पूर्णिमाँ देवी के आस्तित्व की प्रमाणिक कथा:-
जिस प्रकार किसी भी मनुष्य के जाति गोत्र आदि की किसी एक पैत्रिक पूर्वज मनुष्य परिवार के आस्तित्व से सीधा सम्बंध होता है। की किसी एक ऐसे स्त्री पुरुष के जोड़े ने अपने आगामी वंश को सभी प्रकार के वैभव एश्वर्य से परिपूर्ण करते हुए बढ़ाया था। और उस एक से अनेक पीढ़ियों के निरन्तर विकास के चलते हुए आज एक सम्रद्ध जाति गोत्र का विस्तृत क्षेत्रीय से देशीय तक एक विशाल वंश का समूल विस्तार है। और हमारे स्त्री और पुरुष के रूप में उसी पुरखे स्त्री और पुरुष यानि उस लक्कड़ दादा दादी के रूप में हम वर्तमान जीवंत स्वरूप है। हमारे नाम रूप चाहे कुछ ही भिन्न हो, परंतु हम है उसी मूल के स्त्री और पुरुष रूप। जबकि हमने उन पूर्वज को नही देखा है, पर तब भी वे थे। तभी तो हम आज है। यो उनके आस्तित्व में ही हमारा वर्तमान आस्तित्व है। और हमारे आस्तित्व में उन्ही का वर्तमान आस्तित्व भी है। यो दोनों ही एक दूसरे के पूरक और प्रत्यक्ष है। हाँ हम उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को कैसे किसी अन्य रूप में दर्शा सकते है।ये बात अलग है की- उनकी किसी स्त्री या पुरुष की मूर्ति बनाकर ही दर्शा सकते है। यो हम उनके चहरे को एक ही बनाएंगे और पैर को दो ही रखेंगे तथा कर्मो और सामर्थ्य के प्रतीक हाथों को अनेक रूप में बनायेंगे। यो व्यक्ति एक है, परंतु उसका व्यक्तित्व हाथों के रूप में अनेक है। चूँकि मनुष्य में सौलह कलाओं का पूर्ण प्रकाश होता है। यो उस व्यक्तित्व में सोलह कला रूपी हाथ और उन हाथों में भौतिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य को दर्शाती सभी संसारी प्रतिकात्मक वस्तुएं प्रदान की जाती है,जो की एक सम्पूर्ण सामर्थ्यशाली मनुष्य रूप स्त्री व् पुरुष में होती है। यही सोलह कर्म कला के रूप में हाथों से दर्शाया ज्ञान ही हमे अपनी सर्वोच्चता को नित्य उस सामर्थ्यशाली अपने पूर्वज को देख कर प्रेरित करता है। यही उसका नित्य के दर्शन करने की ही हमारी उस भूतकाल और हमारे वर्तमानकाल तथा भविष्यकाल की उपासना व् साधना करते हुए हमारी ज्ञान सिद्धि है। यो जो इसे जान जाता है, की- मैं वही आदि अनादि स्त्री शक्ति या पुरुष शक्ति हूँ। तो वह उसी अपनी सामर्थ्य को अपने में प्रकट करता है। तो उसे उसकी यानि उस पूर्वज रूपी व्यक्तित्त्व की-जिसे हम देवी या देवता कहते है,उसकी उपासना की कोई आवश्यक्ता नही है ओर न ही रह जाती है । परंतु वो स्वरूप था। यो उसका सम्मान ही हमारी नित्य उपासना है। यही ज्ञान को जाने और अपनाने को ही पूर्णिमा कहते है। जैसे- आकाशमण्डल में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से सम्पूर्ण प्रकाशित होता है।यानि वही अज्ञान रात्रि में ज्ञान का दिन प्रकाशित है,यही पूर्णिमां कहलाती है।और यही सत्यास्मि दर्शन है।
ओर वहीं अनादि पुरुष और स्त्री में से एक प्रथम मनुष्य ही सत्य नारायण प्रथम पुरुष है और उनकी स्त्री सत्यई पूर्णिमाँ है, जो सम्पूर्ण स्त्री है और समस्त स्त्री शक्ति की अनादि जनक है। उन्हीं की वर्तमान जीवंत मूर्ति ही वर्तमान की सभी स्त्रियां है। यही वंशावली का नित्य नियम है। और प्रचलित सनातन धर्म के प्रथम पुरुष और भगवान श्री सत्य नारायण की कथा में वे पत्नी रहित दिखाए जाते है। कहीं कहीं विष्णु पंथियों ने लक्ष्मी को उनके साथ दिखाया है। जबकि ऐसा दिखाया जाना सत्य नही है। बल्कि ये सब मूल सत्य पुरुष और मूल सत्यई पूर्णिमा की ये त्रिगुण संतान-ब्रह्म-विष्णु-शिव या ब्राह्मणी-वेष्णवी-शक्ति है। ये ही मूल ब्रह्म है। ये ही महाविष्णु है। ये ही महा सदा शिव है। और इन्हीं सत्यई पूर्णिमा की ही स्त्री शक्ति ने भिन्न भिन्न समय स्त्री रूप धारण कर इन त्रिदेवों व् देवो और मनुष्यों की पत्नियां बनी है। और सत्यनारायण कथा जो पूर्णिमा के दिन होती है।उस कथा में वह अप्रत्यक्ष पूर्णिमा ही ये महास्त्री शक्ति महावतार सत्यई पूर्णिमाँ है। जिन्हें पुरुष काल में केवल सत्यनारायण की सोलह कलाओं की पूर्णिमा का प्रकाश बना सिद्ध किया है। यही पुरुषवादी वर्चस्व है। जिसका सही स्वरूप सत्यनारायण व् सत्यई पूर्णिमाँ के रूप में प्रकट कर सत्यास्मि दर्शन ने पुनर्जागरण किया है।
-और जल और सिंदूर का मिश्रित जल चढ़ाने के पीछे का प्रतीक कारण ये है की- जल पुरुष की वीर्य बीज का संसारी प्रतीक है। और सिंदूर स्त्री के रज बीज का संसारी प्रतीक है। और दोनों का मिश्रण से ही इस प्रेम संसार की उत्पत्ति होकर ये वर्तमान और भविष्य है। यो इन जल सिंदूर का समिश्रण को पूर्णिमाँ पर पूर्णिमासी को और नित्य चढ़ाने का यही धार्मिक महत्त्व है ।
जिन्हें ये पढ़ ये विचार आता है- की इस जल सिंदूर को हम क्यों माथे पर लगाये? तो वे ये जाने की जो मूलाधार चक्र है, वही से ये बीज बिंदु शक्ति बन कर आज्ञा चक्र यानि माथे के बीच अपना ज्योतिर्मय रूप बिंदु को प्रकट करता है। जैसे सबसे पहले जो बीज था, या दो के मिलन से बनता है, उसमें तीन स्थिति सदा बनी रहती है- एक पुरुष का बीज और एक स्त्री का बीज और एक इन दोनों का संयुक्त बीज। ये ही विज्ञानं का सूत्र है- इलेक्ट्रॉन न्यूट्रॉन- प्रोटॉन के रूप है। और इसमें जो दोनों का बीज है, उसी को किरणों द्धारा विस्फोटित किया जाता है। उसी से ऊर्जा उतपन्न होती है। यही मनुष्य में स्वभाविक रूप से मुलाधरों के मिलन यानि भोग द्धारा दोनों के बीज एक होकर तीसरे बीज को बनाकर उसमे प्रकर्ति अपनी शक्ति से विस्फोट करती है। तो सन्तान होती है। और यही गुरु और शिष्य के बीच एक दूसरे में एक आध्यात्मिक शक्तिपात का भोग होता है। जो परस्पर शक्तिपात के द्धारा इस प्रत्यक्ष शरीर से होता हुआ पहले प्राण शरीर में फिर मन शरीर मे पहुँचता है। और तब वो शिष्य में यानि वो चाहे स्त्री हो या पुरुष हो, आधात्मिक संसार में ये दोनों स्त्री ही है, तभी केवल गुरु को ही ईश्वर रूपी एक पुरुष का प्रत्यक्ष रूप कहा है। यो शिष्य में एक आध्यात्मिक ह्रदय चक्र का निर्माण होता है। जिसे शिष्य रूपी स्त्री का गर्भ कहते है। वही गुरु और शिष्य का आत्म बीज एक होकर एक तीसरा बीज बनता है।ये तीसरा बीज ही कुण्डलिनी बीज है और इसी तीसरे बीज के ऊपर नियमित गुरु मंत्र और उनके द्धारा किये गए परस्पर शक्तिपात की साधना का ध्यान और उससे प्राप्त की गयी निरन्तर शक्ति से उसमें साधनगत ध्यान अवस्था में पहुँच कर विस्फोट किया या हो जाता है। तब वहाँ शिष्य का एक नवीन दिव्य शरीर का निर्माण होता है। यही दिव्य शरीर ही वास्तविक सूक्ष्म शरीर यानि आध्यात्मिक शरीर कहलाता है। इसी आधात्मिक शरीर में ही वास्तविक कुण्डलिनी यानि आध्यात्मिक शक्ति का जागरण होता है। और उसी आध्यात्मिक शरीर में ही इष्ट गुरु प्रकर्ति दिव्य प्रकाशों का नित्य दर्शन होता है।इससे पहले के माता पिता से मिले शरीर में कोई कुण्डलिनी नहीं जाग्रत होती है। यो जब शिष्य को ये आध्यामिक शरीर की प्राप्ति होती है, और जबतक वो साधना कर पूर्ण नही होता है। तबतक किसी अन्य से शारारिक सम्बन्ध नही बनाने चाहिए। यही यथार्थ ब्रह्मचर्य कहलाता है।इतने जितने भी प्रकार के बाकि ब्रह्मचर्य है,वे व्यर्थ है। जैसे एक स्त्री जब सन्तान पैदा करती है और उसके पेट में सन्तान का विकास हो रहा होता है। तब उसे भी व्यर्थ के भोगों से बचने का नियम है। और वो अन्य पुरुष से सम्बन्ध नही बना सकती है। ताकि एक की ही सन्तान प्राप्त हो अन्यथा सब गड़बड़ हो जायेगा। ठीक यही नियम यहॉ आध्यात्मिक जगत में बड़ी कठोरता से लागू है। की एक मंत्र- एक गुरु- एक इष्ट होना चाहिए। यो वही बीज का प्रकाश आज्ञा चक्र पर प्रकट होने से ही दिव्य दर्शन होते है। यो इस जल सिंदूर के सन्युक्त बीज रूप को अपनी अनामिका ऊँगली(सूर्य ऊँगली यानि आत्मा,वेसे अंगूठे को आत्मा माना है,पर अनामिका ऊँगली को इसका धर्म पक्ष प्रतिनिधित्त्व प्राप्त है) से देवी व् बच्चों व् स्वयं के माथे पर लगाने का प्रतीक नियम है, की जो शक्ति नीचे है वही आपके माथे के बीच चक्र में प्रकाशित है।
और ये बताये पूर्णिमा के रहस्य को जानकर जो स्त्री अपने अन्य संसारी रूप स्त्रियों के सम्पूर्ण विकास को प्रयत्न करती है। जैसे सत्यास्मि मिशन द्धारा चलाये जा रहे स्वतंत्र स्त्री गंगा स्नान और श्रीभगपीठों की स्थापना और पुरुषों का अपनी स्त्रियों की सभी उन्नतियों को लेकर प्रेम पूर्णिमा व्रत करना आदि उसमें सहयोग देता व् देती है। वह स्वयं पूर्णिमाँ है। यही पूर्णत्त्व का सत्यास्मि मिशन का मूल विषय है। इसी उद्धेश्य का ये बाहरी प्रतीक पुर्णीमा स्थापन है। इसे सदैव स्मरण रखे और शीघ्र ही इस विचार को अपने में स्थापित करें और सभी बहिर उपासनाओं से मुक्त हो जाये। यही सत्यास्मि दर्शन है इतने आप इस ज्ञान को समझने में सामर्थ्य नही है, इतने इन मूर्ति पूजा आदि नियमो को माने।धीरे धीरे समझ से आप पार हो जायेंगे।
और जो मनुष्य इस अर्थ को जानता है, उसे इस अर्थ को स्वयं में धारण करना चाहिए। वो इन सभी नियमों से मुक्त है। परंतु उसकी ये ज्ञान मुक्ति उसके व्यक्तित्व में दर्शित भी होनी चाहिए ताकि अन्य जन उससे प्रेरित हो सके। जबतक ऐसा नही है, तबतक उसे भी इन नियम का पालन करना चाहिए। क्योकि नियम से ही नियमातीत होने का अर्थ है।तब आप अपने में और पूर्णिमाँ के स्वरूप में भिन्नता अनुभव नही करेंगे।
इस बीच ऐसे साधक अभी नही है। जो इतने समर्पित हो, यो ये जानते हुए की स्वयं हम ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ मूर्ति रूप है। इस बात की सत्यता पर कितने लोग है? जो आजतक संसार में पूर्ण विश्वास करते आये है और किया है? अर्थात गिने चुने ही हुए है। ओर तो विपदा आते ही सब अद्धैतवादि दर्शन को छोड़ भाग बेठे। यही राम और कृष्ण ने अपने जीवन में प्रत्यक्ष को ही महत्त्व दिया। और यही महावीर स्वामी व् बुद्ध ने कहा और दिखाया। यही कबीर नानक आदि सन्तों ने कहा और किया और अंत में क्या हुआ ? राम और कृष्ण,महावीर,बुद्ध,कबीर,नानक आदि की मूर्ति गठित हुयी और उनके कथनों के विपरीत सब वहीं का वहीं खड़ा हो गया। जिसका वे विरोध कर गए। कारण यही है की निचले स्तर से मध्यम स्तर यानि तम् और रज गुणी लोगो का इस संसार में अधिकता है। वे केवल दूसरे पर ही निर्भर रहने का नाम प्रेम पूजा आदि धर्म जानते है।वे देना नहीं जानते,बस लेना ही जानते है,या केवल लेन देन का बदला नाम ही उनका प्रेम सम्बन्धी संसार और संसार का व्यवहार है। यो सदा ये मूर्ति के रूप में प्रतीक बने और बनेगे। यो वर्तमान की शिक्षा प्रणाली की तरहां प्रथम से अंतिम तक कक्षा चलाओं और अंत में व्यक्ति स्वयं में ही विद्या ओर मुक्ति है, जान मुक्त होगा। और मानो आज इस सत्यास्मि मिशन का मूल कौन है- एक पुरुष। और उसके द्धारा ही दीक्षा ज्ञान चल रहा है। कितने साधक है जो इस स्तर पर पहुँच गए की वे स्वयं किसी अन्य को दीक्षित कर सके? कितनी स्त्रियां साधक से सिद्ध हुयी है? जो अन्यों को साधक ही बना सके? जबकि यहाँ पुरुष गुरु ने स्वयं को केवल स्त्री शक्ति की सभी उन्नति में अपना सहयोग देने का अर्थ ही आप गुरु पद कहा है। जैसा की आजतक ये उत्तर किसी अन्य पन्थ नही कहा है। तब भी क्या हुआ है, कौन सहयोगी है ?और मानो अचानक पुरुष गुरु चला गया तब क्या है? किसी में इतनी सामर्थ्य है की वो पूर्वत सम्प्रदायों की तरहां अपने इस उद्धेश्य को पूर्ण कर सके? तब वही हाल होगा जो अनादिकाल से अब तक होता आया है, की विषय क्या था और क्या हो गया? और ऐसे ही एक वर्तमान में चल रहे स्त्री मिशन ब्रह्मकुमारी की तरहां वर्तमान स्त्री गुरु के ऊपर उसके शरीर का आसरा लेकर उनके पुरुष गुरु दादा लेखराज ब्रह्म बाबा आते है और उपदेश देते है और चले जाते है। कितनी अज्ञानी अंधविश्वासी भूतप्रेत बुलाने की प्रथा का वहाँ पालन हो रहा है। इससे क्या आत्मज्ञान जन साधारण व् साधकों में जा रहा है, की- ये स्त्रियां अपनी आत्मसाक्षात्कार के बल पर स्वयं ज्ञान नही दे सकती? अपूर्ण है? केवल एक पुरुष की प्रवक्ता मात्र है? और केवल एक पुरुष को ही आत्मज्ञान हुआ है? बाकि ये समस्त स्त्रियां मात्र उस दिव्य पुरुष की सेविका और प्रचारक मात्र है? इनका स्वयं का कोई स्वतन्त्र अस्तित्त्व व् व्यक्तित्त्व नही है? क्या यही हाल अन्य स्त्री शक्ति आंदोलनों का होगा? या स्वामी विवेकानन्द को भगनी निवेदिता और गांधी जी को और अरविंद घोष और योगानन्द को विदेशी महिला शिष्यों का सहारा लेना पड़ा। अपने देश में अभी स्त्री धर्म क्षेत्र में संघर्षशील है समय लगेगा। यो ही सत्यास्मि दर्शन में सभी मनुष्यों के भावो को लेकर दीक्षा पद्धति है।यही यहाँ ये लेख का विषय है।
तो आप सभी ये जान गए होंगे और आपके संशय मिटे है, ऐसा मेरा विश्वास है। और नही हो तो अवश्य इस लेख का अनेक बार चिंतन करें और तब पूछे।।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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जय सत्य ऊँ सिद्धायैं नमः
Jay satya om siddhaye namah