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जलवायु परिवर्तन को लेकर मोदी के मास्टरस्ट्रोक में फंसा अमेरिका, ना उगला जाए ना निगला जाए, अब ट्रम्प के झूंठ की हो रही देश दुनिया में आलोचना

 

 

2015 के पेरिस जलवायु समझौते से हाथ खींचने के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले से अमेरिकी कोयला खनन कारोबारी बेहद खुश हैं, लेकिन अक्षय ऊर्जा के समर्थन में एक बड़ा धड़ा इस कदम की घोर निंदा कर रहे हैं।

भारत पर ट्रम्प के मनगढ़त आरोपों का अब सच पूरी दुनिया के सामने आ ही गया और हर और ट्रम्प की आलोचना भी हो रही है। आपको बता अमेरका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रदुषण फ़ैलाने वाला देश है, अगर वो इस समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है तो सबसे ज्यादा नुकसान भी अमेरिका का ही होता क्योंकि उसको अपने यहाँ से प्रदुषण कम करने के लिए वैश्विक दबाव का सामना करना पड़ता और अपने वो सभी संयंत्र बंद करने पड़ते जिनसे सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता हो।

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पैरिस क्लाइमेट डील की आलोचना करते हुए ऐलान किया कि उनका देश अब इस समझौते का हिस्सा नहीं होगा। ट्रंप का कहना है कि यह डील अमेरिका के हित में नहीं है। इस डील से अमेरिका को अलग करने का ऐलान करते हुए ट्रंप ने भारत के खिलाफ भी कई बातें कहीं। भारत को निशाने पर लेते हुए ट्रंप ने कई आरोप भी लगाए।

भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के तेज़ दिमाग से कैसे फंसे ट्रंप:
सबसे अहम बात तो यह है कि ट्रंप भले ही पैरिस क्लाइमेट डील का कितना भी विरोध कर लें, लेकिन वह फिलहाल अमेरिका को इस समझौते से अलग नहीं कर सकते हैं। इसके लिए ट्रंप को 4 नवंबर 2020 तक इंतजार करना होगा, जबकि अमेरिका में अगला राष्ट्रपति चुनाव 3 नवंबर 2020 को होना है। इस लिहाज से ट्रंप अगर अमेरिका को सचमुच इस डील से अलग करना चाहते हैं, तो इसके लिए उन्हें अगली बार भी चुनाव जीतना होगा। साथ ही, ट्रंप इस समझौते की नियमों और शर्तों को भी नहीं बदल सकते हैं। ऐसा करने के लिए उन्हें इस संधि में शामिल बाकी 194 देशों को राजी करना होगा, जो कि फिलहाल किसी भी कीमत पर मुमकिन नहीं लगता।

ट्रंप ने अपने भाषण में न केवल भारत पर गलत आरोप लगाए, बल्कि कई अन्य मुद्दों पर भी उन्होंने गलत तथ्य दिए। ट्रंप ने क्या-क्या गलत कहा और उनके आरोपों-दावों का सच क्या है, यह हम आपको नीचे बता रहे हैं।

ट्रंप का बयान: भारत पैरिस समझौते में बने रहने के लिए ‘बिलियन्स ऐंड बिलियन्स ऐन्ड बिलियन्स ऑफ डॉलर’ की विदेशी सहायता लेता है।
सच: ट्रंप का यह आरोप गलत है। 2015 में भारत को लगभग 3.1 बिलियन डॉलर (लगभग 2 खरब रुपये) की विदेशी सहायता मिली। इसमें से अमेरिका ने 100 मिलियन डॉलर (करीब साढ़े 6 अरब रुपये) की राशि भारत को दी। 2018 के लिए इस राशि को घटाकर 34 मिलियन (लगभग 2 अरब रुपये) कर दिया गया है। भारत अमेरिका से सालाना खरबों रुपये का आयात करता है। भारत हर साल करीब 100 मिलियन डॉलर (लगभग साढ़े 6 अरब) मूल्य के कैलिफॉर्निया बादाम अमेरिका से आयात करता है। इसके अलावा भारत बड़ी मात्रा में अमेरिका से हथियार भी खरीदता है।

ट्रंप ने कहा कि ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) करीब 100 बिलियन डॉलर (करीब साढ़े 64 खरब रुपये) है।
लेकिन सच कुछ और ही है GCF की यह राशि मात्र 10.3 बिलियन डॉलर (7 खरब रुपये) ही है।

ट्रंप का बयान: अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा था कि वह दोबारा अपनी शर्तों पर पैरिस समझौते में शामिल होंगे।
सच: उनका यह दावा भी झूठा है। आपको बता दें कि पैरिस समझौते पर कुल 195 देशों ने सहमति जताते हुए हस्ताक्षर किए थे। केवल एक देश (अमेरिका) के चाहने पर इसकी शर्तें और प्रावधान नहीं बदली जा सकती हैं। साथ ही, कई अन्य देशों ने इस संधि को बरकरार रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है। ट्रंप के रुख का इन देशों ने विरोध भी किया है।

ट्रम्प ने सबसे ज्यादा हमला भारत और चीन पर ही किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन ने अपने यहां सैकड़ों कोयले के प्लांट्स को लगाने की इजाजत दी।
लेकिन उनका यह आरोप भी गलत साबित हुआ। पिछले कुछ समय से चीन लगातार कोयले के प्लांट्स को कम करने की कोशिश कर रहा है। दुनियाभर के कई पर्यावरण विशेषज्ञों ने कोयले पर निर्भरता को कम करने के लिए भारत और चीन के प्रयासों की काफी प्रशंसा भी की है।
पैरिस समझौते के नियमों और प्रावधानों के मुताबिक, ट्रंप चाहकर भी फिलहाल अमेरिका को इस डील से बाहर नहीं कर सकते हैं। ट्रंप नवंबर 2019 से पहले पैरिस डील से अमेरिका के बाहर होने संबंधी नोटिस नहीं दे सकते। अमेरिका आधिकारिक तौर पर 4 नवंबर 2020 से पहले खुद को इस समझौते से अलग नहीं कर सकता है। मालूम हो कि अमेरिका में अगला राष्ट्रपति चुनाव 3 नवंबर 2020 को होना है। इस सूरत में अमेरिका को पैरिस समझौते से अलग करने के लिए जरूरी होगा कि ट्रंप दोबारा चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनें।


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