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आज है मकर संक्रांति, जाने शुभ मुहूर्त और इसको मनाने के पीछे के धार्मिक कारण, बता रहे हैं- श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

आज मकर संक्रांति का बड़ा पर्व है। आजके दिन से बहुत सारे शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। यहां तक कि प्रयागराज में चल रहे कुम्भ में शाही स्नान भी आज से शुरू हो जाएंगे। तो आइए जानते हैं इसको मनाने के पीछे के कारण और शुभ मुहूर्त।

आज है मकर संक्रांति। आज के दिन से विवाह, ग्रह प्रवेश आदि के शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। 15 जनवरी यानी मकर संक्रांति के दिन ही प्रयागराज में चल रहे कुंभ महोत्सव का पहला शाही स्नानशुरू हो गया है। मकर संक्रांति के दिन दीन हीनों, गरीबों को दान देने को प्रथा है। इसके बारे में सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं महायोगी, तपस्वी श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज।

स्वामी जी के अनुसार इस दिन चावल, उड़द, गुड़, नमक, गेहूं, सोना, तिल, स्वर्ण, चंदन, कंबल, लकड़ी, वस्त्र आदि का दान किया जाना शुभ है।

इस वर्ष मकर संक्रांति का त्योहार 14 की बजाए 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। दरअसल मकर राशि में सूर्य का प्रवेश 14 तारीख की रात में हो रहा है। हमारे शास्त्रों में त्योहारों की तिथि सूर्योदय से मानी जाती है। इसलिए मकर संक्राति का पर्व 15 तारीख को मनाया जाएगा, जब सूर्य का उदय मकर राशि में होगा।

मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। इस दृष्टि से भी इस पर्व का खास महत्व है। एक अन्य मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदराचल पर्वत पर भूमिगत कर दिया था। उस समय से ही भगवान विष्णु के इस विजय को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है।

हिंदू धर्म में मकर संक्रांति एक प्रमुख पर्व है। भारत के विभिन्न इलाकों में इस त्यौहार को स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। हर वर्ष सामान्यत: मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है। इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है, जबकि उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।

पुण्य काल का समय 15 जनवरी 2019 को प्रातः 7:18 से दोपहर 12:30 तक रहेगा।

पुण्यकाल स्नान, ध्यान तथा धार्मिक कार्यों के लिए विशेष महत्व पूर्ण है।

महा पुण्य काल का समय 15 जनवरी 2019 को दोपहर प्रातः 7:18 से 9:02 तक रहेगा।

अधिकतर हिंदू त्यौहारों की गणना चंद्रमा पर आधारित पंचांग के द्वारा की जाती है।परंतु मकर संक्रांति पर्व सूर्य पर आधारित पंचांग की गणना से मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ही ऋतु में परिवर्तन होने लगता है। शरद ऋतु क्षीण होने लगती है और बसंत का आगमन शुरू हो जाता है। इसके फलस्वरूप दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी हो जाती है।

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व और सांस्कृतिक दृष्टिकोण:-
भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिये से मकर संक्रांति का बड़ा ही महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव के घर अतिथि के रूप में जाते हैं। चूंकि शनि मकर व कुंभ राशि का स्वामी है।नतीजा यह संक्रांति यानि मिलन पर्व पिता-पुत्र के अनोखे मिलन से भी जुड़ा है।इस समय शनि और सूर्य की युक्ति होती है,जो अनेक प्रकार से जातकों पर सुख और दुःख भी लाती है,शनि सूर्य की युक्ति से पितृपक्ष का दोष बनता है,इसके कारण ही जो पितृदोष योग है,उसके जितने भी दोष है,उन्हें इसी दिन गंगा या पवित्र नदी में स्नान करके फिर अपने अपने गुरु और इष्ट मंत्र के अत्यधिक जप तप दान करके शुद्ध किया जाता है।यो इसे पितृदोष निवारणी तिथि दिवस भी कहा जाता है।
एक और पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुरों पर भगवान विष्णु की विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति मनाई जाती है। बताया जाता है कि मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था। तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा।

फसलों की कटाई का त्यौहार


नई फसल और नई ऋतु के आगमन के तौर पर भी मकर संक्रांति धूमधाम से मनाई जाती है। पंजाब, यूपी, बिहार समेत तमिलनाडु में यह वक्त नई फसल काटने का होता है, इसलिए किसान मकर संक्रांति को देव कृपा के आभार दिवस के रूप में मनाते हैं। खेतों में गेहूं और धान की लहलहाती फसल किसानों की मेहनत का परिणाम होती है। लेकिन यह सब ईश्वर और प्रकृति के आशीर्वाद से संभव होता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर संक्रांति को ’लोहड़ी’ के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति ’पोंगल’ के तौर पर मनाई जाती है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में ’खिचड़ी’ के नाम से मकर संक्रांति मनाई जाती है। मकर संक्रांति पर कहीं खिचड़ी बनाई जाती है तो कहीं दही चूड़ा और तिल के लड्डू बनाये जाते हैं।

लौकिक महत्व:-


ऐसी मान्यता है कि जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को खराब माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें मनुष्य और जीवों के स्वस्थ और शांति को बढ़ाती हैं। इस वजह से साधु-संत और वे लोग जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े होते हैं, उन्हें इस दिन साधना करने पर अपने ह्रदय में शांति और आत्मिक सिद्धि की और अग्रसर की प्राप्त होती है।यदि सामाजिकता के सरल शब्दों में कहा जाए तो इससे पूर्व जीवन के परस्पर हुए एक दूसरे के प्रति कड़वे अनुभवों को भुलकर मनुष्य आगे की ओर बढ़ता है। स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि, उत्तरायण के 6 माह के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं, तब पृथ्वी पूण्य भरी प्रकाशमयी होती है, अत: इस प्रकाश में शरीर का त्याग करने से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है और वह ब्रह्मा को प्राप्त होता है। महाभारत काल के दौरान भीष्म पितामह जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने भी मकर संक्रांति के दिन शरीर का त्याग किया था।

मकर संक्रांति से जुड़े त्यौहार:-

भारत में मकर संक्रांति के दौरान जनवरी माह में नई फसल का आगमन होता है। इस मौके पर किसान फसल की कटाई के बाद इस त्यौहार को धूमधाम से मनाते हैं। भारत के हर राज्य में मकर संक्रांति को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।

पोंगल:-


पोंगल दक्षिण भारत में विशेषकर तमिलनाडु, केरल और आंध्रा प्रदेश में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है। पोंगल विशेष रूप से किसानों का पर्व है। इस मौके पर धान की फसल कटने के बाद लोग खुशी प्रकट करने के लिए पोंगल का त्यौहार मानते हैं। पोंगल का त्यौहार ’तइ’ नामक तमिल महीने की पहली तारीख यानि जनवरी के मध्य में मनाया जाता है। 3 दिन तक चलने वाला यह पर्व सूर्य और इंद्र देव को समर्पित है। पोंगल के माध्यम से लोग अच्छी बारिश, उपजाऊ भूमि और बेहतर फसल के लिए ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करते हैं। पोंगल पर्व के पहले दिन कूड़ा-कचरा जलाया जाता है, दूसरे दिन भगवती लक्ष्मी की पूजा होती है और तीसरे दिन अपने घर के पशु गाय आदि धन को पूजा जाता है।

उत्तरायण:-


उत्तरायण खासतौर पर गुजरात में मनाया जाने वाला पर्व है। नई फसल और ऋतु के आगमन पर यह पर्व 14 और 15 जनवरी को मनाया जाता है। इस मौके पर गुजरात में पतंग उड़ाई जाती है साथ ही पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जो दुनियाभर में प्रसिद्ध है। उत्तरायण पर्व पर व्रत रखा जाता है और तिल व मूंगफली दाने की चक्की बनाई सजाई जाती है।

लोहड़ी:-


लोहड़ी विशेष रूप से पंजाब में मनाया जाने वाला पर्व है, जो फसलों की कटाई के बाद 13 जनवरी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।इस दिन शाम को होलिका जलायी जाती है और उसके चारों और सभी स्त्री पुरुष ढोल के साथ भंगड़ा करते है।विभिन्न करतबों को दिखाया जाता है और तिल लड्डू गुड़ मक्का को अग्नि में ईश्वर को भोग के लिए चढ़ाते है।
बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहाँ लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-“सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।”
शास्त्रों व् पूर्णिमां पुराण के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवी, देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन अधिक से अधिक अपने गुरु और इष्ट मंत्रों का जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: आपके जीवन में पूर्णिमां की भांति प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी यज्ञ अग्नि प्रज्वलित एवं गरीबों की सर्दी मिटाने के लिए कम्बल का दान उनके आशीर्वाद से मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-

माघे मासे कृपा पूर्णिमां, यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

माघ या भोगली बिहू:-

असम में माघ महीने की संक्रांति के पहले दिन से माघ बिहू यानि भोगाली बिहू पर्व मनाया जाता है। भोगाली बिहू के मौके पर खान-पान धूमधाम से होता है। इस समय असम में तिल, चावल, नरियल और गन्ने की फसल अच्छी होती है। इसी से तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाकर खाये और खिलाये जाते हैं। भोगाली बिहू पर भी होलिका जलाई जाती है और तिल व नरियल से बनाए व्यंजन अग्नि देवता को समर्पित किए जाते हैं। भोगली बिहू के मौके पर टेकेली भोंगा नामक खेल खेला जाता है साथ ही इस पर्व पर अपने अपने शक्तिशाली भैंसों की लड़ाई भी होती है।

वैशाखी:-

वैशाखी पंजाब में सिख समुदाय द्वारा मनाये जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है। वैशाखी के मौके पर पंजाब में गेहूं की फसल कटने लगती है और किसानों का घर खुशियों से भर जाता है। गेहूं को पंजाब के किसान कनक यानि सोना मानते हैं। वैशाखी के मौके पर पंजाब में मेले लगते हैं और लोग नाच गाकर अपनी खुशियों का प्रदर्शन करते हैं। पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान के बाद लोग मंदिरों और गुरुद्वारों में दर्शन करने जाते हैं।

मकर संक्रांति पर इन सभी धार्मिक परंपराओं से हिंदू धर्म में मीठे पकवानों के बगैर हर त्यौहार अधूरा सा है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डू और अन्य मीठे पकवान बनाने की परंपरा है। तिल और गुड़ के सेवन से ठंड के मौसम में शरीर को गर्मी मिलती है और यह स्वास्थ के लिए लाभदायक है। ऐसी मान्यता है कि, मकर संक्रांति के मौके पर मीठे पकवानों को खाने और खिलाने से रिश्तों में आई कड़वाहट भरी दूरी भी दूर होती है और हर हम एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ते हैं। कहा यह भी जाता है कि मीठा खाने से वाणी और व्यवहार में मधुरता आती है और जीवन में खुशियों का संचार होता है।

तिल और गुड़ की मिठाई के अलावा मकर संक्रांति के मौके पर पतंग उड़ाने की भी परंपरा है। गुजरात और मध्य प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में मकर संक्रांति के दौरान पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर बच्चों से लेकर बड़े तक पतंगबाजी करते हैं। पतंग बाजी के दौरान पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से गुलजार हो जाता है।

तीर्थ दर्शन और मेले
मकर संक्रांति के मौके पर देश के कई शहरों में मेले लगते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत में बड़े मेलों का आयोजन होता है। इस मौके पर लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान, धर्म करते हैं।कुम्भ का मेला इसी दिन से प्रथम शाही स्नान के साथ प्रारम्भ होता है।और अबकी बार सत्यास्मि मिशन का भी शिविर वहाँ लेगा।

!!सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनायें!!

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org

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One comment

  1. Ji guru ji. Jai satya om sidhaye namah.

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