श्री रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य विवेकानंद व् रामकृष्ण मिशन को आज सारा संसार जानता है। यो ये विषय यहाँ नही है। बल्कि विषय है की जब भी कोई भी पुरुष या स्त्री अपने साधना काल में प्रारम्भिक स्तर पर होता है और मूलाधार चक्र पर कुण्डलिनी शक्ति का आघात होता हुआ उस चक्र में प्रवेश होता है। तब साधक को साधना के क्षेत्र में प्रवेश मिलता है। तभी घटित होती है। शरीर के अंदर पंचतत्वों का परस्पर संघर्ष जिसके फलस्वरुप साधक गुरु के मिलने से पूर्व अपने बाल्य अवस्था में अनेक बार मूर्क्षित या अचेत होकर कुछ देर को संज्ञाहीन होकर पड़ा रहता है। जिस भी अवस्था में होता है। चाहे बेठा हो लेटा हो वहीं का वहीं स्तब्ध हो जाता है। क्योकि उस समय पूर्वजनित साधनगत परिणाम के कारण उसके अपान और प्राण शक्ति एक होकर उसके मूलाधार चक्र में अचानक एकाग्रता पा कर प्रवेश करते है। नतीजा मूर्छा होती है। यही अनेक सन्तों साधकों के और रामकृष्ण के बचपन में दिखाई देता है और उन्होंने आगे अपनी साधना उसी अचानक स्तब्धता के चलते अनेक भावावेशो को ग्रहण करते समझते प्रारम्भ की। और मूलतया बात ये है की आप चाहे किसी भी पुरुष रूपी इष्ट देव या स्त्री रूपी इष्ट देवी की साधना करें। जब कुण्डलिनी मुलाधार में प्रवेश करती है तो योग हो भोग दोनों के विज्ञानानुसार क्रिया और प्रतिक्रिया से साधक घिरता है। जो शक्ति बाहर थी वो अंदर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करती है।तो वही पुनः वापस बाहर की और भी दौड़ती है। यो साधक मूलाधार चक्र में अंतर और बहिर काम भाव की तीर्वतम क्रिया और प्रतिक्रिया को प्राप्त और झेलता है। यही स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री की आवश्यकता होती है। ठीक यही प्रत्येक साधक को साधना में इस काम भावावेश से बाहरी और अंतर प्रकर्ति का सामना करना पड़ता है। जो भक्त या दास भाव को धारण करते साधना करता है। वो अपने इष्ट या गुरु से अंतर दारुण से पुकार पुकार कर इस काम भाव से बाहर निकालने को प्रार्थना करता है। की मैं इससे बच जाऊ और अखण्ड बना रहूँ। यो यही काम के प्रति करुणा भाव बदल जाता है और उसे काम की क्रिया प्रतिक्रिया के आघात से शांति मिलती है। लेकिन कब तक कोई ऐसा कर पाता है? ये उसके इष्ट व् गुरु के प्रति भक्ति पर निर्भर करता है। ठीक यही आप रामकृष्ण के माँ काली के प्रति देखते है। की अपनी पत्नी के आने पर उन्होंने काली माँ से कहा की माँ मुझे इस भाव में डूबने नही देना। यो वे स्त्री के प्रति पत्नी का भाव नही देख पाये। माँ के भाव को रख कर काम से बचे रहे।और साधना में आगे बढ़ते गए और तभी उनके जीवन में प्रकर्ति के काम भाव को दिव्य काम और दिव्य प्रेम बनाने हेतु स्त्री गुरु का आगमन हुआ। वे थी भैरवी ब्राह्मणी। जिन्होंने उन्हें काम के वाममार्गी पक्ष का चौसठ कला का क्रमबन्ध ज्ञान दिया। अब देखिये की इन स्त्री गुरु भैरवी ब्राह्मणी के रामकृष्ण से पूर्व दो पुरुष शिष्य भी रहे। जिन्हें इन्होंने इनसे मिलवाया। वे चन्द्र और गिरजा थे और दोनों में असाधारण सिद्धि भी थी। चन्द्र पारद गुटिका को अपने मुख में रख अद्रश्य होकर एक राजकुमारी के प्रेम में पड़ गए और अचानक सिद्धि के काम नही कर पाने पर लज्जित होना पड़ा। और दूसरे गिरजा ने रामकृष्ण के साथ वैध से अफीम की दवाई लेने जाते में भयंकर आंधी आ जाने पर रास्ते के नही दिखने पर अपनी पीठ से ऐसा तीर्व प्रकाश निकाला की वहाँ से दक्षिणेश्वर स्पष्ट दिखने लगा। इनकी सिद्धि उस प्रदर्शन के बाद रामकृष्ण के प्रभाव से लुप्त हो गयी। यो भैरवी ब्राह्मणी के ये शिष्य कुछ काल को योगमार्ग से भटक गए। ये साधना में होता है। जबतक व्यक्ति अपनी पायी उपलब्धि को उसकी सामर्थ्य को और उसके परिणाम को स्वयं नही देखेगा उसे कैसे पता चलेगा की सत्य क्या है? ठीक यही तो पूर्वकाल के अनेक ऋषियों जैसे विश्वामित्र के जीवन में हुयी की वे तपस्या कर रहे और मेनका ने आकर उनकी एकाग्रता भंग की उनसे सन्तान प्राप्त की।
आज बाहरी समाज इस उदाहरण को पथभृष्टता की दृष्टि से देखता है। जबकि साधना जगत में ये एक साधना का प्रयोगिक पक्ष मात्र है। जैसे विश्वामित्र की कथित पथभृष्टता से कितना उत्तम संसारिक कल्याण हुआ की उनसे शकुंतला जन्मी और उनसे भरत। जिसके नाम से ये भारतवर्ष नाम पड़ा।इसमें कुछ तर्क है की ये भरत शकुंतला पुत्र नही बल्कि ऋषभदेव के पुत्र भरत थे। शेष जो भी कुछ हो बात साधना की ये है की मूलाधार चक्र से जब ऊर्जा ह्रदय चक्र पर आती है। तब जो भी साधक साधना कर रहा है। उसको इस काम ऊर्जा का रूपांतरण एक विशुद्ध ऊर्जाशक्ति के रूप में मिलता है। और जब ये विशुद्धउर्जा शक्ति ह्रदय चक्र में प्रवेश करती है। तब साधक का जो भी ह्रदय भाव होगा। जो भी मनोकामना होगी। वही सबसे पहले उसके सामने प्रकट होती है। यो जो उस समय संसारी कामनाओं को लेकर साधना कर रहा होता है, तब प्रकर्ति उसको वही प्रदान करती है, जेसे विश्वामित्र राजा थे, वे बदले की भावना से साधना कर रहे थे यो उस समय उनके ह्रदय में बदले का भाव था। उन्होंने अपने राजसी भाव काम भाव का दमन कर रखा था। नतीजा वही क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में पहले प्रकट हुआ वासना का दमन। यो प्रकर्ति ने मेनका का रूप धरा और उनके भोग का निस्तारण किया। यहां बड़ा गहरा ज्ञान छिपा और प्रकट है की उस साधना काल में साधक में जो ऊर्जा की तीर्वतम उतपत्ति होती है। उसे एक सामान्य स्त्री या सामान्य् पुरुष नही सम्भाल सकता है। उसे कोई असाधारण स्त्री या विपरीत पक्ष ही सम्भाल या उपयोग कर सकता है। यही है इन्दियों के राजा इंद्र के द्धारा मेनका आदि असाधारण स्त्री को साधक की संगत और उसको नई दिशा देने के लिए सहयोग को भेजना। यहाँ कहे अर्थ को चिंतन करना। ऐसे अनगिनत उदाहरण है। जिन्हें समाज ऋषियों की कहानियों में पथभृष्टता की दृष्टि से देखता और समझता है और पाता है की ये क्या की विंधयक ऋषि की तपस्या को उर्वशी भेजी वो असफल रही। पर ऋषि का वीर्यपात जल में होने से मछली ने ग्रहण किया और ऋष्यऋंग पैदा हुए। जो श्री राम के जीजा बने उन्ही के यज्ञ के प्रताप से श्री राम पैदा हुए ठीक ऐसे ही नर नारायण की तपस्या को भंग करने में नर ने अपनी जांघ से नई अप्सरा पैदा कर दी और इंद्र को भेट की और अप्सरा पुंजास्थला अंजनी बन हनुमान जी को जन्म दिया और अप्सरा अन्द्रा को ऋषि शाप से मछली बनकर महाभारत की सत्यवती के पिता के जल में गिरे वीर्य को ग्रहण कर निगला और चेदि का राजा और सत्यवती को जन्मदिया आदि अनेक कथाये है। जिनके पीछे का सत्य बड़ा साधनगत वैज्ञानिकता लिए है। यो साधना काल की ऊर्जा को सामान्य स्त्री या पुरुष नही झेल सकता है। उसे प्रकर्ति ही अपने दिव्य स्त्री या पुरुष रूप में प्रकट होकर झेलती और उसे ग्रहण कर नवीन सृष्टि करती है। यो पुनः लौटते है रामकृष्ण की स्त्री गुरु भैरवी के द्धारा करायी यही प्रकर्ति की दिव्य साधना के रहस्य की और। रामकृष्ण को इस काम से दिव्यता की साधना को कराने और करने में लगभग तीन साल से अधिक लगे और इस साधना में दो अलग अलग पंचमुंडी आसन का निर्माण किया गया। एक पर जप और ध्यान किया जाता और एक पर यज्ञादि अनुष्ठान होते। यो देखोगे की ये क्या एक ही आसन पर्याप्त होता है दो क्यों? और पंचमुंडी आसन क्या है? ये दो पंचमुंडी आसन भी वाममार्ग का एक साधना भाग है। एक आसन क्रिया है जिस पर बैठ मंत्र जप और यज्ञ किया जाता है ओर दूसरे पर पहले आसन के जप यज्ञ की क्रिया की प्रतिक्रिया को ध्यान में दर्शन कर सिद्धि के रूप में आयत किया जाता है। यो पञ्चतत्वों की क्रिया और प्रतिक्रिया ये पांच और पांच मिलकर दस होते है। यही है दस महाविद्या को वशीभूत करने का मुंडासन सिद्धि उपयोग रहस्य और एक केवल नवमुंडी महासन भी बनाया जाता है। जो काशी में विशुद्धानंद परमहंस ने ज्ञानगंज की भैरवियों की साहयता से बनाया था। पर ये सब पृथ्वी के अंतर्गत ही आते है। ये पृथ्वी की प्रकर्ति शक्ति के पंचतत्वों के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपों को ही वशीभूत करने को होते है। परंतु ये आवश्यक है इस प्रकर्ति के अद्रश्य भोग रमण को भोग कर अपने में विशुद्ध शक्ति की प्राप्ति ओर प्रकर्ति से ऊपर जाने के लिए। यो केवल यूँ ही मंत्र जपने से प्रकर्ति से पार नही जाया जा सकता और सिद्धि नही मिलेगी। आगे बढ़ते है कि ये पांच प्रकार के व्रक्षों अशोक आवला नीव पीपल बड़ के वृक्ष के नीचे बनाया जाता है। चारों और तुलसी की बाड़ी लगाई जाती है और विधिवत पाँच प्रकार के मुंड-ये पांचो मुण्ड मनुष्य के भी हो सकते है और एक मनुष्य का एक भैसे एक नेवले एक सर्प एक सूअर या सियार का होता है बड़े ही सिद्ध मंत्र सिद्धि सम्पन्न सिद्ध गुरु के देख रेख में बनता है। तब इस पंचमुंडी आसन में सिद्धि उत्पन्न होती है और साधक दिव्य रक्षाकवच मन्त्रों से अपने को बांध कर नितांत दिगम्बर होकर उस पर साधना करता है। जैसा की रामकृष्ण को भैरवी ब्राह्मणी ने करायी और तब रामकृष्ण ने बताया है की जब मैं रं बीज मंत्र का जप करता अपने चारों और एक अग्नि के घेरे को रक्षाकवच के रूप में स्पष्ट देखता था और मेरे लाये हांड़ी में विभिन्न भोज्य पदार्थो को वायु में उपदेवताओं के द्धारा ग्रहण होता पाता था। यो करते करते भैरवी ब्राह्मणी के द्धारा विभिन्न जड़ीबूटियों के यज्ञ व् मांस मंदिरा रूपी काली देवी का प्रसाद जिसे कारण बोला जाता है। उसका जरा सा सम्मान हुतु जिव्ह्य पर चखना ये सब प्रकर्ति के सभी पदार्थो उपयोगी है इसका प्रतीक होता है। कुछ भी घृणा का विषय नही है और खोपड़ी में भोग लगाने आदि के उपरांत अनेक प्रकार से चौसठ सिद्धियों का ज्ञान प्राप्त किया। अंत में नग्न कन्या की गोद में बैठ समाधि लगाने की आज्ञा मान माँ तू यहाँ भी कह और अनुभव करते समाधि लगाई।भैरवी ब्राह्मणी असाधारण सुंदर थीं और वे कन्या भी और वो स्त्री पुरुष भी साधना जगत के साधक जन थे। ना की सामान्य लोग और भैरवी भी वाममार्ग की वक्री साधना में दक्ष थी। क्योकि इस परम्परा में स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री सिखाती है। अन्यथा वाम का अर्थ ही सिद्ध नही होता है। यो भैरवी के गुरु पुरुष सिद्ध थे।
वे वेष्णव मत की सिद्ध थी और अंतिम प्राकृतिक अपराकाम साधना का चरम दिव्य काम भाव को अपनी खुली आँखों से एक भैरव और भैरवी को रमण करते अपनी स्त्री गुरु ब्राह्मणी के समक्ष साक्षी भाव से देखा। जिसके दर्शन से उन्हें सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर और ईश्वरी का नित्य दिव्य आनन्द विलास रमण के दर्शन अनुभूत हुया। इस अनुभत दर्शन से ये संसारिक और पारलौकिक दो प्रकार की प्रकर्ति को पार कर काम के दिव्य स्वरूप सार्वभोमिक प्रेम के महाभाव में स्थित हो गए। ये है इनकी दो प्रकार की प्रकर्ति की द्धैत साधना की समाप्ति अब विषय। ये है की ये इससे आगे निर्विकल्प समाधि में जाने के लिए तत्पर रहने लगे। जिसके लिए भैरवी ब्राह्मणी का विरोध सामने आया। वे इसे रसिक भक्ति की प्राप्ति की समाप्ति मानती थी। यो उन्होंने रामकृष्ण को गुरु तोतापुरी के सानिध्य में सहज ही निर्विकल्प समाधि में प्रवेश को देखा और इनके साथ साथ तोतापुरी ने ये भी पाया की जो तोतापुरी ने चालीस साल में निर्विकल्प समाधि का अभ्यास कर प्राप्त किया था। वो इन्होंने तीन दिन में ही प्राप्त कर लिया। और वे भी इससे यही सीख वृंदावन आदि स्थान पर तपस्या को चली गयी। अब यहाँ ये अनुभव का विषय है की जहाँ तक भौतिक और आध्यात्मिक प्रकर्ति का क्षैत्र है वहीँ तक स्त्री गुरु का साथ पुरुष को प्राप्त हुआ। और अंत में आत्म पुरुषत्त्व की प्राप्ति से लेकर अलिंग अद्धैत अवस्था तक की प्राप्ति को एक पुरुष को दूसरे पुरुष की साहयता चाहिए। ठीक यही यहाँ भी दिखती है। और पूर्वर्तिकालों में ऋषिओं के जीवन में भी दिखती है। की उन्हें भी इस प्रकर्ति के स्त्री रूपों के उपभोगों के उपरांत पुरुष देवों ब्रह्मा विष्णु शिव अथवा सम्पूर्ण ब्रह्म या अव्यक्त ब्रह्म के दर्शन सिद्ध हुए। तो क्या स्त्री को इस दो प्रकार की प्रकर्ति के ऊपर पार जाने पर उसीकी अव्यक्त स्त्री ब्रह्म या स्वयं के आत्मब्रह्म के दर्शन होंगे। अवश्य होंगे। यही आज स्त्री शक्ति को खोजना जानना है उसे अपनी साधनगत अनुभूति अपने स्वनिर्मित साधनगत शास्त्र लिखने होंगे। जिसका सदा से आज तक आभाव है और सत्यास्मि मिशन इसी को जीवंत करने के सफल प्रयास की और है।और इस लेख में अनेक बात शेष रह गयी जो अन्य लेख में लिखी जायेंगी। यो इस लेख को अपने चिंतन में अवश्य उतारे।
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
18 फ़रवरी अवतरण श्री महाप्रभु चैतन्यदेव के जन्मोदिवस पर सत्यास्मि मिशन की और से स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी अपनी रचित प्रेमाभक्ति कविता से सभी को शुभकामनाएं देते कहते है की…
18 फ़रवरी भूलोक धर
पुरुष शरीर अवतरित भक्ति न्यारी।
निमाई बन जन्मी नवदीप में
कृष्ण प्रेमरास राधिक अतिप्यारी।।
सिंह लग्न चन्द्र ग्रहण योग
फाल्गुन शुक्ल शुभ पूर्णिमा।
अठारह दिवस जन्मे विशम्भर
नवद्धीप ने पायी यूँ महिमा।।
नीम पेड़ नीचे मिलें
यो निमाई पड़ा जग नाम।
गौर वर्ण है गौर हरि
कृष्ण राधे संयोग अविनाम।।
जगन्नाथ पिता माता शचि
प्रथम अर्द्धांग्नि लक्ष्मीप्रिया।
गोलोक गयी वे सर्पदँश मुक्त
द्धितीय पत्नी विष्णुप्रिया।।
वेद पुराण शास्त्र न्याय पढ़
तर्क वितर्क द्धैत अद्धैत।
ग्रहस्थ सुख प्रेमभास कर
पाई एक भक्ति तारक अद्धैत।।
पिता श्राद्ध को गया गए
वहाँ भेंट हुयी ईश्वरपुरी संत।
कृष्ण कृष्ण दिया नाम जप
हरि दीवाने भज गौर अनंत।।
गुरु केशव भारती से संयास ले
कृष्ण चैतन्य हुया सत् नाम।
गौरांग जगन्नाथ मंदिर जा
विकट अभिभूत हुए अविराम।।
विजयदशमी वृंदावन यात्रा चले
कार्तिक पूर्णिमा पहुँचे वृंदावन।
हरि नाम उद्धाम अति उर्ध्व ले
सुसुप्त भक्ति जाग्रत हरिवृंद।।
प्रयाग से काशी हरिद्धार तक
मथुरा द्धारिका कामकोटी पीठ।
अंतिम दिन जगन्नाथ पूरी
सशरीर समाये कृष्ण अमिट।।
जग हरि नाम प्रचार किया
एकमेव अद्धितीय श्री कृष्ण नरे।।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
!!शुभ चैतन्य दिवस की शुभकामना!!
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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