श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज माँ वगलामुखी के जन्मोत्सव से जुड़ी सत्यकथा का जिक्र कर रहे हैं जिसे पूर्णिमा पूराण से लिया गया है।
पुर्णिमा पुराण से श्रीमद वगलामुखी देवी की जन्मोत्सव की सत्य कथा:-
इस विषय पर स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब ही बता रहे है..
जब अनादिकाल में सत्यनारायण और सत्यई पूर्णिमां ने सृष्टि उत्पन्न की तब उन्होंने मनुष्य में व्याप्त क्रिया और प्रतिक्रिया स्वरूपी भौतिक भोग और आध्यात्मिक योग गुण- काम-क्रोध आदि आठ विकार और दया शांति आदि आठ सुकार,जिन्हें मिलाकर सौलह कला यानि “षोढषी शक्ति पूर्णिमाँ” कहते है,वो प्रकट और प्रदान की,जिससे मनुष्य का जीवन चक्र चलता है।तब इन दोनों अष्ट विकार और अष्ट सुकार में जो क्रिया और प्रतिक्रिया का बाहरी और आंतरिक संघर्ष होता है,जिसके तीन प्रकार होते है-प्रथम संसार और जीव की नवीन सृष्टि को स्त्री और पुरुष के मध्य क्रिया-जिसे काम क्रिया कहते है और द्धितीय है, स्त्री और पुरुष रूपी ये संसार में जो परस्पर उनकी संसारिक आवश्यकताओं की लेन और देन है,उसमें जो साधन आदि उपयोग होते है,जिसका सबसे महत्त्वपूर्ण है-भाषा और मुख्यतया है-धन..तो इस धन रूपी लेन देन के व्यवहारिक क्रिया को जो व्यक्ति के लक्ष्य की प्राप्ति कराये,उसे लक्ष्मी कहते है,और तीसरा है-आध्यात्मिक लेन देन की प्रेम क्रिया,जिसके अंतर्गत दीक्षा से लेकर स्त्री और पुरुष शक्ति के सूक्ष्म रूप ऋण और धन शक्ति का अंतर संधर्ष,जिससे कुण्डलिनी जाग्रत होती है और अंत में प्रेम का आत्मसाक्षात्कार होता है,तो इस अंतर संघर्ष की क्रिया का नाम है-रमण..जो सर्वोच्चतम क्रिया है।यो ये तीन क्रिया योगों की स्त्री और पुरुष रूपी मनुष्य जीवन में सन्तुलित रूप में बड़ी आवश्यकता होती है,तब जो इस तीनों में थोडी सी भी कमी या अधिकता के होने से जो असन्तुलन का भीषण आवेग उठता है,जिसे मनुष्य जीवन में विपदा,विनाश और प्रकर्ति में बवंडर, तूफान कहते है,इन तीन प्रकार की स्थिति को- प्रथम नियंत्रित और द्धितीय संतुलित और तृतीय स्तम्भित करने के लिए ही एक त्रिशक्ति स्वरूपी क्रिया शक्ति की विद्या को अवतरित करते हुए मनुष्य को प्रदान किया,जिसे “वगलामुखी विद्या” कहते है।
ये वगलामुखी जिसे बहुत से बगलामुखी विद्या देवी भी कहते है,जिसका मूल मंत्र-
ॐ ह्रीं वगलामुखी देवी सर्व दुष्टानां वाचां मुखम्,पदम् स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं फट् स्वाहा..
अर्थात हे देवी- मेरे सभी प्रकार की मुख से निकलने वाली दुष्ट विकृति भाषा और बोलने की बुरी भावना को मेरी जीभ के निकलने से पूर्व ही मेरे मुख में ही समाप्त कर दो और मेरे किसी के अहित करने की और पथ पर चलने वाले कदमों को रोक दो और मेरी बुद्धि में आने वाले सभी अष्ट विकारों का विनाश कर दो और मुझे सदबुद्धि प्रदान कर मेरे ज्ञान का विस्तार करो..
ये इसका सच्चा अर्थ है,जिसे कथित भक्तों ने शत्रुओं के विनाश को अर्थ बनाकर उपयोग किया और करते है।जो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है,क्योकि संसार में सभी प्रकार के स्त्री और पुरुष रूपी मनुष्य और जीव और उनके सोलह भाव भी सब ईश्वर के प्रदान किये है,यो ईश्वर जो सर्वज्ञ और सर्व सामर्थ्यशील है,वो किस भी अपने स्वरूप का कभी बुरा नही कर सकता है।क्योकि जेसे रात्रि का महत्त्व है,वेसे ही दिन का महत्त्व है।यो सभी गुण और अवगुणों का अपना अपना सम्पूर्ण महत्त्व है।वेसे तो वगलामुखी देवी का अवतरण दिवस बैशाख माह की चतुर्दशी मंगलवार की अर्द्धरात्रि को हुआ था,पर शास्त्रों में इन्हें किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को इनकी जप साधना प्रारम्भ करने विधान कहा है।यो शुक्ल पक्ष की अष्टमी जो होली या दीपावली के बाद आती है,या तब जो प्रथम गुरुवार पड़ता है,उस को दोनों अष्ट विकार और अष्ट सुकार के मध्य की अष्ट शक्तियों को नियंत्रित करने वाली क्रिया शक्ति वगलामुखी विद्या देवी की साधना दिवस मनाया जाता है। और जो इस विद्या का सत्य अर्थ के साथ चिंतन करता है,उसका सर्व कल्याण होता है। और उसे अंत में सोलह कला शक्ति की सम्पूर्ण अवस्था श्री विद्या-पूर्णिमाँ की प्राप्ति होती है।।
इस देवी को पीताम्बरा भी कहते है,क्योकि ये क्रिया शक्ति है,जिसका रंग वर्ण पीला होता है और बीज मंत्र ह्रीं है,यो इसे त्रिदेव और त्रिदेवी – ब्रह्मा+सरस्वती(इच्छा शक्ति)-विष्णु-लक्ष्मी(क्रिया शक्ति) और शिव+शक्ति(ज्ञान या आनन्द शक्ति) की मध्य शक्ति क्रिया शक्ति विष्णु और लक्ष्मी का एक रूप वैष्णवी शक्ति भी कहते है,यो क्रिया शक्ति का रंग पीले रंग होने से भौतिक जगत में इसे स्वर्ण धातु का स्वरूप भी मानते है,यो यही रंग इसकी पूजा में उपयोग होता है- यो भक्त सरसो के तेल का अखण्ड दीपक जलाये और पीला वस्त्र,पीले फूल,पीला चन्दन,हलदी की माला,पीतल से निर्मित देवी प्रतिमा और गुरुवार दिन तथा दिन हो या रात्रि का मध्य मिलन बिंदु का पहर समय,जिसे समय या काल का संघर्ष या रमण काल भी कहते है,उस समय के सन्धिकाल में जप ध्यान साधना करनी चाहिए।ये सब गुरु से पूछकर कर करे।अन्यथा तो सामान्य साधक को सरसों के तेल का अखण्ड ज्योत पूजाघर में जलाकर और पीले बूंदी के लड्डुओं से देवी का भोग लगाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें और गाय या पीले रंग के कुत्ते या जो मिले उसे खाने को दे, और ब्राह्मण या मन्दिर में धन का दान करें, तो ही भक्त पर देवी की कृपा होती है।उसकी सभी दुविधाओं और द्वन्दों तथा विवादों का नाश और स्तम्भन होकर शांति की प्राप्ति और ज्ञान मिलता है।आज ऐसा ही करें
और जिस भक्त के पास श्री विद्या यानि सत्य पूर्णिमाँ की क्रिया योग ज्ञान मंत्र विधि है,उसे ये बगलामुखी या सभी प्रकार के काम या संघर्ष-विवाद या द्धंद-रमण शक्ति की स्वयं ही प्राप्ति हो जाती है।
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जय सत्य सत्यई पूर्णिमाँ की जय
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय वगलामुखी देवी की जय
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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Jai guru ji kids. Jai satya om sidhaye namah.
Jay satya om siddhaye namah