
नागपुर : शहर के दिल कहे जाने वाले सीताबर्डी मार्केट में सालों से छोटे फुटपाथ विक्रेता अपने परिवार का पेट पालने के लिए मेहनत कर रहे हैं। लेकिन अब नागपुर महानगरपालिका (NMC) इन्हीं गरीब विक्रेताओं को जबरन हटाने की कार्रवाई कर रही है — वो भी उस स्थान से, जहां पर पहले से ही अदालत ने स्टे ऑर्डर (स्थगन आदेश) दिया हुआ है।
हॉकर्स (फुटपाथ विक्रेताओं) ने 2016 में इस अन्याय के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी, जिस पर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने साफ-साफ स्टे दिया था। फिर आज 2025 में वही प्रशासन अदालत के आदेश की अनदेखी कर विक्रेताओं को बेदखल कर रहा है। सवाल यह है — क्या कानून सिर्फ ताकतवरों के लिए है?

अदालत का आदेश क्या कहता है?
2016 में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने स्पष्ट आदेश दिया था कि:
* 7 मार्च 2016 के पहले और बाद में जो भी हटाने की कार्यवाही की गई है, उस पर सफाई से हलफनामा प्रस्तुत किया जाए।
* जब तक अदालत अंतिम फैसला न दे, तब तक कोई भी जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इसका मतलब यह है कि जब तक अदालत से अनुमति नहीं मिलती, तब तक किसी भी फुटपाथ विक्रेता को उनकी जगह से हटाया नहीं जा सकता। लेकिन वास्तविकता इससे बिलकुल विपरीत है — नगर निगम स्वयं अदालत के आदेश की धज्जियाँ उड़ा रहा है।
कहाँ भेजा जा रहा है हॉकर्स को — मौत के मुंह में?
हॉकर्स को जो वैकल्पिक स्थान दिया गया है, वह नागपुर-अमरावती हाइवे के किनारे स्थित है। यह क्षेत्र ट्रैफिक की दृष्टि से अत्यंत खतरनाक है। वहाँ कोई मार्केट नहीं है, न ही ग्राहकों की आवाजाही, और न ही सुरक्षा की कोई गारंटी।
एक महिला विक्रेता का कहना है कि “वहां बैठना मतलब जान हथेली पर लेकर बैठना। न ग्राहक आते हैं, न बिक्री होगी, ऊपर से एक्सीडेंट का खतरा बना रहेगा”
ग्लोकल मॉल — इस पूरे षड्यंत्र के पीछे क्या कोई दबाव है?
हॉकर्स का कहना है कि सीताबर्डी मार्केट में ही सामने हाल ही में बने “ग्लोकल मॉल” को पार्किंग की जरूरत है। मॉल के बाहर जो फुटपाथ है, वह पार्किंग में बदला जाना है। इसलिए पहले से वहां रोजी-रोटी कमा रहे हॉकर्स को जबरदस्ती हटाया जा रहा है।
सवाल यह है — अगर अतिक्रमण हटाने का कारण ट्रैफिक है, तो क्या वहां बनने वाली पार्किंग से गाड़ियाँ नहीं खड़ी होंगी? क्या वो ट्रैफिक को प्रभावित नहीं करेंगी? अगर नहीं, तो फिर सिर्फ गरीब विक्रेताओं को ही क्यों हटाया जा रहा है?
“हमारे घर का चूल्हा बंद हो गया है” — हॉकर्स की व्यथा
“हम कई सालों से यहां बैठकर अपना छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हैं। इससे ही बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन, दवाइयाँ, सब चलता था। अब तो जैसे सब कुछ छिन गया है। नगर निगम जब चाहे आता है, सामान उठाकर ले जाता है। हमारे पास कोई ठिकाना नहीं। अदालत का आदेश भी हमारे पक्ष में है, लेकिन फिर भी हमें हटाया जा रहा है।”
“निष्कर्ष: न्याय सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे”
सीताबर्डी के हॉकर्स सिर्फ गरीब लोग नहीं हैं — वे मेहनती नागरिक हैं, जो बिना किसी सरकारी सहायता के अपने दम पर जीवन चला रहे हैं। उन्हें हटाना न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि नैतिक रूप से भी अमानवीय है।
इस पूरे मामले में यह स्पष्ट दिखता है कि:
* अदालत के “स्टे ऑर्डर” की अवहेलना हो रही है।
* विकल्प के नाम पर जानलेवा जगहें दी जा रही हैं।
* और शायद कुछ बड़े कॉर्पोरेट या मॉल के हितों को साधा जा रहा है।
ऐसे में यह जरूरी है कि मीडिया, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएं। अदालत के आदेश का सम्मान किया जाए, और हॉकर्स को उनकी रोजी-रोटी से बेदखल न किया जाए।

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