मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का मामला सामने आया है।
आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद यह खुलासा हुआ कि ‘साइंस हाउस’ नाम की एजेंसी को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी की गई।
आरोप है कि सरकारी टेंडर में प्रतिस्पर्धा रोकने और मनमर्जी से काम देने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दरकिनार किया गया।

कैसे हुआ खेल?
करीब पाँच साल पहले मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अपनी पसंदीदा एजेंसी ‘साइंस हाउस’ को टेंडर देने के लिए सारे नियमों को किनारे कर दिया।
- पहला टेंडर (2018):
- 28 जिला अस्पतालों में 64 प्रकार की जांच का काम।
- छह कंपनियाँ शामिल हुईं, लेकिन सिर्फ चार ने तकनीकी योग्यता पूरी की।
- साइंस हाउस ने सबसे कम दर पर 76% तक छूट देने का प्रस्ताव दिया।
- फिर भी टेंडर “प्रशासनिक कारण” बताकर रद्द कर दिया गया।
- दूसरा टेंडर (2019):
- सिर्फ दो कंपनियों को मौका दिया गया।
- बाकी कंपनियों को तकनीकी प्रमाणपत्र जैसे बहाने से बाहर कर दिया गया।
- इस बार साइंस हाउस ने सिर्फ 31% छूट देकर काम ले लिया।
- यानी पहले की तुलना में ढाई गुना ज्यादा दर पर काम सौंपा गया।
- प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए शर्तें:
- यूएसएफडीए सर्टिफिकेट जैसे बहाने।
- अतिरिक्त दस्तावेज मांगकर कंपनियों को बाहर करना।
- शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।
तीसरा टेंडर और विस्तार

साल 2023 में तीसरा टेंडर भी साइंस हाउस को ही मिला। आरोप है कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने दबाव डालकर टेंडर दिलवाया। आज यह कंपनी प्रदेश के 84 अस्पतालों और करीब 1800 केंद्रों में सैंपल कलेक्शन और टेस्टिंग का काम कर रही है।
हर महीने 15 से 16 करोड़ रुपये का भुगतान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) द्वारा किया जा रहा है, जो सालाना 180 से 200 करोड़ रुपये तक पहुँचता है।
नियमों की अनदेखी के अन्य उदाहरण
- एनएबीएल प्रमाणपत्र बिना भुगतान:
सिर्फ 30 से 34 अस्पतालों में ही प्रमाणित लैब होने के बावजूद करोड़ों का भुगतान किया गया। - जीएसटी में गड़बड़ी:
छूट मिलने के बावजूद करोड़ों का जीएसटी क्लेम कर लिया गया। इसमें स्पष्ट नहीं है कि यह रकम सरकार को जमा की गई या नहीं। - टेंडर एक्सटेंशन में भी खेल:
मई 2025 में टेंडर समाप्त होने के बाद जुलाई 2025 में एक साल का विस्तार दिया गया। नियमों के अनुसार यह प्रक्रिया छह महीने पहले शुरू होनी चाहिए थी।
हर कदम पर नियमों को दरकिनार कर करोड़ों का खेल खेला गया।

क्या यह सिर्फ अधिकारियों की मिलीभगत है?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मामला केवल कुछ भ्रष्ट अधिकारियों तक सीमित है या इसके पीछे व्यापक स्तर पर साजिश चल रही है। क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
स्वास्थ्य विभाग ने साइंस हाउस से जवाब मांगा है और जांच शुरू कर दी है। आगे की कार्रवाई पर सबकी नज़रें टिकी हैं।
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