स्वामी जी आज ऐसी ही एक जानकारी सभी के साथ साझा कर रहे हैं। वो बता रहे हैं कि मंगल दोष यानि मंगली दोष के क्या दुष्प्रभाव हैं या यह कितना खतरनाक है? या इसको महज एक हौवा बना कर रखा हुआ है?
आइये सबसे पहले जानते हैं कि मंगली दोष आखिर है क्या?
मंगल बाकि ग्रहों की भांति कुण्डली के बारह भावों में से किसी एक भाव में स्थित होता है। बारह भावों में से कुछ भाव ऐसे हैं जहां मंगल की स्थिति को मंगलीक दोष के रूप में लिया जाता है।
कुण्डली में जब लग्न भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में मंगल स्थित होता है तब कुण्डली में मंगल दोष माना जाता है। सप्तम भाव से हम दाम्पत्य जीवन का विचार करते हैं। अष्टम भाव से दाम्पत्य जीवन के मांगलीक सुख को देखा जाता है। मंगल लग्न में स्थित होने से सप्तम भाव और अष्टम भाव दोनों भावों को दृष्टि देता है। चतुर्थ भाव में मंगल के स्थित होने से सप्तम भाव पर मंगल की चतुर्थ पूर्ण दृष्टि पड़ती है। द्वादश भाव में यदि मंगल स्थित है तब अष्टम दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है।
इसके अतिरिक्त सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए हम पांच बातों का विचार करते हैं –
- स्वास्थ्य
- भौतिक सम्पदा
- दाम्पत्य सुख,
- अनिष्ट का प्रभाव,
- जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अच्छी क्रय शक्ति
ज्योतिष में इन पांचों बातों का प्रतिनिधित्व लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव करते हैं। इसीलिए इन पांचों भावों में मंगल की स्थिति को मंगलीक दोष का नाम दिया गया है।
-मंगली दोष योग:-
जिस जातक की जन्म कुंडली में, (यानि-लग्न कुंडली को उस मनुष्य का दिखाई देने वाले शरीर होने से उसे “शरीर कुंडली” भी कहते है) मनुष्य के बाहरी शरीर पर ग्रह का क्या प्रभाव पड़ रहा है, ये पता चलता है अथवा चंद्र कुंडली में-चन्द्र कुंडली को मनुष्य की मन की कुंडली कहते है, इससे मनुष्य के मन की स्थिति क्या है और उस पर ग्रहों का क्या प्रभाव पड़ा है,ये पता चलता है और तीसरी कुंडली होती है-भाग्य कुंडली,जिसे नवमांश कुंडली कहते है-इस कुंडली से मनुष्य को पूर्व जन्म से प्राप्त उसके द्धारा किये गए कर्मों में से बचा हुआ,अब कौन कौन सा कर्म और उसका बचा हुआ फल यानि ग्रह का इस सम्बन्ध में प्रभाव का पता चलता है।यो इन तीनों में यददि मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम घर में), या चोथे घर में, या सातवें घर में, या आठवें घर में,या बारहवें घर में से कहीं भी एक घर में स्थित हो, तो उस योग को “मांगलिक योग या मंगली होना” कहते हैं।
-दुगना मंगली होना:-
इसे ज्योतिष भाषा में-गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल यानि पूर्ण मंगली होना कहते है की-जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12 वें घर में कहीं पर भी मंगल स्थित हो और उसके साथ में शनि, या सूर्य, या राहु पाप ग्रह भी बैठे हों, तो वह पुरुष गोलिया मंगली और स्त्री जातक चुनड़ी मंगली हो जाती है,यानि “दुगना मंगली” इसी को माना जाता है।
-पूर्ण मंगली होना:-
जब मंगल इन्हीं 5 घरों में से किसी एक घर में बैठा हो और फिर तीनों कुंडली यानि लग्न कुंडली में भी,चन्द्र कुंडली में भी और नवमांश कुंडली में भी या इन तीनों में से किसी दो कुंडलियों के इन 5 घरों में किसी एक में बैठा हो तो डबल या अधिक गुना मंगली पूर्ण मंगली कहलाता है।यो तीनों कुंडली को देखना चाहिए।तब निर्णय करें की-व्यक्ति मंगली है या नहीं और कितना मंगली दोष से ग्रस्त है।
-मंगल अपनी राशि और मित्र राशि में इन 5 घरों में से किसी एक में अकेला बेठा हो-तब भी शुभ या उच्च का मंगली होता है।
-मांगलिक कुंडली का मिलान :वर, कन्या दोनों की कुंडली में ही ऊपर दिया मांगलिक योग हों, तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी कुंडली यानि बिन मंगली एवं एक कुंडली मांगलिक हो,तो विवाह नहीं होना चाहिए।
-मंगल-दोष निवारण :-
मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों-जैसे शनि ग्रह हो, तो ये मंगली दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है,जेसे- कुंडली में चंद्रमा इन- 1-पहले घर, 4, 7, 10 वें घर में हो, तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में- पहले-चौथे-सातवें घर में हो तो “सर्वारिष्ट भंग योग” यानि सभी दोषों से मुक्त योग बना देता है।
यदि आपकी जन्मकुंडली में वृष लग्न है यानि पहले घर में वृष राशि है और ऐसे ही मिथुन -सिंह तथा वृश्चिक राशि है तो मंगली दोष कम हो जाता है।क्योकि मंगल इन राशियों की जन्मकुंडली में मित्र होता है।
ज्योतिष में उत्तर भारतीय ज्योतिष मंगल दोष की गणना करते समय जन्म कुंडली के दूसरे घर को तथा दक्षिण भारतीय ज्योतिष पहले घर को मान्यता नहीं देते है।
-वैदिक ज्योतिष के अनुसार मकर राशि में स्थित होने पर मंगल को “उच्च का मंगल” या महापुरुष योग बनना कहा जाता है।यानि पुरुषार्थ के बल पर दिग्विजयी होना अर्थ है। जिसका साधारण शब्दों में अर्थ यह होता है कि-मकर राशि में स्थित होने पर मंगल अन्य सभी राशियों की तुलना में सबसे बलवान हो जाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह भी मानते हैं कि- कुंडली में उच्च का मंगल सदा शुभ फलदायी होता है, जो सत्य नहीं है, क्योंकि कुंडली में मंगल का उच्च होना केवल उसके बल को दर्शाता है तथा उसके शुभ या अशुभ स्वभाव को नहीं दर्शाता है, जिसके चलते किसी कुंडली में उच्च का मंगल शुभ अथवा अशुभ दोनों प्रकार के फल ही प्रदान कर सकता है, जिसका निर्णय उस कुंडली में मंगल के साथ कोई अशुभ ग्रह जैसे-राहु या केतु या शनि का साथ बेठा है,तो अधिकतर बहुत लाभ देते देते अचानक ही उस कार्य या नोकरी या पद प्रतिष्ठा में विध्न बनकर हानि देता है।पर मकर का मंगल होने से ये लाभ फिर से उसके निरन्तर प्रयास से सम्भल कर प्राप्त हो जाता है ऐसा योग बनता है।
-मंगल दोष की चारित्रिक विशेषतायें:-
-मंगल देव और ग्रह क्या है:-
-भारतीय ज्योतिष में मंगल ग्रह को अंगारक (यानि अंगारे जैसा रक्त वर्ण), भौम (यानि भूमि पुत्र) भी कहा जाता है। मंगल युद्ध का देवता कहलाता है और कुंवारा है। यह ग्रह मेष एवं वृश्चिक राशियों का स्वामी कहलाता है। मंगल रुचक महापुरुष योग या मनोगत ज्ञान और उसके समोहन विज्ञान के समस्त ज्ञान को देने माना जाता है। इसे रक्त या लाल वर्ण में दिखाया जाता है।यो इनकी मूर्ति लाल पत्थर की बनाई जाती है और इन पर लाल सिंदूर या लाल चन्दन का तेल या घी से लेप चढ़ाया जाता है जिसे भक्त लोगों में चोला चढ़ाना कहते है,जो कालांतर में लोगो ने मंगलदेव के स्थान पर हनुमान जी को चोला चढ़ाने के रूप में पूजा शुरू कर दो और मंगलदेव की पूजा घट गयी एवं मंगलदेव त्रिशूल, गदा, पद्म और भाला या शूल धारण किये दर्शाया जाते है। इसका वाहन भेड़ होता है एवं सप्तवारों में यह मंगलवार के स्वामी और शासक कहलाते है।
मंगलदेव का निवासस्थान मंगल लोक है और इनका मंत्र है:-
– भारतीय ज्योतिष में मंगल ग्रह को प्रथम श्रेणी के अति शीघ्र ही वरदाता और अति शीघ्र ही शाप या हानिकारक माना जाता है।
-यह मेष राशि एवं वृश्चिक राशि का स्वामी होते है। इसके अलावा मंगल मकर राशि में उच्च भाव में तथा कर्क राशि में नीच भाव में कहलाते है। और सूर्य, चंद्र एवं बृहस्पति इसके सखा या शुभकारक ग्रह मानते हैं एवं बुध इसका विरोधी ग्रह कहलाते है। ये शुक्र एवं शनि से अप्रभावित रहते है या उनसे इन्हें सम्बन्ध सामान्य रहते हैं।
-मंगल ग्रह शारीरिक ऊर्जा, आत्मविश्वास और अहंकार, ताकत, क्रोध, आवेग, वीरता और साहसिक प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह रक्त, मांसपेशियों और अस्थि मज्जा पर शासन करता है। मंगल लड़ाई, युद्ध और सैनिकों के साथ भी जुड़ा हुआ है।
-मंगल तीन चंद्र नक्षत्रों का भी स्वामी है:-1- मृगशिरा,-2-चित्रा एवं-3-श्राविष्ठा या धनिष्ठा नक्षत्र। और मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुएं हैं:- रक्त यानि लाल रंग और इस रंग की वस्तुए आदि, पीतल धातु है
और मूंगा इनका मुख्य रत्न है। *-इनका तत्त्व अग्नि होता है एवं यह दक्षिण दिशा और ग्रीष्म-अप्रैल से जून तक(यहाँ मंगलदेव-पुरुष शक्ति का अधिकार है) और उधर नवम्बर महीना काल(में स्त्री शक्ति-शक्तिदेवी का अधिकार है) से संबंधित है।
मंगल- मंगलदेव देवताओं के सेनापति हैं और ये दैत्यों या बुराइयों से युद्ध करते उन्हें परास्त करते हैं,यो मंगल युद्ध का देवता कहलाता है।और मंगल पृथ्वी से पैदा होने के कारण पृथ्वी या भूमि का पुत्र है,यो भोम भी कहलाता है।और पृथ्वी से मंगल के साथ चन्द्रमाँ भी उत्पन्न हुआ है,यो ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमाँ को स्त्री ग्रह माना है,इस सम्बन्ध में पुराणों की कथाओं के अनुसार चन्द्रमाँ पुरुष दिखाये जाने से विरोधाभाष बनते है की-चंद्रमां स्त्री है या पुरुष और यो ही स्त्रियां व्रत में चन्द्रमा को पति स्वरूप और कवि प्रिय स्वरूप अर्थ देते है।लेकिन चन्द्रमाँ स्त्री ही ग्रह है और ये पृथ्वी पुत्री है और मंगल की बहिन है,यो मंगल के साथ इसका होना मंगल के दोषो को शांत करता है-अर्थात एक गर्म और एक ठंडा होने से सन्तुलन बन जाता है।यो मंगल का और चन्द्रमा का पृथ्वी और उसके वासियों पर अधिक प्रभाव पड़ता है।यो इन दोनों ग्रहों पर पृथ्वी के अंश होने से मनुष्य जीवन के लिए रहने के स्थान को खोजा जा रहा है।यो पृथ्वी पर मंगल की पूजा और चन्द्रमा की पूजा अधिक है,वो चाहे मंगल देव की जगहां, मंगल को जन्में हनुमान जी के व्रत अधिक प्रचारित है।
जबकि सही में हमें मंगलदेव की पूजा करनी चाहिए,तब अधिक और सम्पूर्ण लाभ मिलेगा।
मंगल ग्रह-मनुष्य के शरीर में चल रहे रक्त और उसमें स्थित सभी खनिज या विटामिंस को और उसके रक्त प्रवाह को नियंत्रित करता है,यो ज्यों ही मंगल की स्थिति अनियंत्रित यानि गड़बड़ा जाती है,त्यों ही मनुष्य में सभी प्रकार के रक्त दोष का प्रभाव-ब्लड प्रेशर का नीचे-लो ब्लड प्रेशर या ऊपर हाई ब्लड प्रेशर का रोग होना प्रारम्भ हो जाता है,जिससे आगे चलकर दिल के दौरे या ह्रदय के आपरेशन करने पड़ते है और मंगल की ज्यादा खराब स्थिति से हार्ट अटैक से मृत्यु होती है।लगभग सभी ऑपरेशन और दुर्घटनाएं और विवादों में खून खराबा व् चोट लगने आदि के दोष मंगल ग्रह के कारण होते है।यो प्राचीन काल से ज्योतिषियों ने मंगलदेव की मंगलवार को पूजा स्थापित की थी,जो बाद में मंगलदेव के स्थान पर उस दिन जन्मे या अवतरित हुए देव देवी जेसे- हनुमान जी या दुर्गा या काली माँ ने ले ली और मंगलदेव की पूजा बन्द हो गयी।
जबकि मंगल का समस्त लाभ केवल मंगलदेव ही दे सकते है।ये मंगलदेव अपने शुभ अशुभ फल देने को ईश्वरकृत स्वतंत्रता लिए है।यो केवल मंगलवार को मंगलदेव की ही पूजा अर्चना करनी चाहिए।
ये शनिदेव से भी बहुत से लाभ आदि को लेकर अधिक फलदायी और अनिष्टकारी है।
*-क्यों है मंगलदेव के हनुमान जी अवतार और मंगलवार को पूज्य:-
मंगलदेव ने पृथ्वी से जन्म लेने के उपरांत भगवान सत्यनारायण और भगवती सत्यई पूर्णिमाँ की तपस्या करके देवताओं के सेनापति की उपाधि प्राप्त की थी और उनसे अपनी माता पृथ्वी पर सदा उनकी और उनके ऊपर रहने वाले ईश्वर भक्तों की साहयता के लिए वर मांगा, तब उन्होंने मंगलदेव को शिवजी और विष्णु जी के मोहनी रूप के प्रसंग से माता अंजनी के गर्भ से उत्पन्न होकर सत्यनारायण और सत्यई पूर्णिमाँ के अवतार विष्णु लक्ष्मी के अवतार श्री राम के सेवक सहायक रूप में चैत्र पूर्णिमां को मंगलवार के दिन हनुमान जी के रूप में जन्म लेकर सदा के लिए अमर होकर भक्तों के संकट हरण को विराजमान होकर पूज्य बने।यो मंगलदेव ही हनुमान जी है।चूँकि हनुमान जी ब्रह्मचारी स्वरूप है यो वे विवाह के कारक देव नहीं है, यो हमें विवाह और गृहस्थी सुख को मंगलदेव कि और शक्तिदेवी की ही उपासना करने से ही मंगली दोष से मुक्ति मिलेगीं।
मंगल मनुष्य के पृथ्वी पर करने वाले सभी कर्मों के अधिपति ग्रह है।और जीवन में सबसे पहले कर्म के करने से ही भाग्य बनता है।क्योकी मनुष्य जो भी कार्य यानि कर्म करेगा,उसमें से जो भी उपयोग में लेगा,उस ऊपयोग में लिए कर्म का फल और जो उपयोग में नहीं लेकर बचाया हुआ कर्म है-उस कर्म का बचा हुआ-फल या परिणाम ही मिलकर मनुष्य का भाग्य बनता है।यो ही गीता में श्री कृष्ण ने कर्म को ही मनुष्य का प्रधान कर्तव्य करना बताया है-की कर्म करने से ही मनुष्य को जो चाहे वो प्राप्ति हो सकती है।और यो ही सभी देव देवी और अवतार इस पृथ्वी पर कर्म करने को आते है और उस कर्म के करने से ही सदा को अमर होकर पूज्य बनते है।और असुर बुरे कर्म करने से बुरी म्रत्यु को प्राप्त होकर अपयश के भागीदार होते है।यो ही भाग्य यानि शनिदेव से ये कर्म यानि मंगलदेव बड़े और अत्यधिक वरदायी है।क्योकि सही भाषा में कर्म से भाग्य बना है और भाग्य रूपी शेष कर्म से ही नवीन कर्म करने की शक्ति मिलती है,यो दोनों और कर्म ही प्रधान और पूज्य है-यो मंगलदेव और शनिदेव एक ही देव के दो रूप है-लाल रंग-प्रचलित यानि एक्टिव कर्म का रूप है रजोगुण यानि क्रिया शक्ति है,यो मंगलदेव का रंग लाल या गुलाबी है और बचा हुआ शेष कर्म रखे या स्थिर होने से कम एक्टिव यानि कम क्रियाशील होने से धीरे धीरे कर्म करने को ही शने शने चलने वाला कर्म-शनिदेव नाम दिया गया है।यो भाग्य का रंग कुछ कम क्रिया शील होने से काला रूप दिया है और यो ही शनिदेव का रंग काला है।समझ में आया की-दोनों एक दूसरे के पूरक है-कर्म और भाग्य।।और दोनों मंगलदेव और शनिदेव मित्र है।
अर्थात जैसा कर्म करोगे-वैसा फल पाओगे।
मंगली व्यक्ति अधिक ऊर्जा का ग्रहण और दाता के गुण से भरा होने से वो अधिक ऊर्जावान होता है,यो यदि ये ऊर्जा सही दिशा में लगी तो उस व्यक्ति का सभी प्रकार से कल्याण होगा और उससे जुड़े लोगों का भी कल्याण होगा अन्यथा ये अतिरिक्त ऊर्जा या पूर्वजन्म का अधिक एकत्र कर्म की शक्ति ही ऊर्जा कहलाती है,ये ऊर्जा ही अपने कर्म में अभी पूर्ण रूप से बदल नहीं पाने के कारण केवल शक्ति रूप में होती है,यो ये मंगल ग्रह के उच्च होने से शुभ और निम्न होने से अशुभ कर्म को करने की शक्ति बनकर कार्य करती या मनुष्य से कराती है।
यो अधिकतर मंगली व्यक्ति ऊष्ण अथवा तेज,उग्र गतिवान आदि स्वभाव के एवं स्वाभिमानी या अहंकारी होते हैं।
यो ये मंगली व्यक्ति ऊर्जा से भरपूर होते हैं, यो सही प्रकार से इस ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाए तो यह सृजनात्मकता और कल्याणकारी कर्म और उसके फल को उत्पन्न करता है !
-मंगल दोष-मनुष्य के जीवन की पांचों मुख्य आवश्यकताओं-1-
बाल्यावस्था ओर शिक्षा,
-2- नोकरी और व्यवसाय
-3-प्रेम और विवाह
-4-धन,वैभव एश्वर्य आदि समस्त सुखों
-5- स्वास्थ्य और रोग और उसका अंतिम परिणाम सुखद या दुखद म्रत्यु और मोक्ष की स्थिति को पूर्ण रूप से प्रभावित और नियंत्रित और प्रदान करता है।यो मंगल का मनुष्य के सभी कर्मों और उसके पांचों फलों पर अधिकार होने से मूल ग्रह कहलाता है।
यो मंगली का उच्च और निम्न या सामान्य होना बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है।समझे भक्तों..
-दो मंगली व्यक्ति-स्त्री और पुरुष का विवाह क्यों कराना या करना आवश्यक है-:-
संसार में दो ऊर्जा कार्यरत है-नकारात्मक यानि नेगेटिव(-) जिसे हम जीवित या साकार रूप में पुरुष शक्ति कहते है और दूसरी सकारात्मक यानि पॉजिटिव(+) जिसे हम साकार रूप में स्त्री शक्ति कहते है।
यो मंगल ग्रह के दो रूप है- मंगलदेव और उनकी पत्नी शक्ति।
-यो ऋण मंगल और धन मंगल का योग होकर मंगल सन्तुलित हो जाता है और ये मंगल दोष समाप्त हो जाता है।
– मंगली के साथ मंगली का विवाह होना आवश्यक है।
-पांच भावों में मंगल के प्रभाव:-
-प्रथम भाव:-*
पहले घर मे मंगल होने से और उसके द्धारा अपने से सातवें घर यानि पत्नी और पार्टनर के घर को पूर्ण रूप से देखने यानि प्रभाव से उस मंगली व्यक्ति के पति अथवा पत्नी में छोटी छोटी सी बातों पर नासमझी से शीघ्र ही परस्पर विरोध होने से अधिकतर समय कलह होती है,यो उनके जीवन में मानसिक तनाव रहता है,जिससे सभी प्रकार की शरीर में दिमागी कष्ट दर्द रोग और शरीर में निरन्तर थकावट से अस्वस्थता उत्त्पन्न होती है।ज्यादा मंगल दोष से जीवन नरक बन जाता है।
द्वितीय भाव में मंगल:-
द्वितीय घर में मंगल पारिवारिक कष्ट,विरोध उत्पन्न करता है तथा व्यक्ति के परिवार एवं रिश्तेदोरों से विवाद उत्पन्न होने लगते हैं।कमाया धन व्यर्थ में खर्च होता है या हड़प या लूट लिया जाता है।परिवारिक सम्पत्ति में हिस्सा कम मिलता है या दबा लिया जाता है।यो मुकदमे चलते है।
चतुर्थ भाव में मंगल:-
चतुर्थ भाव में मंगल होने पर व्यक्ति को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है अथवा नौकरी में अस्थायित्व आ सकता है,पूजापाठ में मन नही लगता है,नास्तिकवादी हो जाता है।भगवान को भी गालियां देता है।माँ से विवाद और माता के आपरेशन होते है,और पिता से अधिकतर कभी नहीं बनती है।
तेज गति से वाहन चलाने की आदत होती है यो दुर्घटना में चोट से लेकर म्रत्यु तक हो जाने के प्रबल योग बनते है।सम्पत्ति के विवाद होते है।सिंह या मेष राशि का मंगल हो तो भी ये प्रभाव बनते है,बस व्यक्ति इस विघ्नों पर अपने कर्मो से विजय पा लेता है।पर चोथे घर से सातवें घर को मंगल देखने के कारण उसके मूलाधार चक्र में प्राणायाम के बल से कुण्डलिनी जागरण होता है और यदि मंगल कुछ दोष युक्त है तो बार बार ये कुण्डलिनी शक्ति यानि उसकी काम ऊर्जा का प्रवाह उसके प्रेम सम्बंधों के चलते नष्ट होती या व्यर्थ खर्च होने से ह्रदय चक्र तक भी नहीं पहुँच पाती है और नाही उसे प्रेम का अंतिम सुख शुभ विवाह मिलता है।यहाँ केतु या राहु या शनि के साथ मंगल का योग समलैंगिक भी बनाता है।यो विवाह के बाद भी उसे इन सम्बंधों के चलते ग्रहस्थ सुख में अशांति अतृप्ति मिलती है।बाद में ऐसा व्यक्ति इस सबको त्याग कर साधू योगी बनने की और अग्रसर होता है।
सातवे भाव में मंगल का प्रभाव:-
इस घर में मंगल की शुभ अशुभ स्थिति व्यक्ति के चरित्र का भी निर्धारण करती है।ये सातवां स्थान व्यक्ति का मूलाधार चक्र से या जनेंद्रिय स्थान से सम्बन्ध होने से यहाँ ऊर्जा का
अधिक और तीर्व ऊर्जा के निरन्तर प्रवाह से व्यक्ति में काम भाव की ज्यादा जागर्ति होती है यो ऐसा व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष उसके जीवन में अनेक अन्य व्यक्तियों से शारारिक सम्बन्ध चाहे कम हो या ज्यादा बनते बिगड़ते है अर्थात इसे प्रेम योग में विध्न बाँधा और स्थायित्व नहीं आना भी कहते है।मंगल निम्न होने से काम भाव में शीघ्र अरुचि से लेकर नपुंसकता तक प्रभाव आता है।
यहाँ शुभ मंगल का होना मनोवांछित प्रेम में सफलता और प्राप्ति का शुभ संकेत है।
इसमें व्यक्ति के विवाहेत्तर सम्बन्ध बनने की भी संभावना रहती है जोकि पति पत्नी में अलगाव का कारण बन सकता है।ये सातवां घर मनुष्य की कुण्डलिनी शक्ति का प्रमुख घर है यो यहां से ही मंगल या अन्य ग्रहों के योग से उसके कुण्डलिनी जागरण के विषय में जाना जाता है की-इसकी कुण्डलिनी किसी मार्ग से-वाममार्ग से या उत्तर मार्ग के अभ्यास से जाग्रत होगी।ये विषय कभी फिर बताया जायेगा।
आठवे भाव में मंगल:-
आठवे घर रोग और उसकी प्रबलता और उससे मृत्यु आदि और अचानक संकटों से उस मनुष्य को हानि होगी आदि बातें बताता है यो यहां मंगल की शुभ अशुभ स्थिति से व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां, मानसिक पीड़ा होती है और गुप्तांग के ऑपरेशन और उसके जीवन साथी के इस समबन्धित स्वास्थ्य आदि पर भी इसका शुभ या विपरीत प्रभाव पड़ता है।
-बाहरवें भाव में मंगल:-
बाहरवें भाव-विदेश यात्रा से लेकर वहां निवास या कष्ट और जेल आदि और सभी प्रकार के खर्चे का घर होने से यहां मंगल की शुभ अशुभ स्थिति होने से व्यक्ति के बहुत से गुप्त या विदेशी या अपरिचित शत्रु उत्त्पन्न हो सकते हैं और विदेश यात्रा में लाभ या हानि या उसका निरन्तर टलना आदि और स्वास्थ्य एवं धन सम्बंधित व्यर्थ के कष्ट संकट को जाना जाता है और व्यक्ति विवादों में जेल जाकर कितने समय में उसकी जमानत होगी या केवल जेल ही होगी आदि बातों का सामना करना पड़ता है।
-विवाह पर प्रभाव और मंगल दोष दूर करने के उपाय:-
दो मंगली व्यक्तियों के बीच विवाह के उपायों में केवल कन्या के ही मंगली होने पर विवाह से पूर्व उसका विवाह पीपल, केले का वृक्ष अथवा कुम्भ से करा कर उसे और उसके पति के दोष को मुक्त किया जा सकता है।
ये बड़ी विचित्र से प्रथा है-की पुरुष के स्थान पर कन्या का ही ऐसे उपायों से मंगल दोष क्यों शांत किया जाता है ?.,
कारण ये है की-कन्या ही पत्नी बनकर उस पुरुष के वंश वृद्धि का मुख्य कारक होती है यो उससे उत्पन्न होने वाली सन्तान का भी जीवन दीर्घ और स्वस्थ और उन्नत हो यो स्त्री में जो मंगल की उच्चता या निम्नता के प्रभाव से जो शुभ अशुभ अतिरिक्त ऊर्जा है,वो नियंत्रित रहे।क्योकि उसकी अनियंत्रित ऊर्जा के पुरुष के संसर्ग या सम्भोग के समय लेने देन के योग से पहले से परस्पर भोग आनन्द का सुख उस ऊर्जा के रिफ्लेशन यानि प्रतिक्रिया से नष्ट या असन्तुलित होने से आनन्दरहित हो जायेगा और उसके उपरांत आगे इस भोग से
जो बीज ग्रहण से सन्तान योग बनेगा,उसमें किसी प्रकार की अतिरिक्त या कम ऊर्जा के प्रवाह से सन्तान में विभिन्न विकृतियां दुर्गुण की वृद्धि नहीं हो।
लड़की के घट या पीपल आदि से विवाह करके उन्हें तोडना या काटने के ये उपाय बनाये गए थे,जो पूर्णतया प्रभावी और सही नहीं है।
इसके लिए लड़की को सदा मंगलदेव और उनकी पत्नी की पूजा और साधना को समझ करना होगा।अन्यथा ये बाहरी पूजापाठ कर्मकांड करने पर भी व्यक्ति के गृहस्थी जीवन में कोई शांति न लाभ देते है और लोग कहते फिरते है की-अजी मंगल के खूब उपाय करा लिए कुछ फायदा नहीं हुआ और नहीं होता है।
मांगलिक दोष युक्त कुण्डली का सबसे ज्यादा प्रभाव विवाह सम्बंन्ध इत्यादि पर यो पड़ता है :-
• सही आयु में विवाह सम्बंन्ध तय नही हो पाना।
• विवाह सम्बन्ध तय होकर छूट जाना।
• अधिक उम्र गुजरने पर भी विवाह का नही होना।
• विवाह के समय विघ्न आना।
• विवाह पश्चात जीवन साथी से विवाद होना और सन्तान सुख से अनेक प्रकार से वंचित होना इत्यादि बातो पर प्रभाव डालता है ।
एक से अधिक विवाह होने।
विवाह उपरांत तलाक के मुकदमे चलते ही रहना और देर से न्याय मिलना आदि होना है।
प्रचलित बातें और उपाय:-
-मंगली व्यक्तियों को 27 या २८ वर्ष की आयु के पश्चात विवाह करना चाहिए, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि आयु बढ़ने के साथ साथ मंगल दोष का प्रभाव कम हो जाता है।ये प्रचलित ज्ञान कुछ हद तक सही होते हुए भी पूर्ण सही नहीं है।
हाँ मंगली का भाग्य अधिकतर 27 या 28 वें वर्ष में जागरूक होता है।यो उसे तभी विवाह को कहा गया है।क्योकि 9 या 18 वे वर्ष में भी भाग्य जाग्रत होता है पर यहाँ उसको अनेक परिवर्तनों के साथ विघ्नों का भी सामना करना पड़ता है।
– यो जो भी व्यक्ति मंगल ग्रह से पीड़ित हो,उसे मंगलवार के दिन मंगलदेव के साथ उनकी पत्नी शक्तिदेवी की आराधना करनी चाहिए।
और मंगलवार को प्रातः स्नान करके मंगलदेव व् शक्तिदेवी या ऐसी संयुक्त मूर्ति या चित्र उपलब्ध नहीं हो तो,केवल मंगलदेव को लाल चन्दन से तिलक करें और अपने लगाये और लाल सिंदूर में घी या सरसों का तेल मिलाकर उससे इनकी मूर्ति पर मले यानि चोला चढ़ाये और सरसों के तेल का दीपक जलाये या घी का भी दीपक जला सकता है और लाल फूल गुड़हल या कनेर या गुलाब के चढ़ाये या इनकी माला पहनाये।और इनके इस मंत्र से जप ध्यान करे- ॐ भों भौमाय नमः
या- ॐ भ्रां भ्रीम भों सः मंगलाय नमः
– या केवल- ॐ मंगलम् शक्तिदेव्यै नमः
मंत्र से जप ध्यान करें।
और व्रत का समापन साय को ज्योत बत्ती करके इन्हें मीठी रोटी या पराठें का गुड़ या शक्कर से भोग लगा कर उसके बाद स्वयं खाये।किसी को कोई भोजन सम्बंधित परेशानी हो तो,उसे जो भी खाता हो उसका इन्हें भोग लगा कर स्वयं खाना खाये।यो इनके व्रत में कोई विशेष बात का ज्यादा विचार नहीं करना है।बस ये प्रेम से जो अर्पित करोगे उसे ग्रहण कर भक्त को मनवांछित वरदान और सुख देते है।
– लाल दाल और रोटी और गुड़ से व्रत करना चाहिए।
और अपने दैनिक भोजन में गुड़ का अवश्य उपयोग किये जाने से मंगलदेव की बड़ी कृपा होती है।
-ताम्बे का कड़ा हाथ में मंगलवार को पंचाम्रत से स्नान कराकर पहने।
या तांबे की अंगूठी पुरुष सीधे हाथ में और कन्या या स्त्री उलटे हाथ की अनामिका ऊँगली में मंगलवार को पंचाम्रत से स्नान करा कर पहने।
-लाल कुत्ते को जलेबी मंगलवार को खिलाया करें।
-भेड़ को मंगलवार को अवश्य चारा देने से अति शीघ्र मंगल ग्रह बहुत शुभ फल देते है और यदि किसी गड़रिये को एक या दो भेड़ का बच्चा और बच्ची को अपने से 9 बार उल्टा उतार कर मंगलवार को दे दे तो मंगल के सर्व दोष शांत होकर शीघ्र विवाह और प्रेम में और ग्रहस्थ में शांति मिलेगी।
अब 25 मई शनि जयंती मंगलवार की पड़ी थी और इसके बाद अब केवल 25 सितम्बर 2018 को मंगलवार के दिन भादों पूर्णिमां पड़ेगी उस दिन श्राद्धों की पितृ पूर्णिमां भी है।यो इस दिन जो भी मंगलदेव और शक्ति माता की विधि विधान से पूजा ध्यान करेगा उसको मंगल दोष से बड़ी भारी मुक्ति मिलेगी।
***
जय मंगल देव..जय शक्ति माता की जय
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
Discover more from Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines Khabar 24 Express Indias Leading News Network, Hindi News – Khabar 24 Express Live TV shows, Latest News, Breaking News in Hindi, Daily News, News Headlines, current affairs, cricket, sports, business and cinema, Latest Hindi News, Breaking News in Hindi, Bollywood Gossip, Bollywood News, Top Hindi News Channel, Khabar 24 Express Live TV, Khabar24, Khabar24 Express

