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जब मुखिया ही चोर हो जाये, वरिष्ठ पत्रकार एस.एन विनोद की कलम से

 

 

सन1975! आपातकाल लागू होने के कुछ माह बाद।
आज उस दिन की यादें मन बेचैन कर रही हैं। लेखक-पत्रकार-सांसद, अग्रज-तुल्य शंकर दयाल सिंह ने अपने और अपने पिता, स्व. कामता प्रसाद सिंह ‘काम’ की कर्मभूमि देव (औरंगाबाद,बिहार) में ‘कामता सेवा केंद्र’, के उद्द्घाटन का कार्यक्रम रखा था। कांग्रेस के एक नेता पशुपतिनाथ सिंह और मित्र विजय प्रताप सिंह के साथ मैं राँची से कार्यक्रम में देव गया था। शंकर दयाल जी का विशेष आग्रह था। तब केंद्रीय मंत्री, भारतीय राजनीति और कांग्रेस के एक दबंग नेता, जगजीवन राम के कर-कमलों से उद्द्घाटन हुआ। उद्द्घाटन पश्चात सार्वजनिक सभा में जगजीवन बाबू के संबोधन की याद आ रही हैं।
ध्यान रहे तब आपातकाल था। इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता! समाज, राजनीति, पत्रकारिता और साहित्य में कामता बाबू और शंकर दयाल जी के योगदान, ग्रामीण देव में कामता सेवा केन्द्र की स्थापना का महत्व आदि की चर्चा पश्चात जगजीवन बाबू देश की तत्कालीन राजनीतिक अवस्था, पूरे देश में तब व्याप्त संशय पूर्ण, भययुक्त वातावरण की चर्चा करने लगे। आपातकाल से भयभीत,हजारों की ध्यानमग्न भीड़ की तंद्रा तब टूटी जब जगजीवन बाबू ने अपरोक्ष में आपातकाल और इंदिरा गांधी को निशाने पर लेना शुरू किया। भाषण के दौरान अपने खास अंदाज में जगजीवन बाबू ने गांव के मुखिया की जिम्मेदारी चिन्हित करते हुए कहा था कि,”…..

पहले मुखिया सुबह-शाम पूरे गांव का चक्कर लगाया करते थे। एक-एक घर को देखा करते थे कि घर से धुआं निकल रहा है या नही? अर्थात घर में चूल्हा जला है या नहीं? यदि किसी घर में चूल्हा नहीं जला तो क्यों? कारण पता कर मुखिया व्यवस्था करता था, सुनिश्चित करता था कि उस घर में भी चूल्हा नियमित जले।

 

“मुख शब्द से बना है मुखिया। मुख से हम खाना खाते हैं। ..अगर मुख चोर बन अन्न का एक दाना भी चुरा कर दाँतों में छुपा ले, तो मुख से दुर्गंध आने लगती है।…ऐसे में सोचिए, जब एक मुख की जगह पूरा का पूरा मुखिया ही चोर हो जाये तब कितना दुर्गंध फैलेगा?….आज देश भर में दुर्गंध फैल चुका है….!”

संदेश साफ था।लोगों के बीच संदेश ने अपनी पैठ बना ली थी।इंदिरा गांधी और आपातकाल के विरुद्ध जगजीवन बाबू की बगावत का संकेत था देव में दिया गया उनका भाषण।बाद में सच साबित हुआ भी।
सार्वजनिक सभा के बाद समीपस्थ रानीगंज डाकबंगले में शंकरदयाल जी सहित विश्वस्त लोगों के साथ भोजन और चर्चा!मुझे भी भाग लेने का सौभाग्य।पत्रकारों में टाइम्स ऑफ इंडिया के जितेंद्र सिंह भी मौजूद थे।तभी तय हो गया था कि जगजीवन बाबू और समान विचार वाले कांग्रेसी आपातकाल के खिलाफ बिगुल फूंकेंगे।
बहरहाल, स्मरण और आंशिक रुप से ही सही, प्रासंगिक जगजीवन बाबू के भाषण की।

चोर मुख, चोर मुखिया और दुर्गन्धमय देश!
ओह! तब पूर्ण और आज की सीमित दुर्गंध!!

 

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Senior Journalist Mr. SN Vinod


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