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सिद्ध शनि पीठ के संस्थापक स्वामी सत्येंद्र जी महाराज ने कुछ इस तरह शुरू की नवरात्रि की पूजा

स्वामी सत्येंद्र जी महाराज के अनुसार आज से हिन्दू नववर्ष का पहला दिन है और आजसे ही चैत्र नवरात्रे शुरू हो रहे हैं। चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस महीने से शुभता और ऊर्जा का आरम्भ होता है। ऐसे समय में मां दुर्गा की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

नवरात्र एक प्रमुख त्यौहार है। इस दौरान 9 दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। स्वामी जी के अनुसार एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में कुल मिलाकर चार बार नवरात्र आते हैं लेकिन चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं। बसंत ऋतु में होने के कारण चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र तो शरद ऋतु में आने वाले आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है। इस साल चैत्र नवरात्र 18 मार्च से शुरू होकर 25 मार्च तक रहेंगे। 26 मार्च को कन्या को भोजन करवाकर व्रत खोला जायेगा। माँ दुर्गा की पूजा के साथ-साथ शनि भगवान के नाम का भी एक दीपक जला कर शनि भगवान की आराधना कर मंदिर में रखा जाए तो सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं।

“स्वामी सत्येंद्र जी महाराज के अनुसार माँ दुर्गा के साथ-साथ अपनी माँ जननी जो आपके साथ रहती हैं उनकी पूजा भी आपकी सच्ची नवरात्रि होगी। अगर माँ के प्रातः सायंकाल पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं तो साक्षात् माँ ईश्वरी का सर्व कल्याणी वरदान प्राप्त होने से सभी कष्ट संकट और कर्ज दुःख मिट जायेंगे ये सभी सन्तों वे साथ-साथ स्वामी सत्येंद्र जी का सच्चा अभुभव है। ऐसा करने से शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।”

नवरात्र में देवी मां के 9 रूपों की पूजा की जाती है।
माँ शैलपुत्री
माँ ब्रह्मचारिणी
माँ चंद्रघंटा
माँ कुष्मांडा,
माँ स्कंदमाता,
माँ कात्यायनी,
माँ कालरात्रि,
माँ महागौरी और
माँ सिद्धिदात्रि
ये माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग रुप हैं। चैत्र नवरात्र का महत्व इसलिए होता है क्योंकि इस महीने से शुभता और ऊर्जा का आरम्भ होता है। ऐसे समय में मां दुर्गा की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

माँ की नवरात्रि पूजा

मैं पूजता अपनी माँ को
          जिसने मुझको जन्म दिया।
ममता स्नेह और शिक्षा का
           जिसने प्रथम ज्ञान दिया।।
वही मेरी सरस्वती देवी
            और वही मेरी लक्ष्मी माँ।
साहस सीखा जिताया भय से
                वहीं है मेरी काली माँ।।
बैठ गोद में जिसे निहारा
       और मिटे लिपट सभी आभाव।
वही सजीव जीवंत मूर्ति
       दस महाविद्य रुपी मेरी छाँव।।
ये सही नहीं,ये उत्तम है
      दोष निर्दोष मिटाया मेरी आँख।
भूखें को दो पहले निवाला
      सिखाती निज दे फल एक फाँक।।
डाँटती तभी जब सीमा तोडू
        दे दंड में दंडित ना रख भाव।
देख मेरी आँख में आँशु
      पिघल लगा गले स्व रोती आँख।।
पिता के कुल में जन्म लिया
      पर बड़ा हुआ इस माँ के साथ।।
घटित गठित हुआ मैं केवल
           इस जीवित माँ के हाथ।।
जिसने धोयी पाप दृष्टि
              और भरा नारी सम्मान।।
मिटा अमावस भोर भरी मुझ
      दी पहली प्रभात नव मुस्कान।
मेरे प्यार की पहली ज्योति
    पुचकार मुझे दिया पहला मान।।
नो माह की अंध रात्रि
         मुझे पोषित किया अपने गर्भ।
वहीं मुझे दी अन्तर्वाणी
       चतुर वेद गायत्री घोष सन्दर्भ।।
मेरे पूर्व जन्म के काटे
          लेकर देकर मुझ निज पूण्य।
एक ज्योति मुझ ह्रदय जलायी
    इसी माँ ने सुना दिव्य अन्तः धुन।।
वही मेरा नाँद है अनहद
     और वही मेरी है अखंड ज्योत।
उसी की प्रत्यक्ष माँ मूरत पूजू
  यही मेरी चैतन्यता चैत्र नवरात्रि होत।।
अनुभव ही सर्व आत्म ज्ञान है
         और प्रत्यक्ष की करो सेवा।
दोष ना देखो कभी किसी के
   उस सीखो सुधरो जीवन खेवा।।
ईश्वर तुम्हारे रूप में स्थित
      नित्य जगत में नर नारी रूप।
दूजे प्रेम करो और बांटो
   और ध्याओ स्वयं में ईशस्वरूप।।
जो अपने परिजन सुख देता
       वही जीवित होता ऋण मुक्त।
जो दुःख देता नित दिन स्वजन
    वहीं भोगे नरक दुखद हो युक्त।।
सेवार्थी बनी माँ को है देखा
       उपेक्षा कर निज कष्ट घनघोर।
सदा परिजन हित सलंग्न हो
   तृष्कार को दे एक मुस्कान की भौर।।
उस पाठशाला प्रथम से अंतिम
         मेने पाया जीवंत मोक्ष ज्ञान।
उस माँ पथ पर चल रहा आज हूँ
      सदा प्राप्त शाश्वत माँ प्रज्ञान ।।
सत्य स्वरूप साक्षात् है माँ का
          ॐ विलोम से माँ सृष्टि पूर्ण।
सिद्धायै माँ प्रेम अखंड है
    नमः है जन्म मुक्ति माँ सम्पूर्ण।।
माँ नाम सब मंत्र श्रेष्ठ है
                 माँ में सृष्टि है जीवंत।
माँ जप ध्यान कुंडलिनी जागे
         माँ नाम सर्व मुक्ति प्रदन्त।।
यो माँ माँ कह पुकारो
        और अपनी माँ की करो पूजा।
माँ की छवि मन ही मन ध्यायो
          माँ ही ईश्वर जीवित दूजा।।
माँ से जन्म जीव जगत है
                 अमावस उसका गर्भ।
गर्भ विलोम भर्ग बीज गायत्री
     यही प्रथम दिवस चैत्र नव स्वर्ग।।
यो माँ से ही सनातन धर्म प्रारम्भ
             और माँ मातृत्व से नववर्ष।
माँ पूजा से नववर्ष मनाओ
      नो दिन माँ माँ घोष मानकर हर्ष।।
जय माँ जय जननी जय तेरी
             जय जय माँ जय तारणहार।
जय प्रत्यक्ष मुझ जीवन दाता
      जय माँ सदा तेरी जयकार।।

🙏जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः🙏

www.satyasmeemission.org


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