[भाग-12]
विशुद्धि चक्र का अर्थ-रंग-वर्ण,जीव प्रतीक आदि:-
विशिष्ठ शुद्धि-किसकी शुद्धि यानि जो भी तत्व है-जैसे यहाँ का तत्व है-आकाश और प्राण है-समान वायु और उसके शक्ति मूल बीज है-मं और उसके उपसहयोगी 16 बीजमंत्रों व् उनकी शक्तियां जो कंठ चक्र में विराजमान है,उनकी विशेष प्रकार से शुद्धि करने का नाम ही विशुद्ध चक्र है।
ये विशुद्धि चक्र का केंद्र रंग हल्के पीलेपन लिए फिर पूर्ण श्वेत प्रकाशित चन्द्रमाँ और उसके बाहर अनगिनत स्वर व्यंजनों वर्णों को विस्तारित करती कणिकाएं और फिर पंचतत्वी प्राणों का पंचतत्वी पुष्प और फिर हरित प्रकर्ति वृत,फिर नीले और गुलाबी मिश्रित रंग आभा वृत,फिर फिरोजा रंगीत आकाशीय वृत परिधि,फिर षोढ़षी शक्ति कला पत्तियां यो ये सारा कुछ नीले या फिरोजी रंग आभायुक्त षोढष कमलदल जैसा होता होता है।यहां पुरुष में चतुर्थी चंद्रमा होता है और स्त्री में पूर्णिमासी का चन्द्रमाँ होता है,जो सम्पूर्ण दायित्वों आदि का प्रतीक है।और दो हंस और हंसनी यहां सभी पुरुष और स्त्री वर्णाक्षर और उनकी शक्ति तथा आत्मा के दोनों पक्ष के जीव रूप प्रतीक है।
आकाश तत्व:- यहां ये जो दिखाई देता आकाश तत्व है,वो स्थूल आकाश तत्व है,जो नीचे के चार तत्वों का मिश्रित रूप है,पर चक्र से ये स्थूल(शारारिक) और सूक्ष्म(मानसिक) और अतिसूक्ष्म(सूक्ष्म शरीर) तत्व आकाश के तीनों स्तरों से जो गुण यानि क्षमताएं तथा अवगुण यानि दोष और इनसे परे होने को जो साधना की जाती है,उससे जो शुद्धता की प्राप्ति होती है,यही शुद्धता ही सिद्धि कहलाती है,तब जो शुद्ध तत्व हमें प्राप्त होता है,वो है-चिद्धाकाश।ये ही वो मूल तत्व है,जिससे ये स्थूल आकाश बना है।और जब इस आकाश तत्व का मूल आकाश तत्व की हमें प्राप्ति हो जाती है,तब हमें इस अनंत स्थूल आकाश में जो भी कुछ है-अनन्त ब्रह्मांड आदि,वो सबका ज्ञान और उससे जो भी प्राप्ति चाहिए,वो सब उसके मूल से ही वहीं के वहीं बेठे प्राप्त हो जाता है।तब सभी शब्द और उनके समस्त वर्ण और उनके भी मूल तत्वों पर यानि जिनसे ये वर्णाक्षर बने है और उनसे जो भी भाव भावना और अर्थ प्रकट होते है,वे सब पर अधिकार हो जाता है। आकाश के तीन स्तर है-1-वर्तमान आकाश-2-परा आकाश यानि सूक्ष्म आकाश-3-परमाकाश यानि अति सूक्ष्म आकाश और इन तीनों के पीछे का व्योमाकाश जिसे शून्य भी कहते है,यहाँ शून्य का अर्थ निष्क्रिय नहीं है,शून्य का अर्थ है-विशिष्ठ चेतना शक्ति,जो इस आकाश आदि तत्व की जनक है और इनकी निर्माता होते हुए भी इनसे परे है।वहाँ पहुँचने पर यानि उसमें स्थिति होने पर ही इन तीनों आकाश के बीच जो एक सन्धिकाल अवस्था है,एक वैवयिक तरल पर्दा है,जिससे ये परस्पर जुड़े है,उसे देख पाता है,और उससे ही साधक के लिए इन तीनों आकाशों से किसी भी आकाश के बीच से दूसरे आकाश में जाने की और आने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।तब सामान्य लोगो को उस योगी की ये सिद्धि एक प्रकार से पर्दे के पीछे छिपने जेसी दिखती है।यही इस स्थूल शरीर की म्रत्यु होना और सूक्ष्म शरीर का सूक्ष्म आकाश में विचरण करना और फिर से जन्म लेकर स्थूल शरीर में आना आदि जो भी क्रम अवस्थाएं है,वो सब समझ और अधिकार में आ जाती है।यहाँ सोलह बीजाक्षर ही सोलह कलाएं है।यो साधक को सोलह कलाओं पर अधिकार हो जाता है।क्योकि ये कंठ चक्र पर सभी पंच तत्वों का स्थूल-सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म अवस्थ का विषय समाप्त हो जाता है।यो जो भी ये ब्रह्माण्ड है और उसकी स्थूल-सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म तन्मात्राओं की यानि अणु-परमाणु से निर्मित सभी अवस्थाएं है,उन सबका ज्ञान और अधिकार प्राप्त हो जाता है।तभी इसी अवस्था पर ब्रह्म और उसकी शक्ति की स्थिति कही है।जिसे हम ब्रह्मदेव और सरस्वती भी कहते है।तब पुरुष साधक स्वयं ब्रह्म और स्त्री साधक ब्रह्ममयी ब्रह्म शक्ति कहलाती है।
चक्र में कैसे बीज वर्ण की स्थापना है:-
आकाश का पहला अक्षर है-अ और इसी को यहां प्रथम रूप में स्थापित करके आगे के सारे अक्षर रखें गए है।और अंत में अं से समापन है यानि आकाश का मुलाकाश में विस्तार होकर पूर्ण होना।यो यहाँ तीन आकाश के तीन मूल बीज मंत्र है-1-अ-2-ओ-3-अं।ये ॐ के ही तीन आकाश स्वरूप बीजाक्षर रूप है।ये रहस्य है।जो विकट ध्यान से इस क्षेत्र पर अधिकार होने पर प्राप्त होता है।तब जो पुरुष कंठ चक्र का मूल बीज मंत्र है-हं-ह+म=हम यानि उसकी स्वयं के रूप और शब्द की उपस्थिति अर्थ है।
ऐसे ही तब स्त्री के कंठ चक्र का मूल बीजमंत्र है-मं-म+म=मम् यानि उसकी स्वयं की शब्द और रूप की उपस्थिति है।
स्त्री में कंठ चक्र में तीन आकाश के बीजमंत्र है:-
स,त,य,अ,उ,म,स,ई,द,ध,आ,य,ऐ,न,म,ह।में से प्रथम-मध्य-अंत से तीन बीजाक्षर है..
1-स-2-अ-3-ह।जो सअह यानि इनका सही उच्चारण सोहं है।और इस सोहं मंत्र से उसी की त्रिकाल आकाश-स से अर्थ वह और सनातन शाश्वत आकाश यानि व्यापकता है – और अ ध्वनि को भाषा विज्ञानं में श्व कहते है,और ये कंठ चक्र का मूल बीजवर्णाक्षर है और यहीं इसका स्थान भी है,यो ये अ तन्त्रशास्त्र में पहला अक्षर यो है की-ये सृष्टि के सृष्टिकर्ता की आकुलता को प्रकट करता है,यो ये सर्वप्रथम अक्षर अनन्त आकाश रूप है – और ह माने सूरज यानि आत्मा यो इस ह से यानि भुत-वर्तमान-भविष्य में स्थिति है।यो इस सोहं से स्त्री ही स्वयं कंठ और उसका क्षेत्र आकाश आदि की जनक से लय तक स्वामी है।
यहाँ सोलह बीजाक्षर हैं-स,त,य,अ,उ,म,स,ई,द,ध,आ,य,ऐ,न,म,ह।जो सिद्धासिद्ध आत्म महामंत्र सत्य ॐ सिद्धायै नमः के सोलह कला शक्ति बीज है।
इस कंठ चक्र पर यानि यहाँ पर सभी मन्त्रों का विलय हो जाता है और सच्चा मोन का उदय होता है।तब इस मोन में साधक को सभी भाषा और उसके जनक वर्णों का और उनके सही अर्थो का ज्ञान हो जाता है।तब वो बिन बोले सब बोलता है।यानि वो केवल वर्णाक्षर से नहीं उसके मूल भाव और उस भाव के रूप को सबमे प्रकट करके बात करता है।यहाँ प्रश्न होगा की फिर मोन कहाँ हुआ? यहां अर्थ है की-वो जो भी सामने है,उसकी जो भी लौकिक या अलौकिक मनोकामना है,उसे बिन कहे,उसके शब्द में बदलने से पूर्व ही केवल मूल भाव से जान कर उसे उसी भाव में पूर्ण कर देता है।तभी कहते है की-
बिन मांगे निर्झर मिले,मांगे मिले न वर।
यहाँ पहुँचने पर सभी भाषाओँ का और उनसे निर्मित सभी शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है।तब उसे कुछ पढ़ने जानने की आवश्यकता नहीं होती है।वो केवल प्रेम को जानता मानता और अभिव्यक्त करता यानि उससे ये स्वयं बिन प्रयास के होते है।यहाँ पंचतत्वों का और उनके पांचो प्राणों का विलय होने से उड्डियान बंध लगता है और उससे साधक के इन पांचों प्राणों का मूल सार चेतना शक्ति चित्त शक्ति चिद्धाकाश से आज्ञाचक्र में चित्तकाश में प्रवेश करती है,तब साधक का कंठ पूर्ण कुम्भक के बल से पूर्ण बंद हो जाता है,और सर कुछ जरा सा आगे झुका होकर ठुड्डी कंठ गड्ढे की और उसे बिन छुए सही मुद्रा में स्थित हो जाती है।
इसकी सामान्य साधना से ही व्यक्ति के सभी शब्द और स्वर शुद्ध हो जाते है,वाणी निर्णल और मीठी हो जाती है।और तभी यहीं सभी कंठ से निकलती बुराईयों के रूप में विष को धारण करने के कारण शिव को नुलकंठ कहा जाता है।यानि उस समय ये कण्ठ अपने सम्पूर्ण आकाश तत्व को प्रकट करता है,यो इसे नीला रंग का दिखाते है।यहीं सरस्वती अपने सप्त राग वीणा से बजाती प्रदर्शित की है।
कंठ चक्र के रोग और निवारण:-
यहां जो गलग्रन्थि यानि थायरॉयड हार्मोन्स उत्पन्न होते है,उनकी इस चक्र में आई विकृति से भाषा में कटुता,विकृति,उच्चारण में दोष,शारारिक विकास से लेकर मनुष्य के आंतरिक अनेक हार्मोन्स की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है।यो इसका उपाय ॐ उच्चारण या पुरुष को हं हम् या स्त्री को मं मम् का उच्चारण करना और जालंधर बंध लगाने को यहां बताया है।उससे ये रोग धीरे धीरे ठीक हो जाता है।
रेहि क्रिया योग करते रहने से साधक स्वयं ये सब स्थितियां प्राप्त कर लेता है।यो अभ्यास करते रहो।बहुत से गम्भीर रहस्य गुरु सानिध्य में ही उनकी कृपा से सीखें जाते है।
स्त्री का आज्ञाचक्र और उसके बीजमंत्र आदि भिन्नताओं के विषय में आगामी लेख में बताऊंगा।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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