श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज इस ग्रहण के बारे में तो बता ही यह हैं साथ ही इससे बचने का सबसे अच्छा और सरल उपाय बता रहे हैं। स्वामी जी के अनुसार जो पूर्णिमाँ देवी की पूजा करेगा उसका इस चंद्रग्रहण से कुछ नहीं बिगड़ेगा। माता पूर्णिमाँ देवी की पूजा नकारात्मकता को खत्म कर देती है।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज बताते हैं कि इस 27 जुलाई को चंद्रग्रहण लगने वाला है। स्वामी जी के अनुसार यह ग्रहण अशुभ योग के साथ आ रहा है। यह 21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा 104 साल बाद 27 जुलाई 2018 को सबसे लंबा चंद्र ग्रहण लगने वाला है।
साथ ही बता दें कि:- 27 जुलाई को गुरुपूर्णिमा भी है। यह विशेष प्रभावशाली होने वाला है। यह साल का दूसरा पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा।
चंद्र ग्रहण और सूतक का समय
चंद्र ग्रहण का समय:- 27 जुलाई रात्रि 11.54.26 PM से 28 जुलाई रात्रि 03.48.59 AM बजे तक।
चंद्रग्रहण की कुल अवधि: 03 घंटे 54 मिनट 33 सेकेंड तक।
सूतक काल प्रारंभ:- 27 जुलाई, दोपहर 12.27.28 PM बजे से
सूतक काल की समाप्ति:- 28 जुलाई रात्रि 03.48.59 AM बजे तक है….
आओ गुरु पूर्णिमां पर्व पर सभी शिष्य ग्रहण काल में गुरु आश्रम में जाकर करें ये सर्वोत्तम उपाय और गुरु मंत्र की सिद्धि भी प्राप्त करें और जीवन को सुखी सफल बनाये:-
*अहम् सत्यास्मि गुरु पूर्णिमाँ उद्धघोष*
ओ उठो जागो सिंहो
सनातन धर्म वीर।
तुम ईश संतति
त्याग बंधन की पीर।।
तोड़ निंद्रा अज्ञान
चलो आत्म के पथ।
मैं हूँ कौन खोजते
अंवेषणा के गत।।
जब तक मिले न लक्ष्य
खेल प्राणों की बाजी।
सिंचित कर कर्म नीर
खिला आत्म पुष्प अविभाजी।।
मिटा भय अंध मेघ
निज आत्म ज्ञान अर्जन।
मैं हूँ अनादि सत्य
घोर कोंध कर गर्जन।
ले दीर्घ स्वास् प्रस्वास्
चला संघर्ष भस्त्रा।
मिट जाये आलस्य
तड़ित तरंगित प्राण अस्त्रा।।
किससे भय कौन है
जो दे मृत्यु मुझको।
मैं हूँ अग्नि स्फुर्लिंग
अमर प्रज्वलित स्व हम को।।
भरे ये साहस
नही कोई तुझ सा इस जग।
उठे अंतर नाँद अपार
अद्भ्य कुंडलिनी शून्य त्यग।।
भर जाये शक्ति भक्ति
स्वंय की अलौकिक मूरत।
प्रफुटित हो वेद घोष
अहम् सत्यास्मि पूरत।।
त्रि गुण हूँ मैं ही अनादि
दूषित विचार सार है व्याधि।
स्वेच्छित ओढ़ पँचतत्वी तन
मन माया मैं ही हूँ समाधि।
पुरुष रूप सत्य हूँ मैं ही
साकार ॐ हूँ शाश्वत नारी।
मैं ही मिल मैं में हो पूरण
सिद्धायै हूँ सर्व जीव सृष्टि सारी।।
स्व प्रेम से प्रकट मैं साकार
रह अशेष में शेष प्रेम मैं निराकार।
यो प्रेमवत भेष नमः हूँ बीज
मिट अमिट हो अहं हीन एकाकार।।
पुनः स्वेच्छित हो मैं जाग्रत
मैं से मैं भिन्न हो प्रेम व्याग्रत।
एकोहम् बहुश्याम कर द्धैत घोष
ईं इच्छा क्रिया ज्ञान स्व मैं रत।।
फट् प्रकट चतुर्थ वेद ब्रह्म स्व बन
अर्थ धर्म काम मोक्ष स्व जन।
हो परिपूर्ण सर्व कह स्व स्वाहा
अनंत अकाल मैं पुनःजीऊ दिव्य प्रेमतन।।
गुरु ज्ञान:-
गुरु पूर्णिमां पर पड़ने वाले चन्द्र ग्रहण और उसके समय को लेकर बहुत से भक्तों में बड़ा भारी भ्रम है की-इस समय कैसे गुरु दर्शन करेंगे और कैसे गुरु पूजन करेंगे? बल्कि चन्द्र ग्रहण के पड़ने के समय दोपहर के 12 बजे से पहले ही गुरु दर्शन और पूजा करके अपने घर लोट आये?
क्या मूर्खता और अज्ञान का विषय है?
संसार के सभी शास्त्र और विशेषकर सनातन धर्म के ज्ञान शास्त्र बड़े भारी प्रबलता से ये घोष करते चले आये है की-
गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरुदेवो महेश्वराय।
गुरु साक्षात् परब्रह्म,तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
अर्थात-गुरु देव ही साक्षात् ब्रह्मा-विष्णु और शिव है,तथा गुरु ही साक्षात् पर ब्रह्म शक्ति है,यो ऐसे साक्षात् गुरुदेव को हम नमन करते है।
अब क्या संशय रहा?
गुरु को कोई क्या ग्रहण लगाया जा सकता है,गुरु की शरण में आने पर तो संसार के सभी ग्रह दोष और संकट स्वयं ही समाप्त हो जाते है।
गुरु के आश्रम की और या इष्ट देव के मन्दिर की और आने और वहां से जाने पर तो सभी दोष समाप्त हो जाते है।
और जब भगवान और गुरु को ही ग्रहण का प्रभाव पड़ने लगेगा,तो भक्तों को संकट या दोषो से बचाएगा कौन?
अर्थात कोई नही….
यो ये मूर्खता पूर्ण और व्यर्थ के कोरे आज्ञा से उपजे भय को त्याग कर गुरु पूर्णिमां पर जब मन और समय मिले गुरु आश्रम आकर उनका अभय और वरदान देने वाला और सभी संकटों को हरने वाला सत्संग सुनते हुए,आश्रम में यज्ञ करते हुए, प्रसाद ग्रहण करते हुए गुरु आशीर्वाद ले कर अपना जीवन सफल बनाये।
और…
श्री सत्य ॐ गुरुदेव प्रार्थना चालीसा पढ़े:-
।।दोहा।।
गुरु चरणों में शीश नवाऊँ,रख कर सिर पर दो आशीष।
उतरु गुरु ज्ञान घाट पर,मेरी नाँव बनो महाईश।।
।।चालीसा।।
गुरु तुम्हारे चरणों में, रखु अंत तक ध्यान।
आदि अंत का ज्ञान में पाउ,विद्या दो भगवान।।
अब तक मैंने तप को जाना,ना जाना क्या शीश।
तुम्हे देख ही शीश झुका है,परम् ज्ञानाधीश।।
गुरु अर्थ को मैं ना जानू,शिष्य अर्थ मैं क्या पहचानू।
करो मेरे मन में उजियारा,आत्म सत्य का बनु मैं भानु।।
चारों और अनगढ़ पत्थर है,उनमें से हूँ मैं भी एक।
तुम ही सच्चे मनहर हो,लिख दो मुझ पर भी महालेख।।
बरस रही है कृपा तुमसे,सावन सी अमृत वर्षा।
जैसे फूल खिला बगियाँ में,वैसे खिला दो आत्म दर्शा।।
जग में सूरज एक ही चमके,वैसे चमकू मैं बन कर।
सबको जीवन देने वाले,यह ज्योत जगा दो ह्रदय अंदर।।
बीत रहा है जीवन यो ही,उठ जायेगा कभी बसेरा।
भर दो मुझको गुरु ज्ञान से,जगा दिखा दो मुझे सवेरा।।
क्षण भंगुर है जो सब दिखें,गुरु तुम्हीं हो परम् नित्य।
सत्य ही सत्यता को जाने,यही ज्ञान पाऊ मैं नित।।
जैसे बदले सब ऋतू मौसम,वेसे बदले मेरा मन।
दो लगाम इसको कुछ ऐसी,बस में हो मेरा तन मन।।
सभी तरहां की करी साधना,पड़ा नहीं कोई अंतर।
मन की मिटे सभी वासना,गुरु तुम्ही ऐसा दो मंतर।।
जो भी मांगू तुम्हें है देना,ये मेरा जन्म सिद्ध अधिकार।
मेरे मात पिता तुम्हीं ही हो,मिलना मेरा उत्तराधिकार।।
मांगना मेरा संशय नहीं है,तुमने मुझ को है पाला।
तुम्हीं रहे हो रक्षक मेरे,ले ज्ञान का पौरुष भाला।।
ईश बीज गुरु वृक्ष बने है,सबको दे बन छाया फल।
मैं वो छोटा पौधा हूँ,जो पनप रहा तेरे आँचल।।
सत्य यही देखा मैने है,छोटे जब भी बड़े हुए।
गए बड़े दे वो छोटों को,बन शिष्य ही आगे गुरु हुए।।
रात चांदनी दिन का सूरज,यही चक्र चलता रहता।
अमावस भी जीवन का चेहरा,मिल गुरु ज्ञान पूर्ण खिलता।।
कर दो मेरा मन उजियारा,रहे ना कोई तन मन संशय।
जीवन के हर रंग को जानू,गुरु ज्ञान से भरो अतिशय।।
सुबह खिलें बगियाँ में कलियाँ,मैं खिंलू तेरे आँगन।
बसो मेरे ह्रदय में आकर,दे दो मुझको उन्मुक्त गगन।।
तुम ही मेरे रसभर मधुबन,मैं भवँरा करूँ रसावदन।
उस अमृत को मुझ को दे दो.पी गुरु ज्ञान करूँ अभिनंदन।।
जप ही मेरी बनी प्रार्थना,यही भाव दे राह मुझको।
गुरु तुम्हीं हो सच्चे साथी,तुम्हें भँजू छोड़ सबको।।
तुमसे मिलना योग बना है,तुम्हें जानना है वैराग्य।
आत्म पिपासा तुमसे मिटती,तुम ही हो जीवन के राग।।
तुम्हें पाना ही कर्म है मेरा,मिल जाना ही मेरा भाग्य।
यही बनी अब मेरी तपस्या,ज्ञान नाथ दो मेरा साथ।।
विश्वास कभी ना मेरा छूटे,यही रही है अभिलाषा।
चाहे मुझसे सब जग रूठे,गुरु पाने की यही आशा।।
तुम्हीं खोल दो मेरी आँखें,मिले ज्ञान चक्षु देखूँ नित शुभ।
तुम्हें देखना मुझ को शुभ है,नहीं देखना बने अशुभ।।
सब रोते है जान समस्या,मैं रोऊ तुमको ना पा।
मुझे नहीं हो कोई दुःख सुख,यही ज्ञान मुझमें बरसा।।
कोई कहे इसे पूज लो,कोई कहे तीर्थ कर आ।
मेरी पूजा तीर्थ तुम हो,बसों ह्रदय मंदिर तुम आ।।
प्यास कुएं बैठ किनारे,रोये फिर भी सब कुछ पा।
तृष्णा उसकी भरे नहीं है, चाहे जग सारा वो पा।।
मेरी प्यास तुम्हीं बुझा दो,दो ह्रदय कमल जल दे।
आत्म हंस बन उसमें तैरु,ज्ञान कमल का पुष्प को ले।।
प्रथम वंदन और अभिनंदन,करूँ आपको ही अब मैं।
नहीं दिखता जग में कोई,ये मेरा अपना नहीं अहं।।
सब पाते है देकर कुछ तो,मैं पाऊ कुछ करें बिना।
गुरु तुम्हीं हो सच्चे दाता,मुझे देते बिन कहे घना।।
सभी जलावें धूप दीप,कहें इसी को अंधी भक्ति।
मैं तो करूँ गुरु कहा ही,इस कहे करे से मिलती शक्ति।।
मन के मेरे बिखरे मोती,भक्ति धागा दो गुरुवर।
कल्प तरु बन करूँ मैं सेवा,करूँ पार सुमेरु पर्वत।।
गुरु महिमा इतनी ऊँची,उतना ऊंचा गगन ना कोई।
सागर तोड़े कभी भी सीमा,गुरु की सीमा अनंत सी होई।।
अर्थ धर्म काम और मोक्ष,मिले गुरु नाम जप से।
ध्यान करना गुरु की सेवा,वासना मिटे तभी मन से।।
अब केवल मैं यही कहूँ हूँ,अपना अर्पित करो गुरु में।
जो अर्पित कर बचे ना कुछ भी,मिले आत्म राह क्षण में।।
देखना मात्र गुरु ना पाना,भजने मात्र गुरु न जाना।
सेवा सबसे बड़ी तपस्या, जिसने करी उसने सब जाना।।
स्वर्ग नरक का ना कोई चक्कर,ना चौरासी योनि पावे।
गुरु परिक्रमा सबसे पूरी,करो तुरंत यहीं सब पावे।।
उम्र ना देखो अपनी कोई,जगे जभी हो तभी सवेरा।
पड़ी द्रष्टि गुरु ज्ञान की,तभी अज्ञान का हटे अँधेरा।।
आँख खुली और देख रहा हूँ,कहना सुनना गुरु कृपा सब।
जो ना है सो भी हो पूरा, मात्र गुरु कहते ही अब।।
नाथों के तुम नाथ हो मेरे,कहा लिखा पढ़ होवे सिद्ध।
धरे ध्यान तुम पर जो भी,उस ह्रदय कमल में रहोगे नित।।
पढ़ करे गुरु वंदन जो इसको,माथ बंधे उसके सेहरा।
अलख निरंजन असत् कर भंजन,सत्य ही सत्य से हो
पूरा।।
।।दोहा।।
जो नित दिन श्रवण मनन करे,मिले अष्ट सिद्धि नवनिधान।
ह्रदय प्रकट हों गुरु,बन “सत्य ॐ सिद्धायै नमः” भगवान।।
।।श्री सत्य ॐ गुरुदेव प्रार्थना चालीसा सम्पूर्ण।।
[श्री सत्य ॐ गुरुदेव प्रार्थना आरती]
ॐ जय श्री गुरु देवा,स्वामी जय श्री गुरु देवा।
तुमको ही सब ध्यावें-2 बन शिष्य करें सेवा..ॐ जय श्री गुरु देवा।।
सेवा क्या है तुमसे जानें,प्रेम के तुम पूरक-स्वामी-2
खिला तुम्हीं से जग है-2,जीवन के खेवक…ॐ जय श्री गुरु देवा।।
देव हो या हो दानव,सब तुम्हरें सेवक-स्वामी-2
जिसने करी अवज्ञा-2,मिटा वही जग से…ॐ जय श्री गुरु देवा।।
जो धरे ध्यान तुम्हारा, ज्ञान वही पावे -स्वामी-2
कटे अज्ञान उसी का-2,मुक्ति वो पावे…ॐ जय श्री गुरु देवा।।
जन्में सब है मात पिता से,सत् जन्मा तुमसे-स्वामी-2
चमके ज्ञान का सूरज-2,शक्ति पा तुमसे..ॐ जय श्री गुरु देवा।।
पूरी करते सभी कामना,जो चाहे ध्याता-स्वामी-2
भक्ति हम में भर दो-2,सत् ता के दाता..ॐ जय श्री गुरु देवा।।
अज्ञान काट तुम ज्ञान से भरते,मुक्ति के दाता-स्वामी-2
अंतिम जन्म हो मेरा-2,आशीष दो इसी क्षण से..ॐ जय श्री गुरु देवा।।
{गुरु पूर्णिमां पर गुरु उपदेश}
गुरु कृपा सम्भव तभी
जब सेवा तप हो दान।
शीश बिना शिष्य हो
गुरु कृपा ग्रहण कल्याण।।
गुरु ज्ञान यहाँ अर्थ है
प्रेम अर्थ यहाँ ध्यान।
आज्ञा अर्थ यहाँ सेवार्थी
तप अर्थ नाम सम्मान।।
गुरु ज्ञान को ग्रहण कर
अनुभव करे सत्य अर्थ।
और बढ़ाये अनन्त तक
बाटे ज्ञान दान मिटा अनर्थ।।
शिष्य बनों शीष त्याग कर
और गुरु बनो गुण ज्ञान।
सदा जपो सत्य ॐ सिद्धायै नमः
करके स्वयं का ध्यान।।
दूजे व्यक्तित्त्व ध्याओं नही
पूर्ण हो स्वयं को ध्या।
ज्ञान लो स्वयं ज्ञान का
और डूबो स्वयं को पा।।
अपनी शरण में शांति
दूजे शरण हो दास।
जन्म मिला स्वं तारण को
यो जपात् मंत्र हर साँस।।
त्याग सभी बहिर पूजा पाठ
और पूजे तो पूजे स्वयं।
तुम्ही हो वही परमात्मा
यही करो निवारण वहम।।
भय तो तब भी सदा लगे
जब दूजे करो उपासना।
उसकी कृपा पाने को
सदा दास आत्म साधना।।
विश्वास करो इस सत्य पर
तुम भी हो सत्य वही।
तब क्यों ना पकड़ो इस सत्य को
ध्याओं निरंतर हूँ मैं वही।।
पकट करो स्वयं को
और मिटाओ आत्म अंधकार।
तुम दास नही स्वामी स्वयं
यही सर्व धर्मो का सार।।
प्रेम करो पहले स्वयं से
तब दूजे पाओ प्रेम।
बिन प्रेम सब खंड खंड
प्रेम अखंड बनाता प्रेम।।
यही सत्यास्मि ज्ञान है
यही सत्यास्मि ध्यान।
सत्य ॐ शरणं आत्म शांतिः
अहम् सत्यास्मि हूँ भगवान।।
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
बोलो-श्री गुरु देव की जय!!
[श्री सत्य ॐ गुरु देव आरती सम्पूर्ण]
********
गुरु जी के द्वारा दिया गया अद्भुत ज्ञान
[सत्यास्मि गुरु वचन]
गुरु बिन फले ना कोई विद्या।
गुरु बिन फले ना कोई कर्म।
गुरु बिन ईष्ट-देव अधूरे
गुरु बिन सारे अपूर्ण धर्म।।
गुरु बना कर करे ना पूजा
गुरु बना ना करे तप जाप।
गुरु बना कर दान करे ना
गुरु दोष बन फले सब शाप।।
गुरु में निकाले सारी कमियाँ
गुरु कहे तो टाले काम।
गुरु को बताये किन्तु परन्तु
गुरु दोष बन बिगड़े सब काम।।
गुरु धाम की करे ना सेवा
गरु दर्शन को टाले रोज।
गुरु कहे जो बुरा मानता
वो शिष्य खोये सारी मोज।।
अपनी मर्जी चुनें गुरु को
आज गुरु कोई कल गुरु और।
मोल भाव करता गुरु ढूंढे
उस शिष्य जीवन कभी न भोर।।
गुरु से कपट गुरु से धोखा
विद्या मिले पर मिले ना मोका।
जब भी पड़े जरूरत विद्या
शिष्य पाये सदा हर शोका।।
सारे रिश्ते विषय वासना
मात पिता पत्नी पति सूत।
गुरु शिष्य रिश्ता परे रिश्ता
बारह मास रहे एक सी रुत।।
गुरु त्यागता कभीना शिष्य को
अंतिम छण तक करे प्रयास।
यो ही सभी नातो से बढ़कर
गुरु ही है पूर्णिमा बन व्यास।।
गुरु भय तारण संकट हारण
गुरु देव दर्शन हो शुद्ध।
गुरु प्रेम गुरु योग छेम् है
गुरु-शिष्य मिल हो नित बुद्ध।
इस गुरु ज्ञान से सभी का कल्याण होगा।
*******
“इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं? घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611
ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब
https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धाय नमः
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Very useful information Swamiji, thank you.