
इस योग विषय पर स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी इस प्रकार से कहते है कि,
सिद्धासिद्ध महामंत्र “सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईँ फट् स्वाहा” में सम्पूर्ण सनातन धर्म और चारों वेद एक सो आठ उपनिष्दो का सम्पूर्ण दर्शन है– वेद कहते है कि इस सृष्टि के उतपत्ति के आरम्भ में ना कोई सत् ना असत् था कुछ भी नही था अर्थात शुन्य था उस शून्य यानि ब्रह्म में हलचल हुई और उस एक ब्रह्म से एकोबहुस्याम अर्थात एक से अनेक हो जाऊ ये सङ्कल्प हुआ और उस ब्रह्म के इस सङ्कल्प से ये स्त्री पुरुष और बीज रूपी सृष्टि का निर्माण हुआ और ब्रह्म से चार वेद उतपन्न हुए उन चारो वेदों से 108 उपनिषिद् रूपी मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म कर्तव्यों का ज्ञान प्रसारित हुआ जो सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईँ फट् स्वाहा में सम्पूर्ण रूप से इस प्रकार प्रकट है की इस सृष्टि के आरम्भ से पूर्व जो सत् यानि पुरुष और असत् यानि स्त्री अपनी बीजवस्था यानि बीज जो शून्य स्वरूप कहा गया है उस शुन्य यानि स्त्री+पुरुष की एकाकार प्रेम अवस्था का वर्णन है जब दोनों प्रेम में एकाकार थे तब केवल प्रेम ही शेष था और यही प्रेम की एकाकार अवस्था का नाम ही वेदों का एक या अद्धैत ब्रह्म कहलाता है इसी प्रेम अवस्था को ही सभी धर्मो में लव इज गॉड यानि प्रेम ही मूल ईश्वर है या ईश्वर ही प्रेम है और सभी इस प्रेम या ईश्वर से उतपन्न हुये है क्योकि जब स्त्री+पुरुष के बीच प्रेम ही शेष होगा तब स्त्री पुरुष का भेद खत्म हो जाता है तब केवल प्रेम ही सम्पूर्ण होकर शेष बचता है और यही प्रेम सृष्टि के आरम्भ में था और उस प्रेम यानि शून्य में हलचल हुयी का अर्थ है की अब जो दो प्रेम में एक थे वो अपने प्रेम अवस्था से चैतन्य या जागरूक हुये और इसी प्रेम अवस्था से दोनों स्त्री व् पुरुष के जागरण का नाम एक ब्रह्म का अपने में दो हो जाना है जिसे वेदो में अद्धैत से द्धैत होना कहा है अब इन दोनों जो सत् यानि सत्य पुरुष और असत् यानि अनादि शक्ति ॐ स्त्री की परस्पर सहमति से की हम फिर से अपनी सृष्टि उतपन्न करे यही कथन वेदों का एकोबहुस्याम यानि एक से अनेक हो जाऊ की घोषणा है और यही स्त्री पुरुष की परस्पर एक दूसरे से मिलकर अपनी ही प्रेम सृष्टि करने का नाम सिद्धायै है सिद्धायै यानि सम्पूर्णता अर्थ है की स्त्री पुरुष के रूप में ही ये सम्पूर्ण जीव और जगत बना है तब इस सिद्धायै रूपी सम्पूर्ण सृष्टि का लय फिर से स्त्री पुरुष के परस्पर प्रेम के एकाकार में होता है जिसे बीज कहते है क्योकि केवल प्रेम में ही दोनों एक होकर सम्पूर्णता को प्राप्त होकर अहंकार रहित बनते है तब दोनों को मैं नही हूँ ये अवाक् बोध होता है इसी चैतन्य परन्तु मौन अवस्था को ही वेदों में बीज कहा गया है यही बीज अवस्था का नाम ही नमः कहलाता है अर्थात न- ना -म मैं -ह -हूँ अर्थ है अब इसी बीज या नमः की प्रेम अवस्था यानि एक दूसरे में प्रलय अवस्था में से सत पुरुष व् असत् स्त्री ॐ का पुनर्जागरण के रूप में पुनः सृष्टि होने का नाम है ईँ (ईम) है यही स्त्री व् पुरुष के अखण्ड प्रेम की एक होने की प्रेम शक्ति है यही बीज से प्रकट होने वाली प्रेम शक्ति का नाम वेदों में कुंडलिनी शक्ति कहा है यही मूल अनादि प्रेम शक्ति या मूल परमात्मा है इसी से सब उतपन्न है और यही सृष्टि है और इसी में सब लय हो जाता है अब इस ईँ से चार शक्तियॉ फट् यानि प्रस्फुटित या प्रकट होती है जिसे वेदों में ब्रह्म से चार वेदों के प्रकट होने का वर्णन है ये ईँ रूपी ब्रह्म से मनुष्य के चार कर्म पथ कहे गए है की अर्थ काम धर्म और मोछ और इन्ही को चार वेद अथववेद ऋग्य्वेद सोमवेद कहा गया है ये ही ईँ का फट् है और फट् से आगे स्वाहा का अर्थ है ये चार वेदों का और भी सम्पूर्ण विस्तार जो 108 भाग में पूर्ण होता है यही स्वाहा यानि ब्रह्म ज्ञान का सम्पूर्ण विस्तार होना है।

अब आप थोडा ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको सहज ही समझ आ जायेगा की इस संसार में सभी धर्मो में सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईँ फट् स्वाहा से सम्पूर्ण सिद्धासिद्ध महामंत्र और कोई नही है जिसमे सम्पूर्ण सनातन धर्म का सृष्टि से लेकर प्रलय और पुनः सृष्टि का सम्पूर्ण कर्मबंध ज्ञान प्रकट हो तो भक्तो बोलो-जय- सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईँ फट् स्वाहा।
और जय सत्यास्मि।।
ईं कुंडलिनी बीजमंत्र वर्णन:-
सनातन काल में ईं बीज मंत्र पर बहुत विशेष उच्चतम साधनायें हुयी और सभी ऋषियो ने इसके द्धारा तन्त्र मन्त्र यन्त्र की उच्चतम से लेकर सम्पूर्णता की परा अप्रासिद्धियों को प्राप्त किया शारदातिलक में इस ईं बीज मन्त्र को श्री महाभगवती का मूल बीज मन्त्र सिद्ध किया और सभी धर्मो में ईं के बिना अपूर्णता को स्वीकारा और आप पाएंगे भी यही कि प्रारम्भिक महाशक्ति जो पुरुष तत्व को जिसे ईश्वर कहा जाता है वह भी ई से प्रारम्भ है और स्त्री तत्व भी जो ईश्वरी कहा जाता है तथा अन्य धर्मो का प्रारम्भ भी ई से है संछिप्त में जैसे-ईसाई हो या इस्लाम हो या इजिप्ट आदि और ई की शक्ति से ही निराकार ब्रह्म जो योगनिंद्रा में युक्त है वह ई से पुनर्जागृत हो कर चैतन्य होता साकार व् क्रियाशील होता है यही ई उस ब्रह्म को ईश्वर बनाती है और ईश्वरी बनाती है स्त्रितत्व के सम्पूर्ण गुणों से युक्त करके जीवन रूपी म्हाकुण्डलिनी बन कर इस जीव जगत को जीवन्त करती है तभी सभी जीवो में यही ई मूलाधार से सप्त चक्रों के रूप में सहत्रार तक सम्पूर्णता प्रदान करती युक्ति यानी भोग से मुक्ति यानि मोक्ष प्रदान करती है यही है प्रत्येक जीव की मूल आत्मा के साथ उसकी शक्ति जिसे सर्वप्रथम इच्छा कहते है यही कर्म को गति देकर क्रिया बनती है और यही ज्ञान को चैतन्य करके उपयोगी बनाकर ज्ञानी अर्थात ज्ञेय को धारण करने वाला ज्ञानी बनती है यही सभी मन्त्रो तंत्रो यंत्रो के अंदर जुड़कर शक्ति बनती है ए में ऐं ह्र में ह्रीं कल यानि भूतकाल भी व् भविष्य भी को क्लीं यानि वर्तमान बनाती शाश्वत करती है यो यही ई है जो ॐ ओ+ई+म के मध्य महाशक्ति है जो ॐ के प्रारम्भ ओ रूपी निराकार ब्रह्म को साकार बनती है और इस ॐ को चारो धर्मो के लिए प्रस्फुटित करती है जिससे चार वेद बने है।
और ॐ का अंत म में संयुक्त होकर उस म रूपी अंत को नादाँत बनती है कभी ना समाप्त होने वाला अनादि अर्थ देती है जिसमे संयुक्त होकर म से आ को पुनः जाग्रत करके पुनः पुनः सनातन सृष्टि करती है यही है ई।।तभी इसे ॐ से भी अनादि और मध्य व् अनन्त कहा व् माना है क्योकि ॐ ईश्वर और ईश्वरी का संयुक्त प्रेमालाप प्रथम शब्द है और इस प्रथम शब्द के घोष को शक्ति देती है ईं और ईश्वर और ईश्वरी का प्रेम के योग को क्रिया में बदलने का कार्य कर उनका संयुक्त अभिसार यानि उनके सृष्टि करने के संयुक्त भोगवस्था के मध्य की जो संयुक्त ऊर्जा है जो दोनों की कुण्डलिनी मिलकर एक महा कुण्डलिनी बनती है वहीँ ईं है यो इसकी महिमा इस पृथ्वी का कोई भी धर्म और शास्त्र अपने शब्दों में लिख और कह नही सकता है ये केवल ध्यान से ही समाधि बनकर प्रकट और अभिव्यक्त होता है यो अधिक नही कहते हुए सभी इसे साधना से जाने और नीचे के सिद्धासिद्ध महामंत्र को जपे और सर्वकल्याण पाये।।जय गुरु देव।।
बोलो–सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा।।
सत्यास्मि वर्णित सिद्धासिद्ध कुंडलिनी योग:-
सिद्धासिद्ध महामंत्र का अर्थ:-
सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा..
त्रिगुण यहाँ सत्य पुरुष नाम
और त्रिगुण स्त्री ॐ।
सिद्धायै सप्त चक्र सृष्टि
यहाँ नमः आत्म मोक्ष व्योम।।
भोग सर्व कर्म अर्थ यहाँ
योग अर्थ सर्व व्यवहार।
भोग योग से जगे कुंडलिनी
ईं कुंडलिनी अर्थ यहाँ सार।।
अर्थ धर्म काम मोक्ष यहाँ
फट् अर्थ मानुष चार वेद धर्म।
स्वाहा अर्थ यहाँ विस्तार विश्व
अहम् सत्यास्मि अर्थ यही मर्म।
“सत्यास्मि अष्टांग योगार्थ:-
सत्य अहिंसा अस्तये ब्रह्म
अपरिग्रह साधे मूलाधार।
भोग योग यम जगे कुंडलिनी
सत्य ॐ प्रेम रमण नर नार।।
शिवलिंग पुरुष मूलाधार अर्थ
और स्त्री श्रीभग मूलाधार।
अपने अपने मोक्ष को
ध्यान दे अपने आधार।।
पुरुष युग में पुरुष प्रतीक सिद्ध
शिवलिंग और शालिग्राम।
अब स्त्री युग में ये अर्थहीन
श्रीभग स्त्री आत्म विराम।।
शौच संतोष तप स्वाध्याय
पंचम नियम ईश्वर प्रणिधान।
पँच शुद्धि स्वाधिष्ठान जगे
मैं का मिटे अशुद्ध अभिमान।।
तन मन स्थिर कर्म बने
वही है महासिद्ध आसन।
नाभि चक्र शोधन हो
द्धंद क्लेश सभी नाशन।।
प्राण अपान जिस विधि से
हो दोनों स्तब्ध।
वृति बहिर अंतर्निहित हो
ह्रदय चक्र जगे मनशब्द।।
पँच इंद्री पँच विषय त्याग
चित्त हो समान निरुद्ध।
प्रत्याहार नाम प्रतिकूल वृत्ति
कंठ चक्र कुंडलिनी शुद्ध।।
चित्त ठहरे और रहे वही
और कभी ना हो विक्षोभ।
भक्ति शक्ति आज्ञेयी हो
आज्ञाचक्र सिद्ध बिन लोभ।।
ध्येय वस्तु का ज्ञान हो
और कोई साहयक नही हो ज्ञान।
सहत्रार चक्र हो स्थिति
उस योगी हो सिद्ध ध्यान।।
ध्यान ध्येय वस्तु के आवेश से
शून्य हो अपने स्वरूप।
और ध्येय वस्तु आकार ले
समाधि सहत्रार चक्र ले रूप।।
अभी विषय वृति है रूप वश
यहाँ योगी रूप वशीभूत।
प्रकाश रूप अभी द्रष्टा यहाँ
योगी सविकल्पसमाधि है अभिभूत।।
मनोवृत्ति सभी जीवंत यहाँ
और जो सोचे हो सिद्ध।
सिद्धि क्षेत्र संयम मधुभूमि ये
विभूति सभी रिद्ध और सिद्ध।।
मन चित्त बुद्धि सब विलीन
केवल है स्वयं शेष।
निर्विकल्प समाधि अद्धैत कैवल्य
अहम् सत्यास्मि मोक्ष अशेष।।
योगी चार प्रकार के
कल्पित मधु प्रज्ञा अतिक्रान्त।
अतिक्रान्त योगी सर्वोपरि
वही अस्मिता सर्वज्ञ स्वंशांत।।
मंथन करे जो इस कवित्त्व का
वही पाये योगवत् ज्ञान।
मैं ही हूँ आजन्मा ईश्वत्त्व
अखंड परमत्त्व भगवान।।
।।सम्पूर्ण सत्यास्मि योग सम्पन्न।
सत्य ॐ शरणं शांतिः
“तारक नाम सभी समय।
बोलो-सत्य ऊँ सिद्धायै नमः”
स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी
Www.satyasmeemission.org
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