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14 नवंबर बाल दिवस पर स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज की विशेष रचनाएं

 

 

 

 

 

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन के तौर पर दर्ज है, उनके निधन के बाद इस दिन को बाल दिवस के तौर मनाया जाता है। मान्यता है कि चाचा नेहरू बच्चों से बेहद लगाव रखते थे इसी वजह से इस दिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

 

 

!!14 नवम्बर “बाल दिवस की सत्यता!!

 

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के मुताबिक आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने भारत की आजादी के बाद बच्चों की शिक्षा, प्रगति और कल्याण के लिए बहुत काम किये और इस वजह से बाल दिवस नेहरू के नाम पर मनाया जाता है।

 

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बाल दिवस को अपनी कविता के माध्यम से बता रहें हैं : –

 

 

तू जन्म मरण के बन्धन से
पुनः मुक्ति पाने को आया।
यूँ भर किलकारी आत्म घोष
इस नवीन जन्म पा मुस्काया।।
रो रहा तू क्या इसी बोध से
पुनः जीवन नाम मृत्यु वरण सहूँ।
या यो हंसता है तोड़ ही दूंगा
अब की बार इस चक्रव्यहू।।
मन्द मन्द मुस्का रहा और
कभी बिन कारण भरें आँखे आँशु।
कि क्या योजना है?मुझ पर
कौन होगा सहयोगी इनमें वासु।।
इसी चिंतन में पुनः निंद्रा पकड़े
जो क्रतिम निंद्रा नाम सुखद।
भूल गया तू योग निंद्रा
वही विस्मरण नाम है जग दुखद।।
अभी समय है ओ ईश पुत्र
आगे तुझे मिले समय नहीं।
सीखेगा जब तू चलना छलना
पुनः हाथ ना आये सत्य पथ कहीं।।
बड़ा होकर ढूंढेगा यही
जो छोड़कर आया कितनी बार।
दूजे से सुख पाने कि अमर चाहत
भरा रहेगा आजीवन रो अश्रु धारदार।।
और पुनः जानेगा सत्य गत्य
और वही पकड़ेगा योग निंद्रा।
और डूबेगा मृत्यु मझदार उसी
जाने मिले ना मिले समाधि निंद्रा।।
यो हो जा तू अभी सावधान
मत पकड़ ऊँगली वासना निंद्रा।
अभी चढ़े नेत्र तेरे सहस्त्रार चक्र
वही देख सत्य प्रभात सूर्य चन्द्रा।।
तू मुझे मैं तुझे हूँ देख रहा
और मोन भरा दे रहा आशीर्वाद।
अब इसी ज्ञान स्वागत तुझ है
पा आत्मसाक्षात्कार मिटा मृत्यु विषाद।।

 

********

 

 

 

पुस्तक-पुस्तकालय-मेला दिवस-पर उसके सच्चे अर्थ को कविता के माध्यम से बता रहें हैं-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी…

 

 

घर में लगा जो पुस्तक मेला
उसे भी कभी स्वच्छ करो।
उन्हें व्यवस्थित पुनः सजाओ
और पुस्तक पाठन को प्रेरित करो।।
चाहे पुस्तक किसी क्षेत्र हो
वो सदा ज्ञान का करती वर्धन।
कल्पना सहित सद रूचि बढ़ाएं
प्रेरित करती मानवता सृजन।।
समाधान करें अनसुलझे प्रश्न
और उत्तर देती जीवन के पहलू।
मित्रता बढती नव परिभाषा अर्थ
उत्साहित करती खेल नव खेलूं।।
अपने संग ले चलो बच्चों को
और मित्रों को पुस्तक मेला घुमाओ।
सार गर्भित ज्ञान पुस्तक देती
संग्रहित कराती चित्र विचित्र कथाओ।
ये थोपे नहीं स्वं प्रकट ज्ञान को
और देती अनगिनत अक्षर ज्ञान।
यो सम्मान सदा पुस्तक का करना
ये मिटाती बन गुरु अभिमान।।
यो उठो अभी निज पुस्तक देखो
और उनकी पोंछो झाड़ो घूल।
संग पढ़ो उन्हें आनन्दित ज्ञान पा
पुस्तक हैं जीवन की जीवंत सुगंधित फूल।।

 

 

*****

 

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org

 

 

 


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One comment

  1. Jay satya om siddhaye namah

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