Breaking News
BigRoz Big Roz
Home / Breaking News / महावतार श्रीमद पूर्णिमां की युवती षोढ़शी कला अवतार कन्याकुमारी देवी द्वारा वाणासुरन वध की चमत्कारिक कथा का पूर्णिमां पुराण से वर्णन करते स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

महावतार श्रीमद पूर्णिमां की युवती षोढ़शी कला अवतार कन्याकुमारी देवी द्वारा वाणासुरन वध की चमत्कारिक कथा का पूर्णिमां पुराण से वर्णन करते स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

महावतार श्रीमद् पूर्णिमा की युवती षोढ़षी कला अवतार कन्याकुमारी देवी द्धारा असुर वाणासुरन वध की चमत्कारिक कथा,को(पूर्णिमा पुराण)से उद्धभाषित करते हुए बता रहें है स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी….

सतयुग की बात है की-गुरुदेव शुक्राचार्य से आज्ञा लेकर राक्षस राज वाणासुरन ने भगवान शिव की घोर तपस्या से ये वरदान यूँ मांगा की:-

जहाँ तीन सागर का संगम हो
और सूर्य चाँद संग दे दर्शन।
युद्ध में कुमारी कन्या मारे
तभी जाये प्राण मेरे हो हर्षन।।

अर्थात-मुझे कोई कुमारी कन्या हो और तीन सागरों का त्रिवेणी संगम का सथान हो तथा वो भी तब मार पाये-जब सूर्य और चन्द्रमाँ एक साथ आकाश में दिखाई दे और वर्ष की प्रथम पूर्णिमां की रात्रि और भौर का समय हो।ये सबी सुनकर श्री प्रभु ने उसे मनवांछित वर दे दिया!!

ये वरदान पा कर असुर सम्राट ने त्रिलोक में विजय प्राप्त करते हुए हाहाकार मचा दिया,तब त्रिदेवों ने श्री भगवान सत्यनारायण और भगवती सत्यई पूर्णिमां के समक्ष पहुँच कर प्रार्थना की-हे भगवती सत्यई पूर्णिमां आप ही इसका समाधान करें! तब ये प्रार्थना सुनकर देवी पूर्णिमां ने आशीर्वाद वचन त्रिदेवों सहित सन्तों को दिया की-मैं अपने षोढ़षी अवतार के रूप में पृथ्वी पर चक्रवर्ती सम्राट् भरत के यहाँ जन्म लुंगी और वाणासुर का वध करूंगी।तब ये अभय वचन सुन कर त्रिदेवों सहित सभी सिद्ध सन्तों ने अपने अपने लोकों को प्रस्थान किया और देवी पूर्णिमां की लीला की प्रतीक्षा की।बाद के वर्षो में वर्तमान का ये दक्षिण देश का ये कन्याकुमारी का भाग दक्षिण भारत के महान शासकों चोल, चेर, पांड्य के अधीन रहा है। यहां के स्मारकों पर इन शासकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस स्थान का नाम कन्‍याकुमारी पड़ने के पीछे उपरोक्त यहीं पौराणिक कथा प्रचलित है।समयानुसार भारत पर शासन करने वाले महाराज भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र हुए। महाराज भरत ने आगे चलकर वनवास से पूर्व अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उनकी पुत्री कुमारी को मिला। ये कुमारी ही को महावतार पूर्णिमाँ की शक्ति देवी का षोढ़षी अवतार माना जाता है,क्योकि इनका जन्म महाराज भरत ने घोर तपस्या के उपरांत ही पूर्णिमां के दिन हुआ था । तब पूर्णिमां माता की कुमारी अवतार ने कुमारी होकर भी दक्षिण भारत के इस हिस्से पर कुशलतापूर्वक शासन किया था । उसकी ईच्‍छा थी कि- वह शिव से विवाह करें। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि- वरदान स्वरूप बानासुरन का देवी कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण उनकी लीला से और भगवान शिव की भी लीला से शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इसी बीच बाणासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला, तो उसने देवी कुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा।देवी कुमारी ने कहा कि- यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा, तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ और अंत में चैत्र पूर्णिमा के दिन ही दोनों सागरों-हिन्द और अरब सागर के त्रिवेणी संगम के स्थान में एक साथ उदय और अस्त होते सूर्य और चन्द्र के समय के मिलन बिंदु महूर्त में ही सनातन वर्ष के प्रारम्भ में चैत्र पूर्णिमां के दिन ही देवी कन्याकुमारी ने अपने बाण से बाणासुरन को मृत्यु प्रदान की,और संसार में सर्वत्र सुख और शांति दी। यो कन्याकुमारी के स्मरण में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। और माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया।जो जब चैत्र की पूर्णिमां की प्रातः और साय में सूर्य और चन्द्र की अद्धभुत बेला में स्वर्ण की भांति वहाँ आने वाले भक्तों और सैलानियों को आनन्द देता हुआ,माता कन्याकुमारी और पूर्णिमां का स्मरण दिलाता है।
आगे चलकर कलियुग की समाप्ति पर जब पुनः स्त्री युग का प्रारम्भ हुआ जिसमें- स्वामी विवेकानन्द को इसे के समक्ष अपने देश की स्वतन्त्रता और स्त्री जाति की सर्वभौमिक उन्नति की उनकी गुरु रामकृष्ण और पत्नी माता शरदामणि के दिव्य दर्शन से समुन्द्र में स्थित चटटान पर तीन दिन की समाधि में दर्शन हुए और वे पूर्णिमाँ की अवतार कन्याकुमारी के आशीर्वाद से विश्व विजयी हुए,यो यहां उनका भी दर्शनीय स्मारक बना है।और वर्तमान में सत्यसाहिब जी ने चैत्र नवरात्रि के उपरांत की पूर्णिमाँ को ही स्त्री शक्ति को इसी दिन पुरुषों से अपनी पत्नियों के लिए प्रेम पूर्णिमां व्रत रखवाया और साथ ही अविवाहितों ने भविष्य में उत्तम पत्नी की प्राप्ति को और विधुरों ने भी अपनी दिवंगत पत्नी के प्रेम स्मरण में ये व्रत पूरी श्रद्धा से पूरा किया।।
और इस व्रत के रखने से अनेक भक्तों को मनोवांछित लाभ हो रहे है।इस विषय में मेरे अन्य लेखों और वीडियो में पढ़े और देखें।


श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय जय पूर्णिमाँ माता
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org


Discover more from Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Check Also

वाराणसी में हिंदू लड़की ने 6 मुस्लिम युवकों का सिर काटकर काली माता को चढ़ाया? सोशल मीडिया पर वायरल दावे का जानिए पूरा सच

वाराणसी में हिंदू लड़की ने 6 मुस्लिम युवकों का सिर काटकर काली माता को चढ़ाया? सोशल मीडिया पर वायरल दावे का जानिए पूरा सच

Leave a Reply

Discover more from Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Subscribe