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पूर्णिमा पुराण में वर्णित छट पूजा की महिमा और इसके पीछे का विज्ञान बता रहे हैं – श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

 

छठ पूजा (सूर्य और षष्ठी देवी पूजा) पृथ्वी अवतरण दिवस और छठा आज्ञा चक्र जागरण की योग विज्ञान व्रत कथा(पूर्णिमाँ पुराण से) :- बता रहे है स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी..,

 

जब सत्य नारायण भगवान और सत्यई पूर्णिमाँ ने एकोहम् बहुस्याम घोष-एक से अनेक हो जाऊ के घोष से ये अनादि सृष्टि में अपनी जीव,जगत,नक्षत्र सूक्ष्म,स्थूल आदि सर्वसृष्टि उत्पन्न की। तब उसकी उत्पत्ति के लिए सबसे पहले उनका प्रेम प्रकाश जिसे सूर्य कहा जाता है,उसका अवतरण हुआ और सूर्य के साथ उसकी शक्ति सविता की भी उत्पत्ति भी हुयी,तब इन दोनों के संयोग से एक एक क्रम से सात ग्रहों की मुख्यतया रचना हुयी-1-ब्रह्स्पति ग्रह-2-शुक्र-3-शनि-4-बुध-5-मंगल-6-पृथ्वी-7-चन्द्रमा आदि।

 

 

 

इस प्रकार सूर्य और सविता से उत्पन्न ये पाँच ग्रह संतानों में कोई भी सूर्य और सविता की इछित सृष्टि को सम्भालने और पालने की सामर्थ्य नहीं रखता था,तब ये देख सूर्य और सविता ने भगवान सत्य नारायण और सत्यई पूर्णिमाँ से प्रार्थना की कि-भगवन हमें एक ऐसी सन्तान दो जो आपकी समस्त जीवन प्रयोजनों की हमारे द्धारा उत्पन्न सन्तान उस जीवन का लालन पालन कर सके,ये सुन भगवान सत्य ने पूर्णिमाँ से कहा कि-हे देवी-अब तुम अपना एक अंश स्त्री स्वरूप में जो माता का स्वरूप धारण कर सके इन्हें प्रदान करो।ताकि हमारी संसारिक जीवों की विभिन्न सृष्टि हो सके,उनका ये अनुरोध सुनकर पूर्णिमाँ देवी ने अपना एक प्रबल हरित शक्ति तेज को उत्पन्न किया और सूर्य और सविता को प्रदान किया,जिसने सविता के गर्भ से जन्म लिया, यो सूर्य और सविता की छटी सन्तान होने के कारण पृथ्वी को छटी देवी या षष्टी देवी के नाम से जानते है,चूँकि पृथ्वी सूर्य और सविता में भगवान सत्य और सत्यई पूर्णिमाँ के शुद्ध हरित शक्ति तेज से उनकी सोलह कला शक्ति में से छठी शक्ति सर्वप्रथम सिद्धा देवी उत्पन्न हुयी है।जो सभी जीव जगत के सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली है। यो इसको ही हरित या हरियाली देवी के रूप में भी पूजते है और इन्हें ही भर्गो भी कहा जाता है। और सूर्य की छटी संतान स्वरूप राशि भी कन्या है इससे पहली और अंतिम सारी राशियाँ सम्पूर्णता स्वरूप में नहीं है।यही कन्या राशि ही एकल स्त्री स्वरूप है यो ये पृथ्वी स्वरूप है। तब इन्ही देवी की उपासना का व्रत और पर्व को सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश होने के समय पर मनाया जाता है। यो कार्तिक मास की दीपावली से चतुर्थी से लेकर छठी तिथि को ही सूर्य देव और सविता देवी ने सबसे पहले अपनी छठी संतान पृथ्वी की पूजा की थी,ताकि इस पर उनकी सर्वजीवों की सृष्टि फ़ले फूले और प्रसन्न रहे।यो तो चैत्र माह की छठी तिथि को भी इसी दिवस को मनाया जाता है।और इसी के उपरांत सनातन धर्म में आज के दिन को छठी देवी यानि पृथ्वी देवी के जन्मोउत्सव के रूप में भी मनाते है।
इस दिन अपने क्षेत्र की पवित्र नदियों और गंगा में या उसकी साहयक नदियों और सरोवरों में स्नान करते हुए,सूर्य और सविता को छः बार अंजुली में भरकर जल का अर्ध्य दिया जाता है।चूँकि वो लौटकर पृथ्वी पर ही आशीष स्वरूप स्त्री और पुरुष भक्तों को मिलता है यो ये अर्ध्य पृथ्वी को ही अर्पित होता है।इस दिन अपने अपने प्रान्तों के अनुसार खीर,गुड़ से बने खादय पदार्थो आदि का प्रसाद खाया और बांटा जाता है।आदिकाल में मूर्ति का प्रचलन नहीं था,यो यही विधि उपासना को अपनायी जाती थी की जीवन्त को पूजों।जबकि सूर्य हमारी आत्मा का संसारिक प्रतीक स्वरूप है और छठा चक्र आज्ञा चक्र है,जहाँ स्त्री शक्ति और पुरुष शक्ति की सूक्ष्म शक्ति मन शक्ति का शक्ति स्वरूप कुण्डलिनी का समापन होता है।इसके उपरांत सातवें चक्र सहस्त्रार चक्र में ये प्राण और मन की स्थिति नही होती है,वहाँ केवल स्वयं की शाश्वत स्थिति है यानि आत्मा के दो स्वरूप स्त्री और पुरुष और उनका केवल प्रेम स्वरूप,जिसे परमात्मा यानि आत्म की परम् अवस्था ही शेष होती है।इसे ऐसे भी समझें- कुंडलिनी योग में पहला चक्र मूल यानि मूल बीज से सृष्टि की उत्पत्ति का है।
दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान यानि स्वयं का निवास अर्थात जहाँ जिसका ये शरीर है उसकी आत्मा के स्थूल स्वरूप का निवास स्थान है।
तीसरा चक्र नाभि यानि इस शरीर के जितने भी संसारी सम्बन्ध है उन सभी सम्बन्धों और उन सम्बंधों के निर्माण में जितने भी परस्पर कर्म है और ये समस्त सम्बंधित कर्मों की क्रिया और प्रतिक्रिया कर्मों की समस्त सृष्टि इसी नाभि चक्र में होती है।
चौथा चक्र है-अनाहद यानि जहाँ अनादि+हद या सीमा की उत्पत्ति होती हो या यही जितने भी आत्मा के विश्व योनियों से सम्बन्ध और सम्बंधित कर्म है उनका इसी चक्र में प्रत्यक्ष सजीव चित्रण होता है यो ये भावना चक्र है।
पांचवा चक्र है-कंठ या विशुद्धि चक्र अर्थात जहाँ आत्मा तुम्हारे स्वरूप का और उसके समस्त भावनाओं का शब्दों और सम्बन्धों का प्रत्यक्ष कथनी और करनी के रूप में जिसे वचन या संकल्प भी कहते है,उसका संसारिक और आध्यात्मिक व्यवहार होता है।
और छठा चक्र है-आज्ञा यानि आत्मा की जो मूल इच्छा है जिसे ब्रह्म वाणी या ब्रह्म ज्ञान भी कहते है जो वेद हैं उनका सत्य स्वरूप में पालन करना और कराना ही आत्मा की आज्ञा रूपी घोष है,जिसे वेदों में ईश्वर का एकोहम् बहुस्याम या एक से अनेक हो जाऊ तथा स्वयं और स्वयं की दो विभक्ति शक्ति को एक रूप में दर्शन करना जिसका नाम अर्द्धनारीश्वर या प्रत्यक्ष स्त्री और पुरुष का एकल रूप की आत्म अनुभूति है और यही स्वरूप में प्रत्येक आत्मा को-अहम् ब्रह्मास्मि या अहम सत्यास्मि का अनुभूत होना है,कि मैं हो तो शाश्वत और सत्य तथा सर्वत्र हूँ।क्योकि इसके उपरांत तो सांतवा चक्र में स्वयं में स्वयं की शक्ति का प्रेम विलय शेष है।यो ये छठ चक्र भेदन की योग पूजा कहलाती है।
यहीं छठ पूजा का सच्चा अर्थ है।यो जो नित्य गुरु विधि से गुरु मंत्र जपता हुआ ध्यान करता है,उसे सूर्य और सविता यानि अपनी आत्मा और उसकी शक्ति के दर्शन होते है।

 

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

www.satyasmeemission.org


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