशियों की सिकोड़ लेते है।तब इसी मासपेशियों के सिकोड़ने की अवस्था को इस प्राणायाम करते लगाने को मूलबंध कहते है) और अब साँस को धीरे धीरे रीढ़ की हड्डी के सहारे ही ऊपर आज्ञाचक्र तक ले जाते हुए नाक से बाहर निकाल दे और मूलबंध को ढीला करे। मूलबंध साँस को छोड़ने में ही लगाना है। खीचने में नही लगाना है। अब 25 बार ऐसे ही ले व् छोड़े और अब थोड़ा रुक कर अपनी आती जाती साँस के साथ अपना गुरु मंत्र जपते रहे अब जब आपको लगे की मन नही लग रहा,तब फिर यही क्रिया करे। ऐसे चार बार ने 75 या 100बार करके उठ जाये और फिर शाम को करे तब कुछ समय में आपको आनन्द और दिव्य गन्ध का अनुभव होगा।लेकिन जिनको गुरु मंत्र के साथ गुरु की बताई ध्यान विधि मिली है वो वही करे ये तो प्रणायामवादियो को ज्ञान दिया गया है।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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