मनीष कुमार अंकुर, नई दिल्ली : आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 साल के हो गए हैं। जैसे ही यह उम्र पूरी हुई, एक बार फिर वही बहस तेज़ हो गई है – क्या 75 साल की उम्र के बाद नेताओं को सक्रिय राजनीति से हट जाना चाहिए? क्या प्रधानमंत्री मोदी इस पर अपने बनाए अनौपचारिक नियम का पालन करेंगे, या यह केवल राजनीतिक चर्चा तक सीमित रह जाएगा?
यह मुद्दा सिर्फ भाजपा के भीतर की चर्चा नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के लिए भी सवाल खड़ा कर रहा है। कई विपक्षी नेता सीधे तौर पर मोदी से यह पूछ रहे हैं कि क्या वे 75 साल की उम्र पूरी होने के बाद सत्ता छोड़ेंगे या नहीं।
75 साल में रिटायर – भाजपा में पुरानी बहस

भाजपा में 75 वर्ष की उम्र के बाद नेताओं के रिटायर होने की चर्चा कोई नई नहीं है। लगभग एक दशक से यह सवाल बार-बार उठता रहा है। खासतौर पर तब, जब कोई बड़ा नेता इस उम्र को पार करता है। इस बहस की शुरुआत 2014 के आम चुनाव से पहले हुई थी, जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था।
उस समय पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं, जैसे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और विनय कटियार को यह डर था कि मोदी को पूरी स्वतंत्रता मिलने से उनकी भूमिका सीमित हो जाएगी। तब एक तर्क सामने आया कि नेताओं को 75 की उम्र के बाद पद छोड़ देना चाहिए ताकि पार्टी में युवाओं को मौका मिल सके।
लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह नियम पार्टी के संविधान में कहीं लिखा नहीं है। भाजपा ने इसे कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। वरिष्ठ नेताओं ने ऑफ द रिकॉर्ड पत्रकारों से इस बारे में चर्चा की और धीरे-धीरे यह एक राजनीतिक नैरेटिव बन गया।
मार्गदर्शक मंडल – सम्मानजनक तरीके से किनारे किए गए नेता
2014 के बाद आडवाणी, जोशी और अन्य वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से अलग करने के लिए ‘मार्गदर्शक मंडल’ में शामिल कर दिया गया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज तक इस मंडल की कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई। यानी यह एक प्रतीकात्मक कदम था, न कि वास्तविक सत्ता से दूरी बनाने का आदेश।
आनंदीबेन पटेल ने स्वीकारा – लेकिन नियम बना नहीं
सबसे पहले भाजपा में 75 वर्ष की उम्र पर बात सार्वजनिक तौर पर गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने 2016 में कही। उन्होंने कहा था –
“मैं भी नवंबर में 75 की हो जाऊँगी। पार्टी में इससे ऊपर उम्र वाले नेता स्वेच्छा से पद छोड़ रहे हैं ताकि युवाओं को मौका मिले। यह एक अच्छी परंपरा है।”
लेकिन इसके बाद इस नियम का पालन हर मामले में नहीं हुआ। कई नेताओं ने उम्र की परवाह किए बिना नेतृत्व जारी रखा। इससे साफ है कि यह नियम एक ‘सॉफ्ट गाइडलाइन’ है, जिसे परिस्थिति के अनुसार लागू या न लागू किया जाता है।
विश्लेषण – क्या यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने इसे उन नेताओं के लिए अपनाया, जिन्हें सम्मानपूर्वक राजनीति से अलग करना था। इसे औपचारिक नियम के रूप में नहीं बल्कि रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इसलिए आज सवाल उठ रहा है – क्या यह नियम सिर्फ आडवाणी और जोशी जैसे नेताओं तक सीमित था, या अब इसे सभी पर लागू किया जाएगा?
अब जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद 75 साल के हो चुके हैं, तो यह सवाल और भी बड़ा बन गया है। क्या वे खुद इसे मानेंगे? क्या वे नेतृत्व युवाओं को सौंपेंगे? या यह नियम केवल कुछ चुनिंदा नेताओं के लिए था?
भाजपा का भविष्य – नेतृत्व की दिशा तय करेगी यह बहस
यह बहस सिर्फ मोदी या भाजपा तक सीमित नहीं है। यह पार्टी की भविष्य की दिशा, नेतृत्व की निरंतरता, युवाओं को अवसर और राजनीतिक रणनीति से जुड़ा बड़ा सवाल है। आने वाले दिनों में तय होगा कि यह नियम एक परंपरा बनेगा या केवल एक राजनीतिक औजार रह जाएगा।
अगर आपको यह खबर पसंद आई हो और आप राजनीति से जुड़ी हर बड़ी खबर सबसे पहले देखना चाहते हैं, तो अभी हमारे पोर्टल को सब्सक्राइब करें। साथ ही बेल आइकन दबाना न भूलें ताकि नई खबरों की नोटिफिकेशन सबसे पहले आपके पास पहुंचे।
आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है – कमेंट में बताइए कि क्या पीएम मोदी को अपने बनाए नियम का पालन करना चाहिए या नहीं। हम आपके विचारों का स्वागत करते हैं!
Bureau Report, Exclusive Article : Manish Kumar Ankur
Discover more from Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network Khabar 24 Express brings the latest Hindi News, Breaking News, Live TV, India News, Maharashtra News, Nagpur News, Politics, Crime, Business, Sports, Entertainment, Technology, Auto, Health, Education, Lifestyle and World News with fast, accurate and trusted updates 24×7