
आप सोच रहे होंगे कि ये लिख क्या रहा है.. एक तरफ आज देश गणतंत्र दिवस के मौके पर देशभक्ति में डूबा है, हर कोई देशभक्ति की बीन बजा रहा है और इस मनीष पाखंडी को देखो ये सुबह सुबह भारत माता की जय बोलने के बजाय ऊंट प टांग बात कर रहा है। सही कहा “मैं भी बोले देता हूँ भारत माता की जय” क्योंकि एक माँ मर गयी
एक महिला इसलिये मर गयी क्योंकि उसने पिछले 5 दिनों से कुछ नहीं खाया था। पति मजदूरी करता था लेकिन 2 महीनों से वो अपने घर पैसे नहीं भेज पाया। तंगहाली इस परिवार पर इस कदर आ गयी कि महिला अपनी तीन बेटियों को छोड़ तड़प-तड़प कर मर गयी।
गणतंत्र दिवस पर जब राष्ट्रपति देश में प्रत्येक जान को सुरक्षित रखने का आश्वासन दे रहे थे। देश के प्रधान सेवक पूरे देश के सामने बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे तब मुरादाबाद में एक महिला पाँच दिन से भूखी रहने के कारण मर गई। इस सूचना से प्रशासन में हड़कंप तो मचा लेकिन वह इस मौत को भूख से हुई मौत स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जबकि पास-पड़ोस के लोगों का कहना है कि चार पाँच दिन से बच्चों ने कुछ नहीं खाया था।
अमीर का पति पुणे में मजदूरी करता है। वह चाय – बिस्कुट का ठेला लगाता है। उसकी पत्नी अमीर जहां (34) अपनी तीन बेटियों तबस्सुम (14), रहनुमा (12) और मुस्कान (10) के साथ रहती थी।
ढाई महीने से अमीर का पति यूनुस घर नहीं आया था। जिसकी वजह से घर में फाके की नौबत थी।
बच्चियों ने बताया कि वो पिछले 5 दिनों से वो भूंख से तड़प रही थी लेकिन जब पड़ोसियों ने हमें रोते देखा तो ख़ाना दिया लेकिन माँ ने नहीं खाया, जब उनकी सांसे उखड़ने लगी तब गुरुवार पूर्वाह्न पड़ोसियों की मदद से बेटियां उसे जिला अस्पताल ले गईं। लेकिन डेढ़ घंटा के भीतर ही अमीर ने दम तोड़ दिया।” और इस तरह वो भूख से अलविदा कह इस दुनिया से रुखसत हो गयी।
गनीमत यह रही कि वो मुस्लिम थी.. चलो अच्छा हुआ एक मुसलमान कम हुआ। मुस्लिमों के साथ ऐसा ही होना चाहिए..। यहां इस देश के मुसलमान खत्म होने चाहिए।
क्योंकि हम हिन्दू हैं और बेहद सम्पन्न हैं…. संपन्नता से याद आया झारखंड में एक आदिवासी मासूम बच्ची भात कहते-कहते मर गयी… लेकिन उसको भात नहीं मिल पाया वो हिन्दू आदिवासी थी.. उसकी माँ राशन लेने के लिए भी गयी लेकिन वो इतनी गरीब थी कि राशन भी न ले पायी।
हम एक महान देश में रह रहे हैं जहां पर अब सब सम्पन्न हैं। सबके पास अपार धन दौलत है। क्योंकि यहाँ पर सबके पास कोई न कोई रोजगार है और उस रोजगार से वो पकौड़े तलकर रोजाना 200 रुपये अपने घर ले जाता है। लेकिन कुछ बेशर्म उस 200 रुपये का ब्रेकप बताना भूल जाते हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि 200 रुपये में घर कैसे चलाएगा? उस 200 रुपये में वो क्या-क्या करेगा? उस 200 रुपये में से कितने पैसे बचाएगा?
कुछ बेशर्म यह भी बताना भूल गए कि 9 नवंबर 2016 से पहले बहुत सारी फैक्ट्रियां हुआ करती थीं जिन फैक्ट्रियों के पास पकौड़े बिकते थे लेकिन आजकल फैक्ट्रियां भी तेजी से बंद हो रही हैं… तो अब आप सोच रहे होंगे कि पकौड़े वालों का क्या हुआ.. होगा क्या.. अरे आबादी कम होगी और क्या होगा.. गरीबी दूर होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए.. बोलो भाइयो बहनों….
चाहे जैसे दूर हो.. बस गरीबी मिटनी चाहिए…. जैसे वो आदिवासी मासूम भात कहते-कहते मर गयी… वैसे वो हिन्दू आदिवासी बच्ची थी लेकिन हम अनुसूचित जाति या अनुसूची जनजाति को हिन्दू मानते कहाँ हैं तो हम चैन की सांस लेकर कह सकते हैं कि अच्छा है वो भी कम हुई.. अभी और मरने चाहिए.. 1-2 से क्या होगा… क्यों?
वैसे संवेदना हैं कि नहीं या वो भी कहीं किसी के पास गिरवीं रख दी हैं। खैर आप सोच नहीं सकते, सोच आपकी खत्म हो चुकी है.. आप स्वतन्त्र हैं गालियां दे सकते हैं। क्या पता आपकी गालियों से गब्बर सिंह खुश हो जाये और बदले में आपको गोली न मारे..।
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मनीष कुमार
ख़बर 24 एक्सप्रेस
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