[भाग-14]
स्त्री का सहस्त्रार चक्र अर्थ,रंग आक्रति,विषय आदि:-
सहस्त्रार का सह+स्त्रार=यहाँ लौकिक भाषा में तो सहस्र का अर्थ हजारो और त्रार का अर्थ श्रंखला या पंखुड़ियों वाला स्थान दल या कमल आदि है।पर सच्चा अर्थ है- स माने वही यानि जो अपने को जानना चाहते है यानि स्वयं,ह उसकी उपस्थिति का विस्तार है,स वही जो जानना चाहता है यानि वही सत्य शास्वत है,त्र माने उसकी त्रिगुण अवस्था यानि जो वह स्वयं है और शाश्वत सत्य सनातन है,वो किससे बना है,उसमें जो स में जो ह उपस्थिति है,वो यानि इस सबका द्रष्टा+द्रश्य यानि सहयोग और उस सहयोग यानि दूसरे द्धैत का संग लेकर अपने को और उसे अपने से पूर्ण कर इस सब संयुक्त अवस्था का साक्षी है,वो सब उसकी त्रिगुण अवस्था-मैं+दूसरा मैं+इन दो मैं की संयुक्त अवस्था+वो कब तक संयुक्त हैं+रहेंगे+फिर अलग होंगे+फिर जुड़ेंगे+और ये सब क्यों हो रहा है,इस अद्धैत से द्धैत और पुनः अद्धैत की त्रिगुण अवस्था का साक्षी सह है।और उसका त्राण यानि भोग क्रिया रमण+योग क्रिया रमण+शेष आदि तक का स्थान सब मिलाकर सहस्त्रार चक्र कहलाता है।यो इसे राज चक्र(क्राउन चक्र) जहाँ से ये सब आत्म राज्य की सृष्टि-विस्तार-पुनः लय होता है।
अब इस आत्मा का ये सब विस्तार साम्राज्य कहाँ तक है और किस किस में है,वे सब तत्व क्षेत्र कहाँ और कैसे है? ये विषय आता है। तो वे सब इस चक्र से अनगिनत छोटे छोटे चक्रों यानि स्वक्षेत्रों के रूप में एक दूसरे से जुड़े होते है।यहीं सब एक छत्ता सा बना हुआ सब मिलाकर सहस्त्रार चक्र कहलाता है।ये अलग अलग जो छोटे छोटे अनगिनत चक्र क्षेत्र है,वही सब वैज्ञानिक भाषा में ग्रन्थि,सेल्स,तन्त्रिका आदि नाम से जाने जाते है।जिन्हें लगभग 84 लाख या और भी अधिक संख्या में माना गया है और यही सब मूल आत्मा की अनन्त या 84 लाख योनियाँ है।जो इस मूल सहस्त्रार चक्र जो कुछ हद तक पियूष ग्रन्थि जेसी है,उससे अन्तःस्रावी प्रणाली के साथ सम्पर्क स्थापित करने के लिए एमैन्युल हार्मोन्स स्रावित करती है,तथा साथ में एक दूसरे से केंद्रीय तन्त्रिका तंत्र से भी जुडी रहती है। तब इन्हीं 84 लाख योनियों में अपनी प्रबल प्रवर्ति के अनुसार आत्मा सभी में जन्म लेती है,यहां इसका और भी व्यापक अर्थ है की- मूल आत्मा का इन सभी 84 लाख या अधिक में जागर्ति होते ही इन सर्व योनियों में मैं ही व्याप्त हूँ,का प्रत्यक्ष अनुभव व् सिद्धि यानि परिपूर्णता होती है।यो ही ज्ञात या अज्ञात रूप में हम सब जीव जगत एक दूसरे से जुड़े और एक दूसरे में आवागमन कर सकते है,या बिन भाषा के अपने मनोभाव संचरित कर और समझ सकते है।यो शास्त्र कहते है की-इन सब जीवों में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है।जबकि ये सत्य नहीं है।सभी योनियाँ अपने अपने स्तर पर सम्पूर्ण है।क्योकि वो सब भी मूल आत्मा की सम्पूर्ण अवस्था के रूप है,वहां मूल आत्मा जिसे परमात्मा भी कहते है,वो समान रूप से बटी व् स्थित है।यो सबका सब योनियों में आना जाना सम्भव है और आवश्यकता भी नहीं है,क्योकि आप जिस योनि में है,उसी को सम्पूर्ण रूप से प्राप्त कर लेने पर अन्य की प्राप्ति का आभाव समाप्त हो जाता है।यो हम अपनी उस अवस्था में आने पर यही कहते है की-हम पूर्ण है। वेसे अबतक पुरुष सहस्त्रार चक्र का रंग बैंगनी रंग का देखा गया है।पर इस चक्र का कोई विशेष रंग नहीं है,ये सभी रंगों का मूल रंग है,जो सूर्य की भांति सप्तरंगों का सार तेज है,स्त्री में ये कुछ हरे रंग की आभा वाला होता है,जिसके चारों और एक एक वलय यानि वृत के रूप में अन्य अभी रंग होते है।जिस प्रकार ये सूर्य पृथ्वी मंडल से बाहर निकलने पर हमें हरे रंग को घेरे सप्तरंगी वलयमण्डल के समिश्रित रंग जो केवल तेज रूप में श्वेत सा दीखता है।और सहस्त्रार चक्र के मध्य भाग में जब समस्त चेतना शक्ति इकट्ठी होती है,तब उन दोनों के एकीकरण के घर्षण से ईं नामक स्वर,घोष,नाँद वहाँ सुनाई आता है। तब ईं जो की कोई अक्षर नहीं है,बल्कि ये साक्षात् कुण्डलिनी की चेतना शक्ति स्वरूप है,केवल इसी में मूलाधार से सहस्त्रार और अंत में “अंग यानि म” जहाँ मैं की दो मात्रा के स्थान पर केवल एक मात्र अद्धैत अवस्था म ही बीजावस्था में आदि मध्य और अंत बनकर शेष रहता है।तब इसी से पुनः सृष्टि होती है।तब इसके चारों और षोढ़ष सोलह कला शक्तियों का विश्व वृत या प्रकाश या विस्तार रहता है।
ये ईं का इस सहस्त्रार चक्र के ऊपर के भाग यानि केंद्र भाग में आत्म स्वरूप पूर्णिमाँ यानि साधक स्वयं के दर्शन होते है।
सहस्त्रार चक्र में मूल शक्ति है-प्रज्ञा शक्ति जो इसकी प्रकर्ति शक्ति है,उसी का अनेक नाम है-ब्रह्म,मेघा शक्ति आदि।और इस शक्ति का दूसरा भाग का नाम है-ब्रह्म यानि विस्त्रित या आदि अंतहीन अनंत।यो यहाँ युगल शक्ति है,जिसे ब्रह्म+शक्ति=ब्रह्म शक्ति या आत्मा कहते है।आत्मा-आ आदि अनादि+त तत्व व् तत्वतीत+मा यानि विस्तार आदि अर्थ आत्मा है।यो यहाँ आत्मा जो की पांच तत्वों से बनी है-अ+आ+त+म+आ=आत्मा।और ये ही पांच तत्व आगामी विस्तार है,ये ही नीचे के पांच चक्र भी है, और पुनः इनका अपने इसी मूल में सिमटना है।यही सहस्त्रार का कुण्डल चक्र यानि कुंडलिनी है।
जब सहस्त्रार चक्र में से शक्ति नीचे की और प्रवाहित होकर अपना विस्तार करती है,तब उसका इस प्रकर्ति में गुरुत्त्वकर्षण बल से उसके 100% में से केवल 1 या 2 या बहुत हुआ 10% ही भाग विस्तार पाता है।इसका कारण है,मनुष्य में जो स्त्री तत्व है,उसी का इस आत्म ज्ञान से अनंत काल से अनेक काल आदि के कारणों से परिस्थितिवश दुरी होनी।जैसे-जब हम धर्म शास्त्र पढ़ते है,तब उनमें वर्णित है की-जब ब्रह्म और उसकी शक्ति ब्रह्मयी या सत्य और उसकी शक्ति सत्यई से जो स्त्री और पुरुष के रूप में अंनत स्वरूपों की सृष्टि हुयी,तब सब में उसी ब्रह्म और ब्रह्मयी या सत्य सत्यई के जैसी शक्ति थी।और फिर युगों के अंतराल से वो शक्ति कम होती चली गयी और उसे फिर एक तपस्या नामक प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया जाता रहा है।जो आज तक विज्ञानं नाम से प्रचलित है।इसका अर्थ है की-ये आत्म शक्ति कैसे कम हुयी और इसपर कैसे ऐसा मल दोष चढ़ गया,जो स्वयं के ज्ञान व् शक्ति की प्राप्ति को इतना भयंकर परिश्रम करना पड़ रहा है।
और यही सब ज्ञान जानकर जब इस अज्ञान की वक्री कुंडलाकार सीमा को तोड़ा जाता है,तब उस तोड़ने को ही कुण्डलिनी जागरण कहते है।और तब शक्ति मूल सहस्त्रार से लेकर मूलाधार चक्र तक बिन किसी क्रम के सीधी बहने लगती है और तब ये स्थूल शरीर+सूक्ष्म शरीर+कारण शरीर एक हो जाता है और ये अवनाशी शरीर बन जाता है।तब पंचतत्व अपने मूल तत्व सहित सम्पूर्ण में निर्विघ्न प्रकट हो जाते है।तब हमारा ये शरीर तेजोमयी होकर सदा प्रकाशित हो उठता है।तब इच्छा और क्रिया एक हो जाते है।तब इच्छा के साथ साथ स्वयमेव क्रिया होती और मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं।तभी ये योग नियम बनाये है-“यम”-माने म्रत्यु के पाँच कारण-अस्तेय+ब्रह्मचर्य+अपरिग्रह+ सत्य+अहिंसा।और इन्ही को जानकर इस पांचो पर द्रढ़ होकर रहना ही “नियम” नामक सोपान है।और जब ये पाँचों नियम हमारे जीवन में बिन किसी प्रयत्न के सहज स्वभाव में बन जाते है,तब ये ही पांचों नियम के द्धारा आई स्थिरता ही “आसन” नामक तीसरा सोपान यानि स्तर कहलाता है और जब ये पांचों नियम स्थिर होकर हमारे प्रण यानि संकल्प और उसके विस्तार आदि में सहज हो जाते है,तब ये पंच संकल्प ही प्राणायाम नामक सोपान कहलाता है,जिसका दूसरा अर्थ प्राणों का आयाम यानि हममें जो भी मूल चेतना शक्ति जो सहस्त्रार चक्र से नीचे को दो भाग में गति कर रही है,वह कहाँ से कहाँ तक विस्तारित हो और सिमट रही है,इस पर अधिकार होता है,तब ये चेतना शक्ति स्वेच्छित के स्थान पर (यानि हमने ही इसे ऑटो पायलेट किया है) अपने नियंत्रण में आ जाती है।तब ये प्राणायाम यानि संकल्प शक्ति या चेतना शक्ति पर अधिकार हो जाता है।तब इस अधिकार को प्रत्याहार यानि प्रत्य प्रत्येक समय और अहार यानि ग्रहण या धारण किये रहना ही प्रत्याहार नामक पांचवा सोपान कहलाता है।यहाँ पर पांचों भौतिक पँच तत्व का सम्पूर्ण शोधन हो जाता है और अब इस संकल्प शक्ति या चेतना शक्ति को निरन्तर धारण और ग्रहण करते हुए अपना सहज स्वभाव बना लेना हो धारणा नामक छठा सोपान कहते है और जब ये चेतना शक्ति सहज हो जाये,तब जो धेय यानि आत्म उद्धेश्य है यानि लक्ष्य है,वो आयन यानि प्राप्त हो जाता है,यो इस अवस्था को ध्यान कहते है,जो सातवीं अवस्था है।और जब ये चेतना शक्ति और उसका चेतन यानि मूल और शक्ति का एक हो जाने का योग बढ़ता है,तब ये दोनों एक दूसरे के समान हो जाते है,इसी समानता का नाम समाधि है,यानि सम माने बराबर और धि माने मूल और शक्ति की संयुक्त अवस्था,मिलकर समाधि कहलाती है।जो आठवी अवस्था है।और इसके बाद ये समाधि में दो अवस्था बनी रहती है-1-समतावाद यानि कोई दो हैं,जो एक हो रहे है।और दूसरी-2-केवल दो नहीं अब एक ही शेष है।यो पहली समाधि को सविकल्प यानि दो का भेद कहते है और दुसरी जो निर्विकल्प यानि अब कोई दो और उनका द्धंद नहीं है,समाधि कहते है।ये नवमी अवस्था या सोपान कहते है।अब इससे भी आगे एक अवस्था है।जहाँ इस एक अवस्था में जो इस एक के पीछे है,उसका साक्षात्कार होना।और वो हम स्वयं ही है।तब स्वयं का साक्षात्कार होना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है।तब सच्चा अवतारवाद यानि अहम सत्यास्मि बोध होता है।
यही सब संछिप्त में सहस्त्रार चक्र साधना कहलाती है।
इसे समझ कर अध्ययन करके जब आप इसी क्रम से रेहि क्रिया योग का अभ्यास करेंगे और गुरु निर्देशो पर चलेंगे।तब आपको सत्य की उपलब्धि होगी।
और अनेक ज्ञान रहस्य आगामी लेख में कहूँगा।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyaasmeemission.org
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