जैसे एक उदाहरण के तौर पर अगर शेर भारत में है तो वो भी अमेरिका के शेर की भांति शिकार करेगा और उसके बाद वो सारी क्रियायें उसके साथ भी होंगी जो भारत के शेर के साथ होती हैं। यह समानताएँ दुनिया के हर जीव या मनुष्य में पाई जाती हैं। ऐसे ही सनातन धर्म है, यह धर्म इस धरती का सबसे प्राचीन धर्म है, इस धर्म से ही सैंकड़ों धर्मों की उत्पत्ति हुई है। सनातन धर्म भारत से चला और विश्व पटल पर फैला, लेकिन असमानताओं और भिन्नताओं के कारण इस धर्म से बाकी धर्मों की उत्पत्ति होती गयी।
आज इसी पर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज प्रकाश डाल रहे हैं। सबसे पहले हम बता देना चाहते हैं कि हमारा या स्वामी जी का कोई उद्द्येश्य नहीं है कि किसी धर्म विशेष को हमारे लेख से पीड़ा पहुंचे।
इस लेख में स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज द्वारा कही गयीं बातें सिर्फ ज्ञानवर्धक हैं जिन्हें पढ़ने से आप बहुत सारी चीजें जान सकते हैं।
तो आइए स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज की इन ज्ञानवर्धक बातों से कुछ सीख लें।
गुरु पूर्णिमां के पावन अवसर पर भक्तों को हिंदुओं की सनातन ध्यान साधना की ही भाँति मुस्लिमों की सुफियानी साधनायें क्या है,इसका संछिप्त पर मेरे अनुभव की हुयी साधनाओं के माध्यम से सहज भाषा में बता रहा हूँ :-
सत्संग मे भक्तो ने मुझसे प्रश्न किया कि- स्वामी जी मुस्लिम साधनाओ मे और हमारी साधनाओ मे क्या अन्तर है?
और आपने क्या ये कि है? आप अपने अनुभव ज्ञान से हमें बतायें।
तो मैंने ने कहा की- हाँ.. आत्मा अपने आत्मज्ञान हेतु अनगिनत शरीर धारण करती है इसी का नाम है पूर्वजन्म, और मैंने ऐसा ही अपने किसी पूर्व जन्मो में और कुछ वर्तमान जन्म मे पूर्व ज्ञान के अनुरुप मुस्लिम साधना व सूफ़ी साधना की है।और मेरा ये नाम महाराज भी सबसे पहले मुस्लिम मित्रो ने ही उनके यहाँ इस सन्दर्भ में, इसी साधना की ज्ञान चर्चा के चलते सर्वप्रथम दिया था, जो मैं पहले भी बता चुका हूँ। अतः दोनो साधनाओ मे कोई विशेष भेद नही है, मात्र भाषा से नाम पुकारने का अन्तर है-जैसे वेदान्त मे वर्णित निराकार ब्रह्म कि साधना को मुस्लिम सूफियों के यहां “हस्तिए मुतलक” कहते है, इसका अर्थ है रुप आकार से रहित एक ब्रह्म है,और उसकी अनुभुति करना,और सूफ़ी का अर्थ है-निर्गुण ब्रह्म॥
सूफ़ीमत के चार सिद्धांत के चार भाग है:-
1-चिश्तिया
2-कादिरया
3-सुहरवर्दिया
4-नकशर्दिया।
और इन चारो मतो के अन्तर्गत जप करने के भी अनेक रुप है, और यहाँ अल्लाह का स्मरण दो प्रकार से है:-
1-साधक अल्लाह के नाम ओर उसके गुण का जाप इस प्रकार से करे, कि उसके शरीर के हर अँग में से उस अल्लाह का नाम और उसका प्रकाश यानि नूर गुँज उठे।
2-साधक ईश्वरिय या अल्लाह तत्व का चिन्तन दार्शनिक रुप से करे। अपने ओर अल्लाह के बीच के सम्बंध पर गहनतम विचार करता खो जाये॥
सूफी साधना मे गुरु को मुर्शिद कहते है ओर शिष्य को मुरिद कहते है और इनके बीच जो ध्यान का सम्बंध होता है,उसे तवजह यानि दीक्षा कहते है,और जब मर्शिद अपने मुरीद को दीक्षा देता है यानि गुरु अपने शिष्य को दीक्षा देता है,तब उसे अपने सामने घुट्ने मोड कर बैठाता है ओर तब गुरु एकाग्रचित हो कर अपने शिष्य के ह्र्दय मे अल्लाह के एक सो एक नामो को अपनी एक सो एक साँसो के साथ शुद्ध भावना-विचार के साथ जोड कर शक्तिपात के साथ भेजता हुआ ध्यान करता है,इस विधि के निरन्तर चलते उसके शिष्य के ह्र्दय मे अल्लाह का प्रकाश छा जाता है ओर ऐसा कराते कराते हुए,गुरु अपने शिष्य को अल्लाह कि उपासना का पूर्ण अधिकारी बना देता है,यही है-सूफियों में मुर्शिद और मुरीद के बीच की तवजह यानि दीक्षा का रहस्य।और इसके बाद शिष्य एकांत में गुरु की बताई हुयी ध्यान विधि से साधना करता हुआ शेष जीवन बिताता है,और अपने पास आये लोगो का भला और योग्य शिष्य को ऐसे ही दीक्षा देता है।
अब सूफ़ी गुरु से शिष्य मुरीद को मिली ध्यान विधियों यानि अन्य साधनाओ के बारे मे बताता हूँ:-
1-जिक्र जेहर:-
यह साधना ‘चिश्तिया” वंश कि है ओर ये हिन्दुओ कि महामुद्रा प्राणायाम जैसी है, जिसमे अर्धपश्चिमोत्सान मे बेठ कर अपना मुख पश्चिम को रख कर कमर सीधी रख दोनो हाथ जांघों पर रख कर “विसमिल्ला” कह कर तीन बार कलमा “ला इलाह इल्लिल्लाह” पढे ओर फ़िर श्वास खीचे कुम्भ्क कर अपना सिर घुट्नो पे रखे ओर मुलबन्ध लगाकर जब तक श्वास रोके, जब तक की वो सहजता से रुके और फ़िर मधुर स्वर मे “ला इल्लाह” कहते हुये श्वास धीरे धीरे छोडे ओर अपनी आँखें खोले और अब सीधा होकर बेठे, फ़िर श्वास खीचते मे “इल्लिल्लाह” कहे ओर आँखें बँद कर ह्रदय मे अल्लाह के प्रकाश का ध्यान करता हुआ, पहले जैसी ही क्रिया करे, ऐसे ही धीरे धीरे अभ्यास करता हुआ, नितमित करता रहे, तो उसकी कुण्डलिनी जाग्रत हो जायेगी ओर अल्लाह या आत्मप्रकाश दिखाई देगा॥
2-जिक्रे पासे अनफ़ास:-
यह एक प्रकार से हिन्दुओ कि साँस लेने छोड्ने के समय ईश्वर का नाम लेने के अभ्यास जैसी साधना है।
अपने धुट्नो पर सीधे बैठ कर अपना ध्यान अपनी नाभि मे केंद्रित रख मुख बँद करके अन्दर जाती साँस में “ला इल्लाह” कहे ओर बाहर जाती साँस के समय “इल्लिल्लाह” कहे,यो इस प्रकार से अन्दर जाती साँस के साथ जप करने को “जिक्र नफ़ी” ओर बाहर जाती साँस के साथ जप को “इसबात” कहते है।
3-हब्जे दम:-
इस साधना को सभी सूफ़ी करते है। विशेष कर चिश्ती ओर कादिर वंश मे ये साधना ज्यादा प्रचलित है। यह हमारे हठयोग के अन्तर्गत अधिक देर तक श्वास रोकने का अभ्यास है। ओर रेचक पुरक के समय अल्लाह का नाम लेते हुये ध्यान लगाये।
4-शगले नसीर:-
यह ख्वाजा मुईनद्दीन चिश्ती कि विशेष साधना है।
ओर हिन्दूओ मे ये राजयोग मे अपनी नाक के अगले भाग यानि नोक जिसे नासाग्र कहते है,उस पर खुली आँखो से त्राट्क करते हुये एकाग्रचित होकर एक बिंदु से बढ़ते हुए अपरिमित ज्योति या प्रकाश का ध्यान अनुभव करने जैसा ध्यान है।
5-शगले यानि महामुद्रा:-
इस साधना मे अपनी दोनो आँखो को ऊपर की ओर एक करके अपनी भ्रकुटि मे लगा कर अल्लाह का जाप के संग ध्यान किया जाता है।
6-सुलतानु अजकार:-
यह हिन्दूओ के अनहद नांद सुनने जैसी साधना है।इसमें अपनी आँख, कान, मुख को अपने हाथो की अँगुलियो से बँद कर अपनी साँस के साथ अपनी प्राण शक्ति को नाभि से खीच कर कुम्भक करते हुये मस्तिष्क तक ले जा कर आज्ञाचक्र मे स्थापित करे।ऐसा अभ्यास करते मे”अल्लाह” जप का उच्चारण करे ओर जब साँस आज्ञाचक्र मे स्थापित करे यानि कुछ देर रोके, तो केवल “हू” कहते रहे, ऐसा थोड़ी देर रुक रुक कर फिर से अभ्यास करे, तो सच्चा नांद सुनाई आने लगेगा।
7-शगले सोते सरमदी:-
इस साधना मे आँख, कान, मुख बँद कर शान्ति से बैठ कर आसमान से गिरती अल्लाह की शक्ति- यानि उनकी कृपा को जलधारा की तरहां अपनी ओर अपने सिर से सारे शरीर में पैरों तक आता या अपने आज्ञाचक्र से एक बिंदु के माध्यम से अपनी रीढ़ की हड्डी के सहारे होता हुआ अपने सारे शरीर मे प्रवेश करता देखे और अनुभव करे तथा साथ ही “इस्मे जात” यानि (अल्लाह का नाम) को जपता चले, तो इस साधक सूफी को अनुमान लगाने की शक्ति, जिसे इंटीयूशन या अन्तर्दष्टि शक्ति कहते है,वो प्राप्त होती है और साथ ही अध्यात्मिक नांद शब्द ब्रह्म यानि अल्लाह प्रकट हो जाता है।
8-मुरातबा:-
यह अन्तर्द्र्ष्टि बढाने की विशेष साधना है, इसमे जाँघो पर सीधे बैठ कर गर्दन झुकाकर आँखे बँद कर अपने ह्रदय मे अल्लाह का नाम लेते हुये एक प्रकाश का ध्यान करे, तो दिव्य द्रष्टि की प्राप्ति होती है।
9-मुरातबा इस्मे जात:-
इसमे वजु यानि स्वच्छ पानी से हाथ-पैर-मुख धोकर पश्चिम दिशा कि ओर सीधे बैठकर विस्मिल्लाह पढकर अपनी गर्दन झुकाकर इसे रकब करना कहते है।और इस्मे जात अर्थात अल्लाह के नाम लेता हुआ,अपने मन को अपनी साँसो पर या अपने गुरु पर एकाग्र करे।इससे गुरु मर्शिद और शिष्य मुरीद एक होकर केवल एक है,ये दर्शन होते है और अद्धैत की सिद्धि होती है।
ऐसी अनेक साधना है, जो सूफ़ि मत मे प्रचलित है, उनमे से जो प्रमुख है, वो मेने यहां कही है पर सब है एक सी ही साधनाये, पर बाद के वर्षो मे मेने ऐसी अनगिनत साधनाये करने के उपरान्त इनमें अनेक कमियो को पाया, जो उच्चतर गुरु के ना मिलने पर होती है, तब मेने एक ऐसी ध्यान प्रणाली का विकास किया,जिसे बिना उच्चतर गुरु के भी सामान्य मनुष्य आश्रम से सीख कर, अपने घर सहजता से ग्रहस्थ जीवन मे भी करता हुआ अपना सम्पूर्ण भोतिक+अध्यात्मिक ज्ञान को पूरा कर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर सकता है।
वो विधि को मेरे यूटीयूब पर आप देख और समझ कर कर सकते है।
जय सत्य ऊँ सिद्धायै नमः
सत्यास्मि सत्संग का एक वचन कहता हूँ:-
“आत्मजाग का एक उपाय,दीक्षा ले करे गुरु सँग्।
स्त्री-पुरुष निज ध्यान करे,ज्ञान पाये आत्म अभंग।।
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“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611
ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब
https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धाय नमः
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Jai satya om sidhay nmah..