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इंजीनियर की मौत: युवराज मरा नहीं, सिस्टम ने मारा; हादसे की गंभीरता नहीं समझ पाए अधिकारी, और फिर जो हुआ

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ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 के पास हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर हाईटेक कहे जाने वाले शहरों की आपात व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत अब सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की प्रतीक बनती जा रही है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय तालमेल की कमी सामने आ रही है।

बीते शुक्रवार रात सेक्टर-150 में एक बिल्डर प्रोजेक्ट के गड्ढे में भरे पानी में युवराज की कार गिर गई थी। हादसा रात करीब 12 बजे हुआ, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया। बताया जा रहा है कि युवराज करीब दो घंटे तक कार में फंसे रहे और मदद का इंतजार करते रहे। उनके पिता भी मौके पर मौजूद थे और रेस्क्यू की उम्मीद लगाए बैठे रहे, लेकिन हालात नहीं बदले।

मौके पर अफसर नहीं, संसाधन भी नदारद

हादसे के समय पुलिस और दमकल विभाग की टीमें मौके पर पहुंच चुकी थीं, लेकिन उनके पास ऐसा कोई साधन नहीं था, जिससे पानी में डूबी कार तक पहुंचा जा सके। न टायर, न ट्यूब और न ही तत्काल पानी में उतरने की व्यवस्था। वरिष्ठ स्तर का कोई अधिकारी भी मौके पर नहीं पहुंचा, जिससे हालात का सही आकलन कर त्वरित फैसला लिया जा सके।

एसडीआरएफ और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) को बुलाने की बात तो हुई, लेकिन टीम समय पर नहीं पहुंच सकी। जब तक रेस्क्यू के पुख्ता इंतजाम होते, तब तक युवराज की जान जा चुकी थी। तीन दिन बाद एनडीआरएफ ने कार को पानी से बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

विभागीय तालमेल की भारी कमी

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस, प्रशासन और प्राधिकरण के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आई। किसी भी विभाग ने नेतृत्व की भूमिका नहीं निभाई। न जिला प्रशासन की ओर से डीएम स्तर का कोई अधिकारी पहुंचा, न ही पुलिस के वरिष्ठ अफसरों ने मौके पर कमान संभाली। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते सही निर्णय लिया जाता और अधिकारी मौके पर मौजूद होते, तो शायद युवराज को बचाया जा सकता था।

अगले दिन भी नहीं ली गई घटना की गंभीरता

सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि हादसे के अगले दिन भी किसी उच्च अधिकारी ने मौके पर पहुंचना जरूरी नहीं समझा। जब यह मामला सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, तब तीसरे दिन अफसर सक्रिय नजर आए। इसके बाद विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते दिखे।

हाईटेक शहर, लेकिन बदहाल व्यवस्था

नोएडा की टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी के निवासी युवराज मेहता की मौत ने तथाकथित हाईटेक जिले की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की पोल खोल दी है। लोगों में पुलिस, प्रशासन और प्राधिकरण के प्रति गहरा रोष है। आम सवाल यही है कि जब राजधानी से सटे शहरों में ऐसी स्थिति है, तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा?

यह मामला अब सिर्फ एक इंजीनियर की मौत तक सीमित नहीं है। यह उस सिस्टम पर सवाल है, जो वक्त पर फैसला नहीं ले सका, संसाधन नहीं जुटा सका और एक युवा की जान बचाने में असफल रहा। जनता की नजर अब जांच पर टिकी है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।


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