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Pune Porsche Case: मौत के बाद भी जमानत, क्या कानून रसूख के आगे बेबस पीड़ित परिवार?

Pune Porsche Case | Crime Story | Maharashtra News | Bureau Report Akash Dhake | Khabar 24 Express


हमारे देश में हर दिन सड़क हादसों में लोग मरते हैं, लेकिन सवाल यही है—क्या मौत के बाद भी इंसाफ इतना सस्ता है? पुणे का पोर्श हादसा एक बार फिर सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है।

2024 में दो आईटी प्रोफेशनल्स की मौत के इस चर्चित मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को जमानत दे दी है। कोर्ट ने माता-पिता की जिम्मेदारी पर कड़ी टिप्पणी जरूर की, लेकिन क्या सिर्फ टिप्पणी से इंसाफ पूरा हो जाता है? आइए समझते हैं पूरा मामला।

18 और 19 मई 2024 की दरम्यानी रात पुणे शहर में एक तेज रफ्तार पोर्श कार कहर बनकर टूटी। करीब तीन करोड़ रुपये की इस कार को 17 साल का नाबालिग चला रहा था। तेज स्पीड में कार ने एक बाइक को टक्कर मार दी।

टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बाइक सड़क पर काफी दूर तक घिसटती चली गई और उस पर सवार दो आईटी प्रोफेशनल्स की मौके पर ही मौत हो गई।

हादसे के बाद देशभर में गुस्सा फूट पड़ा, जब सिर्फ 14 घंटे में नाबालिग आरोपी को शर्तों के साथ जमानत मिल गई। कोर्ट ने उसे ट्रैफिक पुलिस के साथ काम करने और सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखने का आदेश दिया।

जैसे ही मामला तूल पकड़ने लगा, जमानत रद्द हुई और नाबालिग को ऑब्जर्वेशन होम भेजा गया, लेकिन जून 2024 में हाई कोर्ट ने उसकी रिहाई का आदेश दे दिया।

इस केस में असली सनसनी तब फैली जब ब्लड सैंपल बदलने का आरोप सामने आया। आरोप है कि पैसे के दम पर मेडिकल रिपोर्ट से छेड़छाड़ की गई, ताकि नाबालिग को बचाया जा सके।

इसी मामले में कुल 10 लोगों को जेल भेजा गया, जिनमें नाबालिग के माता-पिता, डॉक्टर, अस्पताल का कर्मचारी और बिचौलिए भी शामिल थे।

अब इस मामले में Supreme Court of India ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अमर संतोष गायकवाड़, आदित्य अविनाश सूद और आशीष सतीश मित्तल को जमानत दे दी है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि बच्चों को कार की चाबियां और खुला पैसा देना अस्वीकार्य है और ऐसे मामलों में माता-पिता की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

इससे पहले दिसंबर 2024 में Bombay High Court ने इन आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा और अब तीनों को राहत मिल गई है।

सबसे बड़ा सवाल यही है दो लोगों की मौत के बाद भी क्या जमानत ही सबसे बड़ा जवाब है? क्या पैसे, पावर और पहचान के आगे कानून कमजोर पड़ जाता है? और क्या ऐसे फैसले भविष्य में सड़क सुरक्षा और जवाबदेही को और कमजोर नहीं करते?

पुणे पोर्श हादसा सिर्फ एक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की हकीकत दिखाने वाला आईना है। सवाल यह नहीं कि जमानत मिली या नहीं, सवाल यह है कि क्या मरने वालों को कभी पूरा इंसाफ मिलेगा?


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