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आज देशभर में मनाया जा रहा है विजयदशमी का पर्व, जानें विजय मुहूर्त, पूजा विधि एवं मंत्र, बता रहे हैं सद्गुरु स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी मनाई जाती है, जिसमें अपराह्नकाल की प्रधानता होती है। आज देशभर में विजयादशमी मनाई जा रही है। आदिशक्ति मां दुर्गा ने 9 रात्रि और 10 दिन के भीषण युद्ध में महिषासुर का वध कर दिया था, वहीं श्रीराम ने लंका के राजा रावण का इस तिथि को वध किया था, इसलिए विजयादशमी बुराई पर अच्छाई के विजय के रूप में मनाते हैं।

सद्गुरु सत्यसाहिब स्वामी श्री सत्येन्द्र जी महाराज बता रहें हैं ​कि इस वर्ष विजयादशमी 8 अक्टूबर को क्यों मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं मंत्र क्या है?

इस वर्ष सोमवार दिनांक 07 अक्टूबर को नवमी दिन में 3 बजकर 5 मिनट तक है। इसके बाद दशमी तिथि लग जा रही है, जिसमें अपराह्नकाल का स्पर्श मात्र है, अपराह्नव्याप्ति नहीं है। दूसरे दिन मंगलवार 08 अक्टूबर को दशमी तिथि दिन में 04 बजकर 18 मिनट तक है, जिसकी अपराह्नकाल में पूर्ण व्याप्ति है। अत: “विजयादशमी सा परदिने एव अपराह्नव्याप्तौ परा” धर्म सिन्धु के इस वचनानुसार, मंगलवार दिनांक 08 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।

सद्गुरु स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज का कहना है कि इस दिन पूर्णिमाँ देवी व अपराजिता देवी का पूजन करें।

विजयादशमी के दिन माँ पूर्णिमाँ देवी, अपराजिता देवी, शमी और शस्त्रों का विशेष पूजन किया जाता है। अपराजिता के पूजन के लिए अक्षत, पुष्प, दीपक आदि के साथ अष्टदल पर अपराजिता देवी की मूर्ति की स्थापना की जाती है। ॐ अपराजितायै नम: मंत्र से अपराजिता का, उसके दाएं भाग में जया का तथा उसके बाएं भाग में विजया का आवाहन पूजा करें। दशहरा के दिन नीलकंठ के दर्शन शुभ माना जाता है।

साथ ही “जय सत्य ॐ सिद्धाये नमः” का मंत्र जपने से मन को शांति मिलती है। और परेशानियां दूर होती हैं।

शुभ मुहूर्त
विजय मुहूर्त दोपहर में
02:21 बजे से 03:08 बजे तक।
अपराह्न पूजा मुहूर्त दोपहर में
01: 33 बजे से
03: 55 बजे तक।

सत्यास्मि मिशन की ओर से सभी को दशहरे की शुभकामना के साथ दशहरे का सच्चा अर्थ क्या है,इस पर मेरी दो कविता इस प्रकार से जो, विजय दशमी संदेश के नाम से है:-

पहली कविता इस प्रकार से है कि:-

श्री राम विजय रावण दशहरा
धर्म अर्थ विजय दशहरा।
दस महाविद्या सिद्ध था रावण
जगत प्रसिद्ध रावण नाम दशहरा।।
अधर्म पंथ अनुयायी रावण
नारी अपमान कुल नाश हुआ रावण।
यही ज्ञान आज मानव सीखे
अधर्म चाहे फलता हुआ दिखे।
अंत नाश अवश्य सब होगा।
अधर्म कमाई असफल सब होगा।।
नारी अपमान करो ना मानव
नारी अपमान बनता दानव।
भक्ति शक्ति चाहे सिद्धि पाओ
नारी अपमान सदा नरक पाओ।।
संकल्प करें हम आज दशहरा
धर्म विजय को बांधे सेहरा।
नारी उत्थान सर्व दिशा करेंगे।
दशहरा सफल इस ज्ञान करेंगे।।

अब दूसरी कविता सुने की:-

आत्मा से परमात्मा तक
मैं के यात्रा दस पड़ाव।
काल तारण मोहभंग
वही मानस दस महाविद्या पाव।।
साधो साधु बिन बने स्वाधु
षोडश त्रिपुर भुवन।
वेध्व वाग मातंग परे
बोध कमल आसन् मैं सुहन।।
मैं परमपद स्वं अवतार परम्
मैं सत्य सर्व अवतार।
मैं तम् रज सत् त्रिगुणातीत
और मैं अहं स्वं प्रेमावतार।।
अहं का बोध तब दैत्य मैं
अहं परे देव त्रिदेव।
आत्म से परमात्म तक
अहम् सत्यास्मि हूँ स्वंमेव।।
मैं ही एकल ब्रह्म ईश
मैं बट त्रिगुण त्रिअंग।
स्त्री पुरुष और बीज मैं
यही देव देवी म ऐ अंग।।
म इच्छा ऐ क्रिया है
और अंग बिंदु हैं मैं ज्ञान।
मैं लीन स्वयं प्रेमवत
मैं गीता वेद भगवान।।
मैं का द्धंद ही देव दैत्य
यही राम और कृष्णावतार।
क्रिया प्रतिक्रिया सदैव मैं
मैं रावण कंस अहं संहार।।
यही देव और दैत्य का
मैं महासागर का मंथन।
शेषनाग मैं और अहं मध्य
चौदह रत्न संग अमृत मंथन।।
अ से ह के मध्य वर्ण
बावन अक्षर मिल बन अहं।
अहं विगलित जब प्रेम बन
तब शेष ज्ञानवत् मैं रह।।
यही एक्त्त्व से विस्तार तक
और विस्तार से पुनः एक्त्त्व।
इस मैं मध्य संसार है
अंतिम विजय दशमी मैं गत्व।।
यही घोषणा राम की
यही मैं कृष्ण की गीता।
यही सत्यास्मि वर्णित मैं
मैं पूरक राधा सीता।।
नो माह जीव पालकर
नवदा भक्ति कर बनती माता।
नो अहंकार रात्रि मिटा
नवरात्रि मनायें मैं ज्ञाता।।
मिटा दशम द्धंद को
विजयदशमी मैं है दाता।।
मैं मन माया एक कर
जला आत्मदीप अमावस मिटाता।।
पुनः पुनः अवतरित हो
मैं अनंत लीला कर स्वं ध्याता।।
सौलह कला पूर्ण बन
मैं प्रेम पूर्णिमा विधाता।।
मैं ही सत्य
मैं ही ॐ।।
सृष्टि सिद्धायै मैं ही
नमः प्रेम बीज मैं सोम।।
ईं कुंडलिनी मैं सप्त चक्र
फट् चतुर्थ धर्म मैं वेद्।
स्वाहा रूप उपनिषिद् मैं
मैं प्रेम ईश हूँ अभेद्।।
सिद्धासिद्ध महामंत्र जपो
और करो अहं का त्राण।
करो आत्मसाक्षात्कार स्वयं का
शुभ विजय दशमी अहं निर्वाण।।

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
स्वामी सत्येन्द्र सत्यसाहिब जी
www.satyasmeemission.org

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