अहोई का अर्थ है – अनहोनी का होना और उस अचानक अनचाही घटनाओं से मनुष्य का सारा जीवन भरा पड़ा रहता है। वो नही चाहते हुए भी अनेक कर्म उसे अपनी इच्छा के विपरीत करने पड़ते या होते है। इन्ही को अनहोनी कहते है क्योकि हमारे पूर्व जन्मों के अनेक अनचाहे कर्म इकट्ठे होकर ये वर्तमान या भविष्य के कर्म परिणाम बनते है। जिनका हमारे भविष्य और विशेषकर हमारी पीढ़ी यानि सन्तानों पर पड़ता है। यो उन सन्तानों को अपने किये दुष्कर्मों यानि इन्ही अनहोनी घटनाओं के कारण होने वाले बुरे परिणामों से बचने का उपाय करने का नाम अहोई अष्टमी का व्रत है। ये पहले केवल सन्तान की रक्षा को माताएं करती थी बाद में ये व्रत केवल लड़कों यानि पुत्रों की ही रक्षा के लिए किया जाने लगा और यहाँ कन्याओं को इस व्रत से हटा दिया जो माता रूपी स्त्री शक्ति के लिए बड़ा अशोभनीय है। माता तो माता होती है उसकी सन्तान क्या पुत्र और क्या पुत्री दोनों समान होती है और होनी चाहिए। यो सभी माताओं से अनुरोध है की वे पुनः अपने मातृत्व की समानता की और लौटे। क्योकि पुत्री ही तो आगामी भविष्य है यो आओ सत्य व्रत कथा पढ़े-
जब ईश्वर सत्य नारायण जगदीश और ॐ ईश्वरी जगत्जननी ने ये सृष्टि उतपन्न की तब उसने अपनी सन्तान में पुत्र यानि पुरुष और पुत्री यानि स्त्री को उतपन्न किया और उनकी सुरक्षा के लिए तीसरी नवरात्रि यानि धर्म नवरात्रि के उपरांत के बाद पड़ने वाली पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चुना क्योकि तीसरी नवरात्रि के बाद चौथी नवरात्रि जो पौष में पड़ती है। जो मनुष्य के मोक्ष धर्म की प्राप्ति के लिए है। उस मोक्ष धर्म जहाँ मनुष्य इस जन्म के बाद नया जन्म यानि भविष्य का जन्म ग्रहण करता है तो उससे पूर्व वो अपने किये सारे जाने और विशेष कर अनजाने कर्मो से मुक्ति के लिए साधना करता है। क्योकि वही आगामी नए जन्म में किसी की सन्तान बन कर पैदा होगा यो उस भविष्य जन्म में अपने इस जन्म के अनजाने कर्मों का दंड पाये और उसका भविष्य जन्म खराब हो उसके लिए वो कृष्ण पक्ष की अष्टमी जो मनुष्य के अंधकार भरे अज्ञानी अष्ट विकारों का प्रतीक है उसे अष्ट विकार से अष्ट सुकारों में बदलता है। यो उसी अष्ट विकार जो उससे अनजाने में हुए है। उन्ही के शोधन का नाम ये अहोई अष्टमी कहलाती है यो व्रत करने वाला पुरुष हो या स्त्री विशेष कर सन्तान वाली माता और जिनके सन्तान नही है वे भी इसे सहजता से कर सकती है ताकि उनके सन्तान प्राप्ति और होने वाली सन्तान की सुरक्षा हो सके की-
व्रत के दिन प्रातः उठ कर स्नान करें और अपने सामने स्त्री शक्ति चुतुर्थ युग महावतार महादेवी सत्यई पुर्णिमाँ के चित्र के सामने अखण्ड घी की ज्योत जलाये और अपने सीधे हाथ में जल ले कर पूजा का संकल्प करें की आज की मेरी पूजापाठ मेरी सन्तान उनके नाम बोले की मेरी ये सन्तान के अनचाहे अचानक किये सभी कर्मों को क्षमा करें और इन्हें दीर्घायु करते हुए सभी सुखों से पूर्ण करें। यो कहते हुए अहोई माता देवी पूर्णिमा के सामने छोड़े और देवी के सामने चावल भरी कोटरी और मौसम के फल जैसे सिंगाड़े रखे और आपके साथ जो परिवार के स्त्रियां या परिजन हो तो उन्हें उनके हाथ में थोड़े से चावल के दाने दे, जो वे अपने रुमाल या दुपट्टे में बांध लेते है और कोई कथा या पूजाकरने वाला नही हो तो कोई बात नही है। और तब अपने गुरु मंत्र या इष्ट मंत्र का जप करते है और जो समाज में प्रचलित कथाएँ है, उन्हें पढ़ सकते है, जिनका मूल अर्थ ये है की जो बुरा कर्म करता है। वो अपने बुरे कर्मो को काँटों के रूप में अपने शरीर पर धारण करता हुआ कांटेधारी सही नामक जानवर बनता है और उसके बच्चे की हत्या उसी भांति अचानक होती है। जैसे उसने किसी के अहित करने या अपने सन्तान पैदा करने के लिए किसी और के बच्चे की हत्या की होती है या दूसरे के बच्चे को बुरी नजर या कोसा होता है तब कथा पढ़ने वालों को ये सीख है। किसी के सन्तान नही होने या पुत्री ही होने आदि के प्रकार्तिक दोष पर उस स्त्री को बुरा कहने का ये परिणाम होता है। यो यहाँ अहिंसा का उपदेश दिया है और ऐसे कर्मो का प्रायश्चित ये व्रत है। परन्तु सच्च में केवल अपनी सन्तान को ध्यान में करते हुए अपने बड़े बच्चे के लिए एक या अधिक मन्त्र माला जपे और उसके बाद अगले बच्चे के लिए मन्त्र जपे ऐसे हो अपने सारे बच्चों का ध्यान करते अपना गुरु या इष्ट मंत्र का जप करते जाये व् पूजा का समापन देवी की या ईश्वर की आरती से करें और जो भोजन या पकवान बनाया है। उसमे से आठ पूड़ी पुए या रोटियों को देवी को अर्पित करें और लौटे का जल चावल के साथ शाम को तारों को देखते हुए ईश्वर और ईश्वरी को आर्ध दे इस सारे समान को मन्दिर के पण्डित जी को दे आये और
सामान्य पूजा विधि ये है की-
पूर्णिमा देवी के सामने ज्योत जलाकर अपने गुरु मन्त्र से अपने हाथ में जल ले कर अपनी सन्तानों के नाम लेते हुए संकल्प ले की मेरी सन्तानों की सभी प्रकार से रक्षा करते हुए मेरे और उनके सभी अनजाने में किये बुरे कर्मो को क्षमा करें और दीघायु व् सुख दे और आपके जितनी सन्तान है उतने कटोरियां ले ये कटोरी हमारे बच्चों की प्रतीक है। उसमे हरेक कटोरी में चार बादाम और एक छुआरा रखे यो ये पाँच शक्तिवर्धक फल मनुष्य के पंचतत्वों का प्रतीक है और एक लौटे में पाँच बदाम दो छुआरे और एक रुमाल रखे यहाँ लोटा मनुष्य के शरीर का प्रतीक है और पाँच बादाम संसारी पंचतत्व पांच चक्र के प्रतीक है व् दो छुआरे डालने भी पंचतत्वों से परे दो अपरा तत्व यानि दो चक्रों आज्ञा व् सहत्रार चक्र के प्रतीक है यो ये मनुष्य के सात चक्रों के प्रतीक व् सात लोक व् सात जन्मों के व् सूर्य यानि आत्मा के सात शक्तियों के प्रतीक रूप है। यो इन सबको सुहागन स्त्री अपनी नन्द को भेट करें या नन्द नहीं हो तो किसी ब्राह्मण को या मन्दिर में जोडीदार ईश्वर की मूर्ति पर रख आये और पूजा के उपरांत अपनी सासु माँ के पैर छु आशीर्वाद ले सासु माँ नही हो तो परिवार के बड़ों जनो के पैर छु आशीर्वाद ले इसके बाद अपना व्रत अन्न जल ग्रहण कर पूरा करे।।
-इस 31अक्टूबर को अहोई अष्टमी को बुधवार पड़ रहा है यो इस दिन जो बुधदेव या गणेश लक्ष्मी की पूजा करते है या पूर्णिमां माता की पूजा करते या करती है उन्हें नवग्रह मन्दिर या पूर्णिमां माता के मन्दिर में कम से कम आठ पेठे की मिठाई चढ़ा कर आये अन्यथा एक डिब्बा पेठे की मिठाई का मन्दिर में प्रसाद रूप बाटें कल्याण होगा।।
– पूजा का समय शाम लगभग सांय 17:45 से 19:02 तक
अष्टमी तिथि शुरू होगी 31 अक्टूबर बुधवार दोपहर 11:09 बजे ( 31 अक्तूबर 2018)
अष्टमी तिथि समाप्त – 09:10 बजे ( 01 नवंबर 2018)
होगी।
अहोई अष्टमी के दिन चंद्रोदय रात 00:06 (01 नवंबर 2018) बजे।।
जिनके यहाँ किसी कारण से अहोई अष्टमी नही मनती है वे अपने पूजाघर में प्रातः से रात्रि तक अखण्ड घी की ज्योत जलाये और अपने गुरु मंत्र व् ध्यान विधि का जप ध्यान अपनी संतान को स्मरण करते हुए करें और जो बने वो दान व् प्रसाद मंदिर या गुरु आश्रम में भिजवाये या इतने नही आ पाते है, अपना दान उठाकर रख दे और जब आये वहाँ दान करे।ये सभी के लिए सबसे सरल व्रत विधि है।।
!!अहोई पुर्णिमा की आरती!
ॐ जय अहोई माता,माता जय पूर्णिमाँ माता !
निशदिन तुमको ध्यावे,ब्रह्म विष्णु विधाता!
ॐ जय अहोई माता..
हंसी लक्ष्मी काली,तू पूर्णिमाँ माता।
कातिक अष्टमी पूजा,तेरा जगराता।
ॐ जय अहोई माता…
सन्तति सुख सब तेरे,अहोई तू माता।
जो कोई शरण में आये,मनवांछित पाता।
ॐ जय अहोई माता…
तीन लोक में तू ही बसती,सब शुभ की दाता।
जिस घर तेरा वासा,संकट नही आता।।
ॐ जय अहोई माता..
पुए पूरी खीर भोग जो, अर्पण तुझे करता।
आरती करें जो तेरी,वरदान सभी पाता।।
ॐ जय अहोई माता…
बोलो-जय अहोई पूर्णिमाँ माता की जय।।
!!स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब रचित- महादेवी अहोई पूर्णिमाँ आरती सम्पूर्ण!!
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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