पिछले साल #Boycott_Made_in_China सुनकर ऐसा लग रहा था कि मानों देश के बहुत से युवा, बुजुर्ग, महिलाएं सभी लोग देशभक्ति में डूबे हुए हैं। हर तरफ से आवाज आ रही थी कि चाइना माल का बहिष्कार करो। यहाँ तक कि जगह-जगह चाइना माल की होली जलाई गई। स्वदेशी की तरफ लोगों का आकर्षण और चाइना माल पर जना-आक्रोश यहाँ तक कि बाबा रामदेव समेत भाजपा के बहुत से दिग्गज नेता चाइना माल के बहिष्कार करने में जुट गए थे। पीएम मोदी ने भी लोगों से अपील की थी कि चाइना माल लोग न लें। भारत में बनी चीजें ही खरीदें।
पीएम मोदी की भावी योजना #मेक_इन_इंडिया की पहले ही हवा निकल चुकी थी।
भारत में चीन का कच्चा माल यानी रो मेटेरियल बहुत जादा आता है और इसके बाद यहां उसे असेंबल किया जाता है। हज़रों लाखों की संख्या में लोग इस काम को करके रोजी रोटी कमाते हैं। लेकिन जब चीनी माल के बहिष्कार का ऐलान हुआ, लोगों में चीनी माल के प्रति गुस्सा भर गया ऐसे में उन लाखों लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट भी पैदा हो गया जो चीनी माल से सामान तैयार करते थे यानी असेंबलिंग इत्यादि। लेकिन उन मजदूरों के मन में एक आस भी थी कि चीनी माल न सही भारत में अनेकों फेक्ट्री लगेंगी जिससे उन्हें नया रोजगार मिल सकेगा। और माल भी मेड इन इंडिया हो जाएगा लेकिन ऐसा हो न सका।
खैर हम पीछे न जाकर आगे की बात करते हैं। पीछे का तो लोग सब भूल जाते हैं। उन्हें सिर्फ एक बात याद करवाई जाती है वो है 60 साल। पहले 70 साल हुआ करते थ, लेकिन गणित ठीक होने के बाद 60 साल हो गए।
इन चार सालों में उनके साथ क्या हुआ किसी को कुछ याद नहीं।
चलिए एक चीज है जो हम आपको याद दिलाना चाहते हैं। आपमें से ही चन्द लोगों की भीड़ ने चाइना माल इस्तेमाल करने वालों को देशद्रोही करार दिया था। आपमें से ही कुछ लोग चीन के माल का बहिष्कार कर रहे थे। आपमें से ही कुछ लोग चीनी माल को जबरन दुकानों से (दुकानदारों की रोने बिलखने को नजरअंदाज कर) निकालकर उसमें आग लगा रहे थे।
आज मैं आपसे सवाल पूंछना चाहता हूँ कहाँ गया आपका देशप्रेम?
क्या आप सबने भी चीनी माल का बहिष्कार किया? क्या आप अब सिर्फ स्वदेशी इस्तेमाल करते हैं?
आपका जबाव मुझे पता है।
पीएम मोदी बिन बुलाए चीन की यात्रा पर जाते हैं लेकिन आपके हल्क में से एक आवाज नहीं निकलती, आप चीन का बहिष्कार करते हैं लेकिन हमारे पीएम 10-10 बार चीन के राष्ट्रपति से मुलाकात करते हैं, न सिर्फ मुलाकात करते हैं वो कई बार चीन की यात्रा करते हैं।
चीन से हमने कई ऐसे समझौते किये हैं जिससे हम नहीं बल्कि चीन मालामाल हो जाएगा।
आइये हम आपको बताते हैं।

भारत और चीन ने आज करीब 10 बिलियन डॉलर यानी 63 हज़ार करोड़ रुपये के 24 समझौतों पर दस्तखत किए, इनमें रेलवे, माइनिंग, पर्यटन, अंतरिक्ष अनुसंधान तथा वोकेशनल एजुकेशन से जुड़े समझौते भी शामिल हैं।
- चीन भारतीय शहर चेन्नई में, जबकि भारत चीन के शहर शेंग्दू में एक-एक वाणिज्य दूतावास खोलने पर सहमत हुए हैं।
- चेन्नई, चेंगदू में खुलेगा कॉन्सुलेट
- शिक्षा के आदान-प्रदान में सहयोग
- स्किल डेवलपमेंट पर सहयोग
- दूरदर्शन और CCTV के बीच प्रसारण को लेकर भी समझौता हुआ है। माना जा रहा है कि इन समझौतों के बाद भारत और चीन के बीच व्यापारिक संतुलन सुधारने में काफी मदद मिलेगी।
- चीन के सहयोग से अहमदाबाद में स्किल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट खुलेगा
- दोनों देशों की रेलवे के बीच एक्शन प्लान
- व्यापार क्षेत्र में सहयोग
- साथ मिलकर काम करेंगे दोनों देशों के विदेश मंत्रालय
- खनन और खनिज क्षेत्र में सहयोग
- अंतरिक्ष क्षेत्र में साथ मिलकर काम करेंगे
- दूरदर्शन-CCTV का साझा प्रसारण होगा
- पर्यटन क्षेत्र में सहयोग
- आयात के क्षेत्र में सेफ़्टी रेगुलेशन
- भारत-चीन के बीच बनेगा थिंक टैंक फ़ोरम
- चीन के डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर और नीति आयोग के बीच सहयोग
- भूकंप विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सहयोग
- समुद्र विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग
- भू-विज्ञान क्षेत्र में सहयोग
- भारत-चीन स्टेट लीडर्स फ़ोरम बनेगा
- कर्नाटक, सिचुआन का साझा विकास
- चेन्नई, चोंग्किंग का साझा विकास
- हैदराबाद, चिंगदाओ का साझा विकास
- औरंगाबाद, दूनहुआंग का साझा विकास
- गांधीवादी अध्ययन के लिए सेंटर
- भारत के सहयोग से चीन के कुमनिंग में खुलेगा योग कॉलेज।
इसके अलावा हम आपको बता दें कि चाइनीज फोन भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं। यही वजह है कि भारतीय मोबाइल बाजार पर अकेले चीन की बड़ी हिस्सेदारी है। भारत की मोबाइल मार्केट के 60 फीसदी पर चीन का कब्जा है।
इतना ही नहीं, दिल्ली मेट्रो में भी चीनी कंपनी काम कर रही हैं। साथ ही पावर सेक्टर में भी चीन का बड़ा दखल है। करीब 80 फीसदी प्रोडक्ट्स चीन से ही आयात किए जाते हैं।
कई राज्यों की विकास परियोजनाओं में चीन की भूमिका है।
भारत में चीन के दखल का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चीन जाने वाले हैं। बताया तो यह जा रहा है कि चीनी निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए योगी वहां जा रहे हैं। गुजरात, कर्नाटक समेत भारत के कई ऐसे राज्य हैं जहां से चीन का सीधा कारोबारी हित जुड़ा हुआ है।
इसके बाबजूद चीन की हरकतें किसी से छिपी नहीं हैं।
चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आता है। भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद पर चाहे विराम लग गया हो लेकर चीन की नई गतिविधियों ने भारत को फिर परेशानी में डाल दिया। लद्दाख क्षेत्र में जहां पैंगोंग झील के पास अप्रैल माह में दो सप्ताह के भीतर तीन बार चीनी सैनिकों ने घुसपैठ करने की कोशिश की। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि लद्दाख सेक्टर में इस साल 28 फरवरी से 12 मार्च के बीच चीनी सैनिक तीन बार भारतीय सीमा में छह किलोमीटर तक घुस आए। पिछले एक महीने के दौरान अतिक्रमण की बीस से अधिक प्रयास हुए। इससे पूर्व अरुणाचल प्रदेश के सुबानसिरी जिले के असाफीला में भारतीय सैनिकों की गश्त को लेकर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई है। यह इलाका चीन सीमा से सटा है। चीन इस बात से बौखलाया हुआ है कि भारतीय सेना के जवान यहां गश्त क्यों लगा रहे हैं। उसका कहना है कि यह विवादित इलाका है। हालांकि भारत ने चीन के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए साफ कर दिया कि सुबानसिरी क्षेत्र और असाफीला इलाका भारत का अभिन्न हिस्सा है और इसे लेकर चीन को कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
भारतीय सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के बारे में पता है और वह हमेशा की तरह इलाके में गश्त जारी रखेगी। दरअसल, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही चीन अरुणाचल के बड़े हिस्से पर अपना दावा जताता रहा है। सरहदों को लेकर चीन की हमेशा कोई न कोई ना कोई विवाद खड़े करते रहना पुरानी फितरत रही है। भारत-चीन की सीमा करीब चार हजार किलोमीटर लंबी है। इसमें हिमालय के दुर्गम इलाके भी आते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा सीमांकन संभव नहीं है जिससे सीमा रेखा का स्पष्ट रूप से पता चल सके। चीन हमेशा इसी का फायदा उठाता रहा है। पहले वह भारतीय सीमा में कई किलोमीटर तक अपने सैनिकों की घुसपैठ कराता है और फिर हर क्षेत्र को ‘विवादित’ बताते हुए उस पर कब्जे की ताक में रहता है। लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी से लेकर डोकलाम तक चीन ने यही किया। चीन केवल भारत के साथ ऐसी हरकतें नहीं कर रहा है बल्कि चीन के अपने कमोबेश सभी पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद हैं। उसकी साम्राज्यवादी-विस्तारवादी प्रभाव को बनाए रखने की मंषा की वजह से ऐसेे विवाद उत्पन्न करता है। चीन वर्तमान में तेजी से अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में लगा है। इसमें उसके सामरिक और व्यापारिक दोनों हित हैं। दक्षिण चीन सागर में सैन्य अड्डा बना कर उसने अमेरिका तक की नींद उड़ा दी है। हिंद महासागर में प्रभाव जमाने के लिए उसने मालदीव को ठिकाना बना लिया है। मध्यपूर्व में पहुंच बनाने के लिए चीन पाकिस्तान में आर्थिक गलियारे का निर्माण कर रहा है। नेपाल में भी चीन अपनी पैठ बनाने में जुट गया है। चीन के इस तरह के कदमों से क्षेत्रीय शांति की कोशिशों को धक्का पहुंचता है। कूटनीतिक, सामरिक, कारोबारी या फिर अन्य किसी भी नजरिए से देखें, साफ है कि चीन भारत को घेर कर उसे दबाव में रखना चाहता है, ताकि उपमहाद्वीप में उसका प्रभाव न बढ़ पाए। सीमा विवाद जैसी घटनाओं से चीन का दोहरा चरित्र उजागर होता है। एक तरफ तो चीन भारत से अच्छे संबंधों का हवाला देता है, और दूसरी ओर, ऐसी नापाक हरकतें और साजिशें रचता जो संबंधों में मधुरता की तमाम संभावना पर पानी फेर देती हैं।
इसके अलावा चीन पाकिस्तान को खुली मदद डेक्ट है जिससे कि पाकिस्तान भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ा सके। कश्मीर में भी चीन पाकिस्तान की हर संभव मदद करता है।
अब सवाल यह उठता है कि हम क्या करते हैं। हम चीन को 100 रुपये देकर 10 रुपये कमाते हैं और चीन की नापाक हरकतें भी सहते हैं। सबसे बड़ा सवालिया निशान हमारी विदेशीनीति पर उठता है। हम एक और चीन का बहिष्कार कड़ते हैं दूसरी और हमारे प्रधानमंत्री वहां जाकर समझौतों पर दस्तखत करके आते हैं।
वो भारत में रहकर चीनी माल के बहिष्कार की बात तो करते हैं, भीड़ को उकसाते हैं। पर चीन जाकर चीन की कंपनियों के साथ कारोबार पर सहमति बनाकर आते हैं।
हमें यही नहीं पता कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? हमारी देशभक्ति का दिखावा भी चीनी माल की ही तरह है चला तो लंबे समय तक नहीं चला तो….?
आप मुझे इस आर्टिकल पर गालियां दीजिये या तारीफ करिये, लेकिन जो हालात हैं वो जल्द बदलने वाले नहीं।
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Manish Kumar
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