इंसान जब तक जीवित रहता है तब तक वह कई रिश्तों के बीच में रहता है। लेकिन जब व्यक्ति का निधन होता है तब वह सब छोड़ छाड़ कर चला जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मृत व्यक्ति के मरने पर केवल शरीर का अंत होता है लेकिन उसकी आत्मा समाप्त नहीं होती। उसकी आत्मा की दिशा उनके कर्मों पर ही निर्भर करती है। हिंदू धर्म में इस व्यवस्था के लिए कर्मकांड की व्यवस्था की गई है। जिसमें सबसे अहम होते हैं श्राद्ध और पिंडदान। इसके जरिए ही पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कामना की जाती है।
श्राद्ध यानि पितृपक्ष (भाग तीन) का पुराणों में महत्व, कैसे श्राद्ध करने से मिलती है पितरों को मुक्ति? कैसे करें श्राद्ध? क्या मिलेगा फल? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज…
पितृपक्ष यानि ऋण शोधन- प्रायश्चित दिवस ज्ञान और इस सम्बन्ध में श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के व्यक्तिगत प्रत्यक्ष अनुभव यानि स्वामी जी के परदादा, दाऊजी, पिता की मृत्यु उपरांत पुनर्जन्म दर्शनानुभूति:-
(सद्गुरु बोध-पुस्तक से)
[भाग-4]
पितृपक्ष के रहस्य को लेकर मेरे मन बड़ी जिज्ञासा रही, की इसका असल सत्य क्या है? क्या सच्च में हमारे मृत हुए पितृ किसी लोक आदि में जाते है? या पहले यमराज के यहाँ फिर वहां से उनके पाप और पूण्य और उसका दंड या लाभ का निर्णय सुनते हुए उन्हें फिर स्वर्ग या नरक मिलता है? तब इस सबके उपरांत ऐसा शेष कर्म क्या शेष रह गया जो ये आगामी मनुष्य योनि की प्राप्ति को ईश्वर के अगले आदेश की प्रतीक्षा करते किसी पितृ लोक नामक स्थान में किस प्रकार के जीवन शैली को अपनाते हुए अपना शेष जीवन सूक्ष्म शरीर में बिताते है?
क्या सत्य में इन्हें मृत्यु उपरांत उस तेरह दिनों की अवधि में किये गए सभी मुक्ति आदि के उपाय-मंत्र जप-दान-वस्त्र,गाय,स्वर्ण आदि आदि इनको प्राप्त होते है? ये तेरह दिन का रहस्य क्या है?
क्या जिस पंडित या ब्राह्मण को हमने अपने पितृ की मुक्ति के लिए ये सब दान दिए है, उससे मंत्र जप कराये है,क्या वो ब्राह्मण स्वयं इतनी सामर्थ्य रखता है? की जिसके आत्म या मंत्र बल से वे सब दान की वस्तुएं आदि उसके द्धारा ग्रहण करने के उपरांत सूक्ष्म स्वरूप धारण करती हुए हमारे पितरों तक पहुँच उनके नवीन जीवन का उन्नत पथ दे सकती है? जबकि हमे ऐसा कोई ब्राह्मण इस संसार में तो नही दिखाई देता? तब कौन ऐसा सामर्थ्यशाली ब्राह्मण है? और ब्राह्मण का सत्य अर्थ क्या है?
क्या पितरों की मुक्ति के लिए प्रतिवर्ष आते इस पूर्णिमा से आगामी अमावस तक के सोलहवें दिवसीय पितृ पक्ष का किस प्रकार से सूक्ष्म लोकों से सम्बन्ध है? और है भी या नहीं?
और इस बीच आखिर कितने वर्षों तक हमारे तीन पीढ़ियों के पितृ-हमारे पिता और माता-हमारे दादा और दादी और तीसरे परदादा और परदादी और परिवार में जन्में सन्यासी या सन्यासनी जिन्हें हम अपने वंश की देव या देवी के मनुष्य अंश उपदेवता भी कहते है, उन्हें कब तक और कितने वर्षों तक ऐसे अनुष्ठानों से मुक्ति मिलती है? और इतने मुक्ति नही मिलती, इतने वे क्या बन्धन में रहते हमारे सपनों में आते रहते है?
या केवल हमारी ही उनके साथ बितायी जीवन शैली का अनेक स्म्रति अंश हमारे सपने बन हमें हमारे भय और निडरता को रख बनते हुए हमें दीखते है?
और अंतिम प्रश्न-की जब उन्हें अपने जीवित जीवन में जो उनके किये कर्मो के दंड उन्हें बीमारी,दुर्धटना,धन और सम्मान की हानि या यही सब वरदान स्वरूप मिलते है,तब ऐसे कौन से शेष और कर्म रह हए है? की जिनका दंड और वरदान उन्हें स्वर्ग और नरक के रूप में ऊपर जाकर मिलता है? और जब उन्हें अपने जीवित जीवन में भी उनके किये का दंड और वरदान मिला और ऊपर जाकर भी उन्हें दंड के रूप में नरक में तरहां तरहां की यातनाएं मिली, तब उन यातनाओं के उपरांत उन्हें अगला जन्म मिलता है? यानि उनके पापों का दंड मिल गया,अब कुछ दंड नहीं बचा है, ये तो अर्थ हुआ, तब कौन सा बचा कर्म से उन्हें नया जन्म मिला? यानि उनकी आत्मा अब पिछले सभी जन्मों के किये कर्मों के दंड पा कर पाप मुक्त होकर शुद्ध हो गयी है, तब तो उनकी आत्मा फिर से पवित्र होकर इस धरती पे नया जन्म लेगी,तब क्यों उसे नीचे आकर फिर से प्रारम्भ से ही दंड मिलता है? और यदि पाप समाप्त हो गए थे, तब उन्हें वरदान के रूप में मिला स्वर्ग और एश्वर्य भोगने को वहाँ ऊपर मिले, तब क्या उनके वे शुभ कर्मों के करने से जो स्वर्ग और एश्वर्य मिला वो समाप्त हो गया? तब वे आत्मा तो ना पाप ना पूण्य कर्मो से युक्त रही? तब तो वे एक दम शुद्ध और नई आत्मा है? तब उन्हें कैसे इस धरती पर किस कर्म को फिर से देकर भेजा जाता है और कैसे वे आते ही दंड और वरदान पाती है? ऐसे अनेक प्रश्न मेरे ध्यान में घूमते रहते थे। जिनका कोई सत्यपूर्ण उत्तर सभी पूर्व सनातन धर्म और अन्य धर्मों के शास्त्रों में कोई वर्णन नही मिला,तो अब मेरी खोज मेरे अपने सामने हुए अपने पितृ जिन्हें मैं जानता था, उनकी मृत्यु उपरांत उनमें ध्यान करने से प्राप्त हुये।
जो यहाँ स्थान आभाव के कारण इस प्रकार से संछिप्त है:-
लगभग अगस्त की बात है, मैं गांव गया वहाँ हमारे दाऊजी महेंद्र सिंह खेतों पर खाट पर लेटे विश्राम कर रहे थे। वे मुझसे धर्म चर्चा करते हुए अपना हाथ मुझे दिखाने के लिए बढ़ाते बोले-की भई अब तुम मुझे बताओं की मेरी कितनी आयु शेष है? मेरी नानी और माँ सब लगभग सौ वर्ष के आसपास मृत्यु को प्राप्त हुई थी, मैं भी इतनी ही प्राप्त करूँगा? ये सुन मैं बोला-दाऊजी क्या तुम्हें नही लगता? की तुम्हारा पोता तुम्हारे सामने ही योगी हो गया और एक तुम हो, जो मुझे तो इतनी भाषा आती भी नहीं, जितनी की तुम्हें अच्छी संस्कृत और फ़ारसी,उर्दू भाषा,और रामचरित्र मानस कंठस्थ है। और आप बड़े ताकतवर और संयमी व्यक्ति रहे हो,यो यदि तुम इन पर इतना ध्यान देते, तो तुम जितनी भूमि और इन सब बातों पर ध्यान देते, तो इस सबसे बड़ी सम्पत्ति यानि जिसे योग कहते है, वो प्राप्त कर लेते,और दाऊजी तुम्हें क्या लगता है? की ये जमीन जो आज तुम्हारे नाम है, यदि मेरे नाम आती है,वो मैं तुम्हारे नाम कर दूँ कि- मैं इसे नही ले रहा, तो क्या तुम इसे अपने साथ ले जाओगे? वे बोले आज तक कोई नही ले गया।तब ऐसी बातों के उपरांत भी उन्होंने फिर से अपनी मनसा रखी,ये देख मैं अचानक बोला-दाऊजी तुम अबका जाड़ा नही पकड़ोगे!! फिर और बातें होते करते हुए उन्हें नमन कर,मैं इसी चिंतन को लेकर की-अरे ये मेरे मुँह से क्या निकला? शहर चला आया और उनके नाम से मैने सवा लाख जप करने प्रारम्भ कर दिए की- ये जीते जी अपना पितृ ऋण मेरे से ले जाये।और वे उसी वर्ष के आने वाले दिसम्बर में,उन्हें अचानक दस्त हुए और वे सहज ही मृत्यु को प्राप्त हुए और उनका जन्म भी 12-12-1912 का ही था। तब मेंने जपकाल में ध्यान में देखा था की- दाऊजी का सारा शरीर एक हलकी सी सूर्य प्रभा तेज से चमक रहा है, पर उनके पैरों के टखने से नीचे का भाग कुछ काला सा है।ये अपने संयमी जीवन और शुभ कर्मों के कारण और मेरे जप के परिणाम स्वरूप तेजोमय सूक्ष्म शरीर को प्राप्त हुए और अपनी हठधर्मिता और अनेक परिवारिक विवादों में ही पड़े चिंतन करने के फलस्वरुप इनके पैरों की और दोष कर्म शेष रहे। जिससे उन्होंने आगामी जन्म में उच्चतर परिवार में जन्म लिया।
-ऐसे ही जब मेरे छोटे भाई अंजय की नियुक्ति दिल्ली सब इंस्पेक्टर पद पर पुलिस में हुयी थी उससे पूर्व ही मैने देखा था की- मैं और मेरे मामा के बड़े लड़के वीरपाल भाई एक जंगल से गुजर रहे है। तो दूर एक झोपडी है, उससे कुछ धुँआ सा निकल रहा है, जैसे वहां कुछ कार्य हो रहा हो, यो हम दोनों वहां चले गए, अंदर झाँकने पर देखा की- एक व्यक्ति कोने में जमीन पर बैठा खेस ओढ़ कर, पुराने कोट पहने, हुक्का पी रहा है। और उसके दूसरी और एक अर्द्धनग्न व्यक्ति कढ़ाई में हलुवा जैसा कुछ बना रहा है, जैसे ही हमने झोपडी में प्रवेश किया, तो हमें देखते हुए, वे व्रद्ध व्यक्ति बड़े भैया से बोले-अरे वीरपाल आ जा.तुझे बुखार है ला झाड़ दूँ,यूँ कह उन्हें आशीर्वाद देते हुए मुझसे बोले की-जब इस परिवार में जन्म लिया है, तो अवश्य कुछ तो करूँगा,पर मेरी जगह पर जो पैसे पड़े रहते थे, वहाँ अब कुछ नही रहता है. यो कह सब द्रश्य समाप्त हो गया और ध्यान खुल गया था। तब मैने विचार किया ये कौन थे? स्मरण करने पर स्मरण आया की-ये वेशभूषा तो मैने चाचा के यहाँ जो बूढ़े दाऊजी यानि हमारे परदादा रतनसिंह जी की थी(जन्म 1889-मृत्यु1962) और वो स्थान जहाँ वे कह रहे थे, की पैसे नही छोड़ता,वो तो उनकी समाधि बनी है,ये बड़े नियमित शिव भक्त और जल चढ़ाते थे और इनके पिता शिवसिंह ने कन्याओं के उपरांत इन्हें और इनसे छोटे भाई उदयसिंह को नगरकोट की जात लगाने के मनोरथ से पुत्र रूप में पाया था यो ये उनके भी भक्त थे,इन्होंने जमींदारी समय अनेको जनकल्याण कराये थे, यो उनके प्रति मान्यता करने वाले अन्य गांवों के, वहां रास्ते से निकलते हुए लोग वहाँ पैसे चढ़ाते थे,जो उनकी समाधि की छत्त पे रुक जाते और ग्वालिया बच्चों को मिल जाते थे।तब कुछ समय उपरांत अंजय को सफलता मिली और ये भी बात सच निकली की, वीरपाल भाई को उन दिनों बुखार ही चल रहा था। जो अचानक ऐसा लगने पर उतर गया की- जैसे किसी ने उन्हें स्पर्श किया हो।और इसके उपरांत वे मुझे कभी नहीं दिखे, यो घर में बताने पर माता जी ने कहा की- जब भी कोई बच्चा पैदा होता था, तब ये ही बुड्ढे रूप में वही कोट पहने मेरी चारपाई के सिरहाने खड़े दीखते थे, और सब सहज ही हो जाता था,पर वेसे कभी नहीं दीखते थे।और नाही मुझे फिर दिखे।इनके विषय में आगामी लेख में कहूँगा।
– मेरे पिता श्री जगदीश्वर तौमर जिनका जन्म 11-12-1934 को पैत्रक गांव चंगोली ककोड़ बुलंदशहर में अपने परिवार सबसे बड़े पुत्र के रूप में हुआ था, ज़मींदारी सम्पन्न घर में जन्म लेने से इनकी माध्यमिक शिक्षा मेरठ उपरांत,ग्रेजुएशन और लॉ इलाहबाद युनिवर्सटी से हुयी।इनके बारे में यहां विशेष यही लिखना चाहूँगा, की इनकी एक्सिडेंड में मृत्यु का कारण क्या और कैसे घटा?-इनको अपने पूर्वजन्म के प्रारब्ध के कारण सभी कुछ मिला.पर वर्तमान के अपने विशेष कर्मों की व्रद्धि करने में इन्होंने कोई विशेष प्रयत्न कभी नही किया-मुख्यतया इन्होंने सभी क्षेत्रों में जनसहायक होने के कारण अनेक प्रतिस्पर्धिक विवाद तो उत्पन्न किये, पर उनका कभी सफलतम समाधान नही निकाला. जिसका परिणाम ये हुआ की इनके शत्रुओं ने इनके ऊपर विकट तांत्रिक अनुष्ठान किये-जैसे-ये प्रारम्भिक गांव प्रधानी आदि पदों के विवादों से लेकर मुख्यतया ककोड़ इंटर कॉलिज के प्रबन्धक रहे, उसमें इनके परिवारिक प्रतिद्धंद्धी सुखपाल आदि जो देवी के स्वयं अनुष्ठान करते और सदूर प्रदेश में भी कराते थे.तब इसी सन्दर्भ में इनके नाम राशि के व्यक्ति जग्गो पंडित जी की माँ पर देवी के भावावेश आने पर इनसे कहा था, और उपाय में इन्हें चैत्र और क्वार नवरात्रि के दोनों व्रत पुरे रखने को कहा था, यो तब से ये उन्हें रखते थे,पर उसमें भी इनका व्रत रखना बड़ा विचित्र था-कोई मंत्र या पाठ नही करते, बस छोटी से अंगारी जलाकर ऊपर आहुति. जय माँ.. करके डालते रहते और बहुत समय व्यतीत करते, यो उन दिनों में आने वाले इनसे चकबन्दी के मवक़्क़िल प्रतीक्षा करते रहते, और यदि किसी ने बीच में इन्हें बुलाने को आवाज दे दी, तो फिर इसकी खेर नहीं और यही स्थिति घर में सभी की रहती थी, विशेषकर माता जी की, फिर उनकी भी खेर नही, यो यहाँ आप देखेंगे की जो भी साधक किसी भी स्त्री प्रधान शक्ति की आराधना कर रहा है, वो यदि प्रत्यक्ष में अपनी पत्नी की उन्ही दिनों में तृष्कृत करता हुआ पत्नी के मन में विक्षोभ उत्पन्न कर दे,तब क्या उसकी साधना और क्या उस पर कृपा होगी? यो सदा धर्म में साधक को सुख और सिद्धि प्राप्ति के नियमों में चेताया गया है-की आपकी माँ,पत्नी,पुत्री,बहिन,बुआ इन स्त्री पक्ष को सदा प्रसन्न रखें, क्योकि ये ही आपसे सर्वाधिक प्रेम करती आपकी सर्वभौमिक उन्नति को ह्रदय से इच्छा करती है, और यही अपने मन में छोभ पाने पर ना चाहते हुए भी शाप भी देती है, यो इनके शाप और वरदान की कोई काट नही है। ठीक ऐसे ही इनके और इनके भाई तेगबहादुर द्धारा अनेक बार अपनी छोटी बहिन सुंदरी की साहयता किये जाने और उसे भूमि आदि दिलाने में लाभों के चलते और उनके द्धारा भी इन्हें समय पर साहयता देने पर, इनकी बहिन की अपनी बढ़ाई करने और दूसरे का अपमान करने की बुरी आदत के चलते परस्पर सम्बन्ध समाप्त हो गए, उन्हें किसी भी परिवारिक आयोजनों में बुलाया नहीं गया,यो इस तृष्कार के चलते अपनी कमियों को नहीं देखते हुए, उन्होंने इन दोनों पर तांत्रिक अनुष्ठान कराये जो की- मुझे घरेलू विवादों के कारणों को जानने के विषय में ध्यान किये जाने पर, अनेक बार ध्यान में दिखे, जिनमें एक बहुत बाद का देखा, इस प्रकार से स्मरण है की- 1/2-4-2004 एकादशी गुरुवार को प्रातः देखा की घर का फर्श उखड़ रहा है बीरपाल भाई कह रहे है. की लाख का घेरा लगवालो. तब देखा की घर का नया फर्श पड़ रहा है और मेरी सफेद मोतियों की जप माला(जो की जपने के उपरांत गले में पहन लेता था) के सीधे साईड के 8-10 मोती आग में जल चट कर के सफेद कांच से हो गए है, और उन्हें मैं बिन यानि एकत्र कर रहा हूँ, साथ ही उल्टा पैर पूरा जला सा हो गया है, झुलस गया है-तब कोई अद्रश्य होकर मुझसे कह रहा है की- ये सुंदरी(मेरी छोटी बुआ) ने 3 से 5 लाख मारण मंत्र तुम्हारे पिता और चाचा से भूमि विवाद का हल निकालने को कराये है. जो तुम पर उपाय करने से आ पड़े हैं।ये देख तब मैने इनका उपाय किया और अपने पिता और चाचा को भी बताया। पर वो कहावत है की-“घर का योगी जोगिया,आन गांव का सिद्ध।।यही पूर्वकाल के सभी अवतारों और सिद्धों के साथ हुआ और होता है, सो वही मेरे साथ हुआ। चूँकि जब पात्र नही हो, तो उपाय कोई विशेष लाभ नही देता है,यो अधिक नही कहते यहीं ज्ञान यहाँ है की- ये दोनों भाई अचानक घटनाओं से मृत्यु को प्राप्त हुए-मेरे पिता दुर्धटना में और चाचा रोगग्रस्त होने से।इस सम्बंध में एक और दुर्घटना चेतावनी मुझे सन् 94 में क्वार नवरात्रि में बगलामुखी साधना के उपरांत दिखी थी की-एक बड़े से हॉल में बड़ी मेज के चारों और बड़े प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित लोग बैठे है,जिनमें अपने समय का विश्वप्रसिद्ध भविष्यवक्ता कीरो.भी बैठा है,उसने मेरा हाथ देख कर. मेरी जीवन रेखा को देख कहा. की तुम्हारी जीवन रेखा मध्यायु पर टूट रही है और मंगल से एक रेखा आकर कुछ काट रही है, यो तुम्हारी मृत्यु मध्यायु में सड़क दुर्घटना में होगी,ये सुन वहाँ बेठी एक स्त्री बोली-तुम इन्हें नहीं जानते हो, ये योगी है यो ये सम्भव नहीं है, आदि आदि.. पर तब सच में मेरे हाथ में कोई जीवन रेखा ऐसे नही कटी हुयी थी, पर बहुत वर्षों के उपरांत ठीक ऐसा ही वहीं से कटनी प्रारम्भ हुयी और तब तक मैने अपनी गद्दी की स्थापना और अखण्ड ज्योत जलाने के उपरांत सभी परिवारिक और बाहरी आयोजनों आदि में जाना और यात्रा बंद कर दी थी।तब जीवन रेखा में यही कटाव पिता की दुर्घटना में मृत्यु के रूप में प्रत्यक्ष हुयी और मुझे भी भविष्य में रोग कष्ट की प्राप्ति हुयी। इस सन्दर्भ में अनेक बातें है, और आगे शेष भी रहेंगी.. पर कुछों को यहाँ स्पष्ट करूँगा.. की उनसे उनकी मृत्यु से कुछ माह पूर्व ही मेने कहा था की, तुम्हारे लिए आने वाली होली भारी होगी, ये सुन वे बोले-की मैं तो खुद शनिदेव की सेवा में लगा रहता हूँ, तब मुझे क्या ग्रह संकट देंगे? यो कह हंस कर मेरी बात टॉल दी, वेसे भी वे शनिदेव मन्दिर जबसे बना उसकी सेवा में प्रथम सेवक बन लगे ही रहते थे।
यो जब इनके दुर्घटना के होने से पूर्व मेरे पास भक्त देवेश शर्मा बैठा चरण सेवा करता धर्म चर्चा कर रहा था, की मैं एक दम स्तब्ध सा हो गया और बोला.. कोई दुर्घटना हो गयी है,देवेश बोला-किसकी? बस इसके कुछ उपरांत ही फोन आ गया की- ऐसा हो गया,मैने सबको बताया उनके जाने की व्यवस्था की,यहाँ शहर में उनका इलाज सम्भव नहीं होने से उन्हें यशोदा गाजियाबाद ले जाया गया,जहाँ डाक्टरों ने मना किया,भाई सजंय का फोन आया की-डॉक्टरों ने ऐसा कहा है? सुन मैं बोला उनसे कह की- वे जितना हो सके उतना अपना काम करें।जो होगा देखेंगे,तब चिकित्सा हुयी, छोटे भाई,अंजय और सजंय और राजू व् नेपाल भाई और मित्रों ने रक्त दिया, पर कोई विशेष सुधार नही हुआ।मैने अपनी माता जी और बुआ आदि परिजनों को डाँटते हुए समझाया की-अरे रोना धोना बंद करके इनके लिए जप तप और प्रार्थना करो। ताकि उन्हें शक्ति मिले और स्वस्थ लाभ हो!! पर वहाँ कौन सुने? यही तो सनातन काल के उपरांत वर्तमान के हिंदुओं में बड़ी विचित्र धर्म परिपाटी चली आ रही है,की- जब कोई स्वजन की मृत्यु हो जाती है, तब तो सूतक लग जाते है,और स्वयं की पूजापाठ ईश्वर चिंतन मनन बंद,और जब कोई बच्चा पैदा होता है तब शोबर फैल जाती है, यो तब भी पूजापाठ,ईश्वर नाम बंद,तब क्या ईश्वर जिसके घर तुम्हारा पितृ जा रहा है,तो क्या उसे ईश्वर के यहाँ पहुँचने का मार्ग मिलेगा? और जिस ईश्वर ने आपको सन्तान दी है,उसी को धन्यवाद नहीं देकर, उसी की पूजा बन्द कर देने पर, वो उस बच्चे और उसकी माता को आने वाले कष्ट से शांति और मुक्ति देगा? कितनी अधार्मिक और विकृत सोच, अब शेष रह गयी है। यही मेने देखा और मुझे भी परिजनों ने कह दिया भई- हमें उपदेश मत दो,हम बड़े दुखी है,तुम्हें जो करना है, वो अपने आश्रम में जाकर करो।और बाद में ये ही लोग प्रश्न करते है की भई- स्वामी जी तुम्हारे पूजापाठ से क्यों नही लाभ हुआ? क्या उत्तम चिंतन है। इन जैसे अन्य सभी कथित धार्मिक लोगों का? यो मैं वहाँ से आश्रम में चला आया और मैने अपने यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ किये। और करते हुए तेरह दिन हो गए। अल्प सुधार देख,मैने अंतर चिंतन किया की- ऐसा क्यों हो रहा है? और लोग कहेंगे की- वैसे तो समाज में सिद्ध कहे जाते है. पर अपने पिता के विषय में कोई चमत्कार नहीं कर पाये. इसका क्या उत्तर दूंगा?तब् अन्तः उत्तर मिला की-देखो कर्तव्य भावना एक अलग विषय है, जो तुम पुत्र होने के नाते कर रहे हो, यो उन्हें जप शक्ति मिल रही है और चमत्कार एक अलग विषय है, उसके लिए जिसको कर रहे हो उसके और तुम्हारे मध्य भक्त और भक्ति का विषय सम्बन्ध होता है और होना भी चाहिए,तभी परस्पर कृपा शक्ति का लेन और देन होकर चमत्कार होता है, यो ही पूर्व से वर्तमान तक जितने भी अवतार और सिद्ध हुये है, उनके किसी परिजन सम्बन्ध को लेकर कभी चमत्कार नहीं हुए अन्यथा सभी जीवित रहते, और पूर्व कर्मों का परिणाम तुम हो या अन्य कोई अवश्य पायेगा, केवल शरणागत आये सेवक और श्रद्धालु भक्त के सम्पूर्ण समर्पण की प्रार्थना पर ही धर्म के सभी योग चमत्कार सिद्ध होते हैं, अन्यथा सभी प्रकर्ति नियम भंग कर देंगे?
यो और भी अनेक इनके स्वभाव को रख अधिक आयु और स्वस्थता की प्राप्ति नहीं होगी बताया,
यो तमने उन्हें उनके जीते जी, जप तप दान कर दिया है। जिसे इन्होंने प्राप्त कर लिया है। इससे अधिक इनके लिए तुम्हारे द्धारा कुछ उपाय सम्भव नहीं है। यो अब इनकी आत्मा में जो प्रारब्ध इच्छा हो वही होने देना चाहिए।ये सुन मैने जो संकल्पित गोलायज्ञाहुति तैयार कर रखी थी। वो यज्ञ में इसी भाव से अर्पित की-कि इनकी आत्मा में जो ईश इच्छा हो, वहीं हो!! तब मुझे अंर्तवाणी हुयी.. की चित्र हटा..आग लगने वाली है। और साथ ही पिता जी की आवाज आई की-सत्तन.. (मुझे बचपन में ये ही यही नाम से पुकारते थे और कोई इस नाम को नही कहता था, वे उसे मना कर देते थे और बाद के वर्षों में स्वामी कह कर पुकारते थे )..मैं फंस गया.. अब मुक्त हूँ!! तब मैं उठ गया और ठीक कुछ समय बाद ही सुचना आ गयी, की ये होली उपरांत(2-3-1910 बुधवार को) स्वर्गवासी हो गए।तब ये यहाँ लाये गए, मैंने बस उठ कर इनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की और आश्रम से शनि मन्दिर तक जा संगत दी और लौट आया, बाकी गांव में इन्हें ले जाकर इनके सारे कर्म छोटे भाई सजंय,अंजय आदि ने किये। यो यहाँ इनके लिए इस सबके उपरांत वर्तमान तक नित्य जप किये है, जो मेरा कर्तव्य है और तब मुझे पुनर्जन्म की जिज्ञासा को लेकर ध्यान लगाने पर इनका जन्म विषय पता चला की-मैने देखा- की पिता जी एक हमारे परिचित चायवाले की दुकान में गए है और वहां से कहीं पीछे की और निकल गए है,मैं उनके पीछे गया और उन्हें वहां नही देख, उस चायवाले से पूछा-उसने बताया की मेरी पीछे की दीवार से पीछे की गली में जाने का मार्ग है, वकील साहब इसी से गए है,मैं वहाँ टांड पर चढ़ा और डेढ़ फुट पतले से चार फुट लम्बे से संकीर्ण मार्ग से मैने भी लेटकर घुसते हुए उसे पार किया तो पाया की-जेसे ही दुसरी और ठंडी और साफ हवा का झोंका आया और देखा की एक बहुत स्वच्छ वातावरण में बनी एक अर्द्ध बनी कालोनी है। उसमें अनेकों दुकाने है। कुछ ही खुली है, प्रातः का समय है, जिस दुकान से दूसरी और निकला. वो भी चायवाले की है. ये विचित्र बात थी.तब द्रष्टि डाली कहाँ आ गया? तो देखा जी पिता जी एक फोल्डिंग लकड़ी की आराम कुर्सी पर बैठे चाय पी रहे है। और मुझे देख बोले- आ जा स्वामी..मैं बोला ये कहाँ हो? वो बोले ये नेपाल है और तुम भी एक कुर्सी खींच लो, मैं बोला पता नहीं किसकी जगह है? वे बोले ये सब मेरी ही कालोनी और सम्पत्ति है,बस इस सबको और चारों और के सुंदर वातावरण को देखते हुए ध्यान भंग होता चला गया।
तब उठकर मेरा चिंतन हुआ,की उन्हें अपने दिए और किये वर्तमान जप,तप,दान आदि और उनके और भी शुभकर्मों से उन्हें इस भविष्य जन्म में इकलौते और सुख,सम्पति प्राप्त होने का पूण्य मिला है।ये देख अच्छा लगा की चलो,वे सुख में हैं।
-तो भक्तों इससे पता चलता है की जो ज्ञानी पूर्वजों ने विज्ञानंवत ये तेरहवीं करने का धर्म संस्कार बनाया है-की प्रत्येक मनुष्य आत्मा तेरह दिन तक इस काल से नवीन गर्भ तक जन्म लेने जाते हुए हुए काल तक जो पूण्य और पाप बल के संघर्ष के आकर्षण और विकर्षण से यात्रा करती है, ठीक तभी जो परिजन अपने पितरों को तभी के तभी अपने ही द्धारा किये जप-तप- दान की शुभ भावना प्रदान करते है। वहीं ही उस जाते पितृ को प्राप्त होती है,और जो स्वजन रोते गाते किसी अन्य ब्राह्मण आदि से जप तप कराते हैं। उन्हें दुःख आदि भावो के साथ अन्य कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है, यो आज के विषय से यही ज्ञान जाने की.उनकी मृत्यु समय के तेरह दिन तक ही उन्हें आपके दिए पूण्य बल प्राप्त होंगे, इसके उपरांत वो चौदहवें से सोलहवें दिन (प्रत्यक्ष चन्द्रकला गणित अनुसार) में गर्भ में प्रवेश करते ही अपनी आत्म चेतना में स्थिर होकर अपना पूर्वजन्म ज्ञान भूल जाते है,यो आपका बाद में किया पूण्य कर्म उन्हें उतना लाभप्रद प्राप्त नही होता है। फिर भी इसी को ये पितृपक्ष के सोलह दिन प्रति वर्ष बनाये है. की जिनमे आपके और आप स्वयं के भी अपने पुर्जन्मों के किये सभी कर्मो को किसी न किसी भयावह या सुंदर स्वप्न के रूप में देखते हुए आपके द्धारा किये पूण्य या पाप बल आपके इसी पृथ्वी पर जीवित पितृ सम्बंधों को प्राप्त होते है और ऐसे ही तुम्हारे पूर्वजन्मों के स्वजनों के पाप और पूण्य कर्म फल प्राप्त होते है इस समय के उपरांत तो केवल तुम्हारे दिए और तुम्हें प्राप्त पूण्य और पाप कर्मो के फलों का भोगने का समय ही आपके पास पूरे वर्ष रहता है।यो अभी अपने लिए भी और अपने पितरों के लिए भी व्यक्तिगत किये जप-तप और दान करना प्रारम्भ करें।।
और स्मरण रखो-मैं हूँ या तुम-ये पितृपक्ष के सोलह दिवस का सच्चा नाम है..अपने अपने पूर्वजन्मों और वर्तमान जन्म के सभी अशुभ अनजाने कर्मों का निरंतर प्रायश्चित करना.. यो इन दिवस को “”प्रायश्चित दिवस”” माने और ज्ञान से प्रायश्चित करें भय से नही, ज्ञान से करके मनाये।क्योकि प्रायश्चित से बड़ा कोई जप और तप और दान नहीं होता है, जो अति शीघ्र ही समस्त कुलषित कर्मो को तुम्हारे ह्रदय से धोकर स्वच्छ करता हुआ,नवीन शुद्ध भक्ति प्रधान ह्रदय देता है। और इसी शुद्ध ह्रदय में आत्मा प्रकाशित होती है।।यो प्रायश्चित करो,तप, जप और दान करने का अहंकार नहीं करो।।
संछिप्त में:-सभी आत्माएं 13 दिन के उपरांत 16 दिन अपने कर्मों से जन्म के नो माह के जन्म चक्र में प्रवेश करती है।
-आप जो भी कोई इष्ट या गुरु मंत्र जप रहे हो,वही जप स्वयं और पूर्व पितरों के कर्म नाश और सर्व मुक्ति के लिए सम्पूर्ण होता है, यो अन्य मंत्रो के जपो की आवश्यकता नहीं है।मंत्र का अर्थ ही शुभ भावना है और यही शुभ भावना ही मुक्ति देती है।
-ये पृथ्वी ही कर्म भूमि और भोग भूमि है यो प्रत्येक जीव अपने अपने शुभ, अशुभ कर्म चक्रों को पूरा करता, केवल यहीं आता और यहीं से जाता है यो यहीं स्वर्ग और नरक आदि है जो आप प्रत्यक्ष जीवन में देखते है।
-मनुष्य ही अपने कर्मो से सेवक और राजा इसी पृथ्वी पर बनता है यो वहीँ देव और दैत्य और संत आदि है इन सब खण्ड अवस्थाओं का एक स्वरूप का नाम ईश्वर है यो वो भी यहीं है।
-यो शुभ कर्म करो और ज्ञान जान मुक्त हो।
इस सम्बंधित और भी ज्ञान विज्ञानं वार्ता आगामी लेख में कहूँगा।
“विशेष ज्ञान को “सत्यास्मि घर्म ग्रन्थ” में पढ़े”
इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र महाराज जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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